आयकर रिटर्न (ITR) दाखिल करने वाले लाखों करदाताओं के लिए केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इन निर्देशों में यह स्पष्ट किया गया है कि किन परिस्थितियों में किसी करदाता के रिटर्न को अनिवार्य जांच (Mandatory Scrutiny) के लिए चुना जा सकता है। नए नियम उन रिटर्न पर लागू होंगे जो वित्त वर्ष 2025-26 की आय से संबंधित हैं।
हर साल आयकर विभाग कुछ मामलों को विस्तृत जांच के लिए चुनता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि करदाताओं द्वारा दी गई जानकारी सही और कर कानूनों के अनुरूप है। इस बार भी CBDT ने ऐसे कई मानदंड निर्धारित किए हैं, जिनके आधार पर कुछ मामलों को प्राथमिकता के साथ स्क्रूटनी के दायरे में लाया जाएगा।
नए दिशानिर्देशों के अनुसार जिन करदाताओं के खिलाफ हाल के वर्षों में आयकर विभाग द्वारा तलाशी (Search) या जब्ती (Seizure) की कार्रवाई की गई है, उनके मामलों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। यदि 1 अप्रैल 2024 या उसके बाद किसी व्यक्ति, फर्म या कंपनी के यहां तलाशी अभियान चलाया गया है, तो उसके आयकर रिटर्न की गहन जांच की संभावना काफी बढ़ जाएगी। ऐसे मामलों को विभाग सीधे अनिवार्य स्क्रूटनी के लिए चुन सकता है।
सिर्फ तलाशी ही नहीं, बल्कि सर्वे कार्रवाई भी जांच का महत्वपूर्ण आधार बनेगी। आयकर अधिनियम की धारा 133A के अंतर्गत जिन करदाताओं के यहां सर्वे किया गया है, उनके मामलों की भी विभाग द्वारा बारीकी से समीक्षा की जा सकती है। यदि सर्वे के दौरान ऐसे संकेत मिले हैं जो आय, लेन-देन या खातों में किसी प्रकार की गड़बड़ी की ओर इशारा करते हैं, तो संबंधित रिटर्न को जांच के लिए चुना जा सकता है।
CBDT ने उन मामलों को भी उच्च प्राथमिकता दी है जिनमें आयकर विभाग ने धारा 148 के तहत नोटिस जारी किया है। यह नोटिस सामान्यतः तब जारी किया जाता है जब विभाग को यह संदेह होता है कि करदाता की कुछ आय कराधान के दायरे से बाहर रह गई है या उसका सही विवरण नहीं दिया गया है। यदि ऐसा मामला तलाशी या सर्वे से जुड़ा हुआ है, तो विस्तृत जांच लगभग निश्चित मानी जा रही है।
इसके अलावा ऐसे मामलों को भी स्क्रूटनी में शामिल किया जा सकता है जिनमें धारा 148 के तहत कार्रवाई तो हुई है, लेकिन वह तलाशी या सर्वे से संबंधित नहीं है। हालांकि ऐसे मामलों में यह शर्त लागू होगी कि संबंधित मूल्यांकन 31 मार्च 2027 तक पूरा किया जाना हो।
धार्मिक ट्रस्टों, चैरिटेबल संस्थाओं और गैर-लाभकारी संगठनों के लिए भी CBDT ने सख्त रुख अपनाया है। यदि किसी संस्था को कर छूट देने वाली मान्यता समाप्त कर दी गई है या उसके छूट संबंधी आवेदन को अस्वीकार किया जा चुका है, फिर भी उसने रिटर्न दाखिल करते समय कर छूट का दावा किया है, तो उसका मामला जांच के दायरे में आ सकता है। विशेष रूप से ITR-7 दाखिल करने वाले संगठनों के दावों की विभाग द्वारा गहन समीक्षा की जाएगी।
आयकर विभाग उन करदाताओं पर भी नजर रखेगा जिनके पुराने मामलों में बड़ी कर विसंगतियां सामने आ चुकी हैं। यदि पिछले किसी मूल्यांकन में कर अधिकारी ने घोषित आय में बड़ा संशोधन किया था और वही विवादित मुद्दा वर्तमान वर्ष के रिटर्न में भी मौजूद है, तो विभाग उस मामले को फिर से जांच के लिए चुन सकता है।
हालांकि ऐसे मामलों के लिए CBDT ने न्यूनतम वित्तीय सीमा भी तय की है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु, हैदराबाद, अहमदाबाद और पुणे जैसे बड़े महानगरों में यह सीमा 50 लाख रुपये रखी गई है। यदि विवादित राशि इस सीमा से अधिक है, तो स्क्रूटनी की संभावना बढ़ जाती है।
अन्य शहरों और क्षेत्रों के लिए यह सीमा 20 लाख रुपये निर्धारित की गई है। विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव महत्वपूर्ण है क्योंकि पहले बड़े शहरों में यह सीमा 25 लाख रुपये थी। अब इसे बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया गया है, जिससे अपेक्षाकृत छोटे विवादों वाले मामलों को राहत मिल सकती है और विभाग अपना ध्यान बड़े मामलों पर केंद्रित कर सकेगा।
कर चोरी से संबंधित विश्वसनीय सूचनाएं भी किसी रिटर्न को जांच के दायरे में ला सकती हैं। यदि पुलिस, प्रवर्तन एजेंसियां, नियामक संस्थान या अन्य सरकारी विभाग आयकर विभाग को ऐसे इनपुट उपलब्ध कराते हैं जो कर चोरी की आशंका दर्शाते हैं, तो विभाग संबंधित व्यक्ति या संस्था के वित्तीय रिकॉर्ड की विस्तार से जांच कर सकता है। ऐसे मामलों में आय के स्रोत, बैंकिंग लेन-देन, निवेश और कर भुगतान से जुड़े दस्तावेजों की भी पड़ताल की जा सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य आम करदाताओं को परेशान करना नहीं है। स्क्रूटनी केवल उन मामलों में की जाती है जहां विभाग को तथ्यों के सत्यापन की आवश्यकता महसूस होती है या किसी प्रकार की अनियमितता का संदेह होता है। ईमानदारी से रिटर्न दाखिल करने वाले अधिकांश करदाताओं को घबराने की आवश्यकता नहीं है।
फिर भी करदाताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे अपनी आय, निवेश, बैंक खातों, पूंजीगत लाभ, कर छूट और अन्य वित्तीय लेन-देन से जुड़े दस्तावेजों को व्यवस्थित रूप से सुरक्षित रखें। यदि भविष्य में विभाग किसी जानकारी का सत्यापन चाहता है, तो सही रिकॉर्ड होने पर प्रक्रिया आसान हो जाती है।
CBDT के नए नियम यह संकेत देते हैं कि आयकर विभाग जोखिम आधारित जांच प्रणाली को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में काम कर रहा है। साथ ही कुछ मामलों में अनिवार्य स्क्रूटनी की व्यवस्था भी जारी रखी जाएगी ताकि कर अनुपालन को बेहतर बनाया जा सके और कर प्रणाली में पारदर्शिता बनी रहे।
कर विशेषज्ञों की सलाह है कि रिटर्न दाखिल करते समय किसी भी प्रकार की गलत जानकारी देने, आय छिपाने या नियमों के विपरीत छूट का दावा करने से बचना चाहिए। डिजिटल निगरानी और डेटा विश्लेषण के बढ़ते उपयोग के कारण अब विभाग के लिए विसंगतियों की पहचान करना पहले की तुलना में कहीं अधिक आसान हो गया है।
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए जारी इन दिशा-निर्देशों का मुख्य उद्देश्य करदाताओं को यह स्पष्ट करना है कि किन परिस्थितियों में उनके रिटर्न की गहन जांच हो सकती है। सही जानकारी, पारदर्शी वित्तीय रिकॉर्ड और समय पर दाखिल किया गया रिटर्न किसी भी संभावित जांच की स्थिति में करदाता के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा कवच साबित हो सकता है।