भीषण गर्मी के दिनों में सड़कों, चौकों और बाजारों में सिख समाज द्वारा लगाई जाने वाली ठंडे और मीठे पानी की छबीलें केवल प्यास बुझाने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे एक गहरी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक भावना जुड़ी हुई है। यह परंपरा सिखों के पांचवें गुरु, श्री गुरु अर्जुन देव जी की शहादत की याद में निभाई जाती है।
इतिहास के अनुसार, मुगल शासन के दौरान गुरु अर्जुन देव जी को लाहौर में कठोर यातनाएं दी गईं। उन्हें तपते तवे पर बैठाया गया और उबलते पानी से कष्ट पहुंचाया गया, लेकिन उन्होंने अद्भुत धैर्य और आध्यात्मिक शक्ति का परिचय दिया। इसी दौरान उन अत्याचारों में शामिल चंदू नामक व्यक्ति की पुत्रवधू का हृदय द्रवित हो उठा।
कहा जाता है कि वह अत्यंत श्रद्धा के साथ गुरु जी के पास ठंडा शरबत लेकर पहुंची और उनसे उसे ग्रहण करने की विनती की। हालांकि गुरु जी ने शरबत नहीं पिया, लेकिन उन्होंने उस महिला की सेवा भावना को सम्मान देते हुए एक विशेष आशीर्वाद दिया। गुरु जी ने कहा कि भले ही वे स्वयं यह शरबत ग्रहण नहीं करेंगे, लेकिन आने वाले समय में इसी सेवा की याद में असंख्य लोग राहगीरों को मीठा शरबत पिलाएंगे और लाखों लोग इसे ग्रहण करेंगे।
गुरु जी के इस वचन को ही छबील की परंपरा की शुरुआत माना जाता है। तभी से उनके शहीदी दिवस के अवसर पर देश-दुनिया में जगह-जगह छबीलें लगाई जाती हैं, जहां बिना किसी भेदभाव के लोगों को ठंडा और मीठा पानी वितरित किया जाता है।
लोक कथाओं में यह भी वर्णित है कि चंदू की पुत्रवधू ने गुरु जी से प्रार्थना की थी कि उनकी शहादत के समय वह भी इस संसार को छोड़ सके, क्योंकि वह अपने परिवार के कर्मों का बोझ लेकर जीवित नहीं रहना चाहती थी। मान्यता है कि गुरु अर्जुन देव जी की शहादत के दिन उसने भी अपने प्राण त्याग दिए और उसकी सेवा भावना इतिहास में अमर हो गई।
यही कारण है कि आज भी जब गर्मी के मौसम में छबीलें लगाई जाती हैं, तो उन्हें केवल सेवा कार्य नहीं, बल्कि गुरु अर्जुन देव जी के बलिदान, करुणा और मानवता के संदेश की जीवंत स्मृति माना जाता है।