दक्षिण भारत में चचेरे और ममेरे भाई-बहनों के बीच विवाह का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। इसकी वजह हाल ही में रिलीज हुई ओटीटी सीरीज “कजिंस एंड कल्याणम” है, जिसमें एक तमिल परिवार की कहानी के जरिए रिश्तेदारी में होने वाली शादियों को दिखाया गया है। हालांकि यह विषय नया नहीं है, बल्कि दक्षिण भारत के कई समुदायों में सदियों पुरानी सामाजिक परंपरा का हिस्सा रहा है।
तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और कुछ हद तक केरल में लंबे समय से क्रॉस-कजिन विवाह यानी मामा की बेटी या अन्य करीबी रिश्तेदारों के बीच विवाह को स्वीकार किया जाता रहा है। स्थानीय सामाजिक संरचना और पारिवारिक परंपराओं ने इस व्यवस्था को पीढ़ियों तक बनाए रखा।
दिलचस्प बात यह है कि दक्षिण भारतीय सिनेमा में भी इस विषय को कई बार पर्दे पर उतारा गया। मलयालम फिल्मों से लेकर तमिल और तेलुगु सिनेमा तक, कई कहानियों में ऐसे रिश्तों को सामान्य सामाजिक व्यवहार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पुराने दौर में इन संबंधों पर समाज के भीतर बहुत कम सवाल उठाए जाते थे।
कानूनी दृष्टि से सगे भाई-बहनों के बीच विवाह भारत में मान्य नहीं है। हालांकि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 कुछ समुदायों की पारंपरिक प्रथाओं को छूट देता है। यही कारण है कि जहां ऐसी शादियां किसी समुदाय की स्थापित परंपरा का हिस्सा हैं, वहां उन्हें कानूनी मान्यता मिल सकती है।
विभिन्न अध्ययनों के अनुसार दक्षिण भारत के राज्यों में रिश्तेदारी के भीतर विवाह की दर राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक रही है। तमिलनाडु, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में इस तरह के विवाहों का प्रतिशत अपेक्षाकृत ज्यादा दर्ज किया गया है, जबकि केरल में यह आंकड़ा काफी कम है। इसके मुकाबले उत्तर भारत में ऐसी शादियां अपेक्षाकृत दुर्लभ हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे द्रविड़ पारिवारिक व्यवस्था की बड़ी भूमिका रही है। इस सामाजिक व्यवस्था में कुछ प्रकार के रिश्तेदारों के बीच विवाह को न केवल स्वीकार किया जाता था बल्कि कई बार प्राथमिकता भी दी जाती थी। माना जाता है कि यह परंपरा हजारों वर्षों से चली आ रही है।
संपत्ति को परिवार के भीतर बनाए रखना भी इस प्रथा का एक प्रमुख कारण माना जाता है। जब विवाह रिश्तेदारी में होता था तो जमीन-जायदाद और अन्य आर्थिक संसाधन बाहरी परिवारों में नहीं बंटते थे। इसके अलावा दोनों परिवारों के बीच पहले से परिचय होने के कारण सामाजिक और आर्थिक जोखिम भी कम समझे जाते थे।
दक्षिण भारत में केवल हिंदू ही नहीं, बल्कि मुस्लिम और ईसाई समुदायों के कुछ वर्गों में भी कजिन मैरिज का चलन देखा गया है। हालांकि समय के साथ इसका स्वरूप बदल रहा है। शिक्षा के प्रसार, शहरीकरण और बदलती सामाजिक सोच के कारण नई पीढ़ी अब ऐसे विवाहों को पहले की तुलना में कम अपनाती है।
एक अन्य महत्वपूर्ण कारण स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता भी है। वैज्ञानिक अध्ययनों में रक्त संबंधियों के बीच विवाह से जन्म लेने वाली संतानों में कुछ आनुवंशिक बीमारियों और स्वास्थ्य जोखिमों की संभावना बढ़ने की बात सामने आई है। इसी वजह से पिछले कुछ दशकों में इस तरह के विवाहों में लगातार कमी दर्ज की गई है।
आज भी यह परंपरा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है, लेकिन आधुनिक जीवनशैली, उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं ने दक्षिण भारत में कजिन मैरिज के चलन को पहले की तुलना में काफी हद तक सीमित कर दिया है।
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