सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान एक ऐसा सवाल पूछा गया, जिसने कोर्टरूम में मौजूद बड़े-बड़े कानूनी विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिकारियों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया। जज ने सीधे सॉलिसिटर जनरल और शीर्ष आईएएस अधिकारियों से पूछा कि आखिर कैबिनेट बैठक के लिए न्यूनतम कितने मंत्रियों की मौजूदगी जरूरी होती है? यानी कैबिनेट मीटिंग का कोरम क्या है?
सवाल सुनते ही कुछ पल के लिए अदालत में खामोशी छा गई। मौजूद अधिकारी और कानून के जानकार एक-दूसरे की ओर देखने लगे, लेकिन कोई भी स्पष्ट जवाब नहीं दे सका। बाद में इस पूरे घटनाक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसे कानूनविद् दिव्य कुमार सोती ने भी साझा किया। उन्होंने इसे नौकरशाही और कानूनी तैयारी पर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला मामला बताया।
दरअसल, लोगों को अक्सर लगता है कि जैसे संसद की कार्यवाही के लिए संविधान में तय कोरम होता है, उसी तरह कैबिनेट बैठकों के लिए भी कोई निश्चित संख्या लिखी गई होगी। लेकिन भारतीय संविधान में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान मौजूद नहीं है।
दिलचस्प बात यह है कि जब 1950 में संविधान लागू हुआ था, तब उसमें ‘कैबिनेट’ शब्द का जिक्र ही नहीं था। अनुच्छेद 74 में केवल ‘मंत्रिपरिषद’ का उल्लेख किया गया था, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री करते हैं। इसमें कैबिनेट मंत्री, राज्य मंत्री और उपमंत्री सभी शामिल होते हैं।
बाद में 1978 में 44वें संविधान संशोधन के जरिए पहली बार ‘कैबिनेट’ शब्द संविधान में जोड़ा गया। यह संशोधन राष्ट्रीय आपातकाल से जुड़े अनुच्छेद 352 में किया गया था। इसके तहत राष्ट्रपति तभी आपातकाल घोषित कर सकते हैं, जब प्रधानमंत्री और कैबिनेट स्तर के मंत्री लिखित रूप से इसकी सिफारिश करें। हालांकि, यहां भी कैबिनेट बैठकों के लिए किसी तय कोरम का उल्लेख नहीं किया गया।
संसद और कैबिनेट के नियमों में यही बड़ा अंतर है। संविधान के अनुच्छेद 100(3) में संसद के दोनों सदनों के लिए साफ लिखा गया है कि कुल सदस्यों का कम से कम 10 प्रतिशत उपस्थित होना जरूरी है, तभी कार्यवाही चल सकती है। लेकिन कैबिनेट के मामले में ऐसा कोई संवैधानिक नियम नहीं है, क्योंकि यह सरकार की कार्यपालिका का आंतरिक हिस्सा माना जाता है।
फिर सवाल उठता है कि कैबिनेट की बैठकें आखिर किस नियम से चलती हैं? इसका जवाब अनुच्छेद 77(3) और गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ट्रांजैक्शन ऑफ बिजनेस रूल्स, 1961 में मिलता है। इन नियमों के तहत सरकार के कामकाज और मंत्रियों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा तय किया जाता है। कैबिनेट सचिवालय इन्हीं नियमों के आधार पर बैठकों का संचालन करता है।
हालांकि इन नियमों में भी किसी निश्चित कोरम का जिक्र नहीं है। आमतौर पर जिस मंत्रालय से जुड़ा प्रस्ताव बैठक में रखा जाना होता है, उस विभाग के मंत्री की मौजूदगी जरूरी मानी जाती है। अगर कोई मंत्री मौजूद नहीं हो पाता, तो प्रधानमंत्री की अनुमति से या दूसरे मंत्रियों की सहमति से फैसले आगे बढ़ाए जाते हैं।
सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को लेकर काफी चर्चा हुई। कई लोगों ने लिखा कि संसद की तरह कैबिनेट के लिए कोई तय संख्या नहीं होती, इसलिए अदालत में मौजूद अधिकारी भी स्पष्ट जवाब देने से बचते नजर आए।