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दलाई लामा के उत्तराधिकारी मुद्दे पर चीन की दोटूक, भारत को दी दूरी बनाए रखने की सलाह

तिब्बत और दलाई लामा के उत्तराधिकार को लेकर चीन ने भारत को सख्त संदेश दिया है। बीजिंग का कहना है कि दलाई लामा के पुनर्जन्म और नए उत्तराधिकारी की प्रक्रिया पूरी तरह चीन का अंदरूनी मामला है और किसी भी बाहरी देश को इसमें दखल देने का अधिकार नहीं है।

भारत स्थित चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने बयान जारी कर कहा कि दलाई लामा से जुड़ी परंपराएं सदियों पुराने धार्मिक नियमों और ऐतिहासिक प्रक्रियाओं के आधार पर तय होती हैं। चीन ने साफ किया कि तिब्बत से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार का बाहरी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जाएगा।

यह बयान ऐसे वक्त आया है जब धर्मशाला में निर्वासित तिब्बती सरकार यानी सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन (CTA) के प्रमुख पेनपा त्सेरिंग दोबारा शपथ लेने जा रहे हैं। माना जा रहा है कि इस कार्यक्रम में दलाई लामा भी मौजूद रह सकते हैं। चीन ने भारत को अपने पुराने रुख की याद दिलाते हुए कहा कि भारतीय जमीन का इस्तेमाल तिब्बती अलगाववादी गतिविधियों के लिए नहीं होना चाहिए। बीजिंग के मुताबिक, ऐसा कदम दोनों देशों के रिश्तों और क्षेत्रीय स्थिरता पर असर डाल सकता है।

दरअसल, चीन की चिंता का बड़ा कारण CTA प्रमुख पेनपा त्सेरिंग माने जा रहे हैं। फरवरी में हुए चुनाव में उन्हें 61% से ज्यादा वोट मिले थे, जिसके बाद बिना दूसरे चरण के ही उन्हें विजेता घोषित कर दिया गया। चीन को आशंका है कि भारत में मौजूद निर्वासित तिब्बती नेतृत्व भविष्य में उसकी मंजूरी के बिना नए दलाई लामा की घोषणा कर सकता है।

कर्नाटक के बायलाकुप्पे में जन्मे पेनपा त्सेरिंग लंबे समय से तिब्बती राजनीति से जुड़े रहे हैं। उन्होंने चेन्नई के मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से पढ़ाई की है और निर्वासित तिब्बती समुदाय में उनकी मजबूत पकड़ मानी जाती है। दलाई लामा के चयन की प्रक्रिया भी बेहद खास मानी जाती है। परंपरा के अनुसार, पुराने दलाई लामा के निधन के बाद बौद्ध भिक्षु उनके पुनर्जन्म की खोज शुरू करते हैं। इसमें सपनों, धार्मिक संकेतों, शव की दिशा और ज्योतिषीय संकेतों का सहारा लिया जाता है।

इसके बाद उन बच्चों की तलाश होती है जिनका जन्म दलाई लामा की मृत्यु के आसपास हुआ हो। संभावित बच्चों की कई तरह से परीक्षा ली जाती है। उन्हें पुराने दलाई लामा की वस्तुएं पहचानने के लिए दी जाती हैं। सही पहचान होने पर उस बच्चे को दलाई लामा का पुनर्जन्म माना जाता है। मौजूदा 14वें दलाई लामा का जन्म 1935 में चीन के ताक्तेसर गांव में हुआ था। सिर्फ दो साल की उम्र में उनकी पहचान कर ली गई थी। कहा जाता है कि उन्होंने 13वें दलाई लामा की वस्तुओं को पहचान लिया था, जिसके बाद उन्हें नया दलाई लामा घोषित किया गया।

1950 में तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद हालात बदल गए। दलाई लामा के मुताबिक, चीनी सेना के बढ़ते दबाव के कारण उन्हें 1959 में तिब्बत छोड़ना पड़ा। वे भेष बदलकर भारत पहुंचे थे। भारत ने उन्हें शरण दी और बाद में धर्मशाला को उनका स्थायी ठिकाना बनाया गया। तब से निर्वासित तिब्बती सरकार भी यहीं से संचालित होती है, जिसे लेकर चीन समय-समय पर आपत्ति जताता रहा है।