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सप्लाई संकट पर भारत की बड़ी जीत, LPG-LNG से लेकर क्रूड ऑयल तक हालात सुधरे, आम लोगों को राहत के संकेत

पश्चिम एशिया में तनाव और शिपिंग रूट्स पर आई चुनौतियों के बावजूद भारत ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर स्थिति काफी हद तक संभाल ली है। अलग-अलग देशों से आयात बढ़ाने और वैकल्पिक स्रोतों पर जोर देने की रणनीति का असर अब दिखाई देने लगा है। मई महीने में कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी की उपलब्धता में सुधार दर्ज किया गया है।

एलपीजी के मोर्चे पर मार्च से मई के बीच खाड़ी देशों से आने वाली सप्लाई प्रभावित रही। होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ी दिक्कतों के कारण आयात घटकर करीब 10 से 12 लाख टन प्रति माह रह गया, जबकि साल की शुरुआत में यह 20 लाख टन से ज्यादा था। हालांकि भारत ने अमेरिका से खरीद बढ़ाकर और घरेलू उत्पादन में इजाफा करके इस कमी का असर कम कर दिया।

नेचुरल गैस यानी एलएनजी की स्थिति अपेक्षाकृत मजबूत रही। पर्याप्त भंडार बनाए रखने के लिए आयात और घरेलू उत्पादन दोनों का सहारा लिया गया। हाल के महीनों में कतर की हिस्सेदारी घटी है, जबकि अमेरिका, ओमान, नाइजीरिया और अंगोला जैसे देशों से आने वाली सप्लाई का महत्व बढ़ा है।

कच्चे तेल के आयात में भी मई के दौरान सुधार देखने को मिला। दैनिक आयात बढ़कर लगभग 49 लाख बैरल तक पहुंच गया, जो मार्च और अप्रैल के मुकाबले ज्यादा है। हालांकि यह अभी भी फरवरी के स्तर से थोड़ा नीचे बना हुआ है, जिससे संकेत मिलता है कि वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह सामान्य नहीं हुई है।

भारत के लिए रूस सबसे बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी रूस से लगातार और प्रतिस्पर्धी कीमतों पर तेल मिलने से भारतीय रिफाइनरों को राहत मिली है। वहीं, इराक और कुवैत से सप्लाई में उतार-चढ़ाव देखने को मिला। मई में यूएई भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर बनकर उभरा, जबकि सऊदी अरब, ब्राजील और वेनेजुएला भी प्रमुख स्रोतों में शामिल रहे।

विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से लगातार खरीदारी के कारण भारत को होर्मुज क्षेत्र में पैदा हुई बाधाओं का असर अपेक्षाकृत कम झेलना पड़ा। साथ ही महंगे विकल्पों पर निर्भरता भी सीमित रही।

ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि भारत ने विविध स्रोतों से आयात, बेहतर इन्वेंट्री प्रबंधन और मांग को संतुलित रखने की रणनीति के जरिए सप्लाई संबंधी चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया है। यदि वैश्विक व्यवधान लंबे समय तक जारी रहते हैं, तो रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों से आयात पर भारत की निर्भरता और बढ़ सकती है।

(Photo : AI Generated)