बीमा कंपनियों के क्लेम सेटलमेंट के तरीके पर जल्द सख्ती बढ़ सकती है। भारतीय बीमा नियामक IRDAI ने नॉन-लाइफ इंश्योरेंस कंपनियों को निर्देश दिया है कि वे क्लेम की परिभाषा और उसे निपटाने की प्रक्रिया में एकरूपता लाएं। इसका उद्देश्य ग्राहकों को सही और पारदर्शी जानकारी उपलब्ध कराना है।
दरअसल, अभी अलग-अलग कंपनियां अपने हिसाब से क्लेम को दर्ज और सेटल दिखाती हैं। कुछ कंपनियां शिकायत मिलते ही उसे क्लेम मान लेती हैं, जबकि कई कंपनियां तभी उसे क्लेम की श्रेणी में रखती हैं जब उन्हें लगता है कि भुगतान बनता है। इसी वजह से क्लेम सेटलमेंट रेशियो की तस्वीर साफ नहीं दिखती।
आम ग्राहक यह मानता है कि क्लेम सेटल होने का मतलब पैसा मिल जाना है, लेकिन कई कंपनियां ऐसे मामलों को भी सेटल्ड दिखा देती हैं जिन्हें दस्तावेज अधूरे होने या पॉलिसी की शर्तों से बाहर बताकर बंद कर दिया गया हो। इससे रिकॉर्ड में कंपनी की स्थिति बेहतर नजर आती है, जबकि ग्राहक को लाभ नहीं मिल पाता।
बीमा सेक्टर के जानकारों का कहना है कि कई बार ग्राहकों से ‘फुल एंड फाइनल सेटलमेंट’ के दस्तावेज पर हस्ताक्षर भी करा लिए जाते हैं, भले ही वे भुगतान से संतुष्ट न हों। ऐसे में क्लेम सेटलमेंट के सही मायने तय करना जरूरी हो गया है।
IRDAI के पूर्व सदस्य के.के. श्रीनिवासन के मुताबिक, किसी क्लेम को तभी निपटा हुआ माना जाना चाहिए जब ग्राहक खुद संतुष्ट हो। यदि कंपनी क्लेम रिजेक्ट करती है और मामला अदालत तक पहुंचता है, तो अंतिम फैसला आने तक उसे लंबित माना जाना चाहिए।
सूत्रों के अनुसार, जनरल इंश्योरेंस काउंसिल ने इस मामले में अपने सुझाव IRDAI को भेज दिए हैं। नियामक चाहता है कि सभी कंपनियों के लिए एक समान नियम लागू हों, ताकि ग्राहकों को यह साफ पता चल सके कि कौन सी कंपनी वास्तव में क्लेम देने में भरोसेमंद है।
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