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अमेरिका ने 80 चीनी कंपनियों को निगरानी सूची में डाला, बीजिंग भड़का; टेक्नोलॉजी और व्यापारिक टकराव फिर तेज

अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से जारी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा एक बार फिर नए मोड़ पर पहुंच गई है। अमेरिकी रक्षा विभाग ने चीन की दर्जनों कंपनियों को एक ऐसी सूची में शामिल किया है, जिसमें उन संस्थाओं के नाम रखे जाते हैं जिनके चीनी सैन्य ढांचे से संभावित संबंध होने की आशंका जताई जाती है। इस फैसले के बाद दोनों देशों के बीच पहले से मौजूद तनाव और बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं।

इस बार जिन कंपनियों के नाम सबसे अधिक चर्चा में हैं, उनमें ई-कॉमर्स क्षेत्र की दिग्गज अलीबाबा, इलेक्ट्रिक वाहन निर्माता BYD और इंटरनेट सर्च कंपनी बायडू शामिल हैं। अमेरिकी कदम के तुरंत बाद चीन ने इसे अपने व्यावसायिक हितों पर सीधा प्रहार बताते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है। बीजिंग का कहना है कि वाशिंगटन राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर चीनी कंपनियों को निशाना बना रहा है।

अमेरिकी रक्षा विभाग द्वारा जारी संशोधित सूची में कुल 80 चीनी कंपनियों और उनसे जुड़ी इकाइयों को शामिल किया गया है। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय इन कंपनियों की गतिविधियों और संभावित नेटवर्क की समीक्षा के बाद यह निर्णय लिया गया है। हालांकि सूची में शामिल अधिकांश कंपनियों ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा है कि उनका किसी सैन्य संगठन से कोई संबंध नहीं है।

चीन की प्रतिक्रिया काफी तीखी रही है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता लिन जियान ने कहा कि अमेरिका लगातार राष्ट्रीय सुरक्षा की अवधारणा का विस्तार कर रहा है और इसका उपयोग विदेशी कंपनियों के खिलाफ दबाव बनाने के लिए कर रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस तरह के कदम निष्पक्ष व्यापार और अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के सिद्धांतों के खिलाफ हैं। चीन ने अमेरिका से इस निर्णय पर पुनर्विचार करने की मांग करते हुए स्पष्ट किया कि वह अपनी कंपनियों के वैध अधिकारों और हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा।

दिलचस्प बात यह है कि यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच उच्चस्तरीय वार्ता हुई थी। दोनों नेताओं ने बातचीत के दौरान द्विपक्षीय संबंधों को स्थिर बनाए रखने और संवाद जारी रखने की आवश्यकता पर जोर दिया था। लेकिन नई ब्लैकलिस्ट ने यह संकेत दिया है कि दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी अब भी बरकरार है और कई संवेदनशील मुद्दों पर मतभेद खत्म नहीं हुए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल व्यापार तक सीमित नहीं है। इसके पीछे तकनीकी श्रेष्ठता, वैश्विक प्रभाव और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा भी शामिल है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका ने बार-बार चिंता जताई है कि चीन कृत्रिम बुद्धिमत्ता, उन्नत चिप निर्माण, दूरसंचार और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। इसी वजह से कई चीनी कंपनियां लगातार अमेरिकी निगरानी और प्रतिबंधों का सामना कर रही हैं।

इस नई सूची में कुछ ऐसे नाम भी शामिल किए गए हैं जिन्हें पहले बाहर कर दिया गया था। सेमीकंडक्टर क्षेत्र से जुड़ी चांगक्सिन मेमोरी टेक्नोलॉजीज और यांग्त्जी मेमोरी टेक्नोलॉजीज को दोबारा सूची में जोड़ा गया है। यह कदम इस बात का संकेत माना जा रहा है कि अमेरिका उन्नत चिप और मेमोरी तकनीक के क्षेत्र में चीन पर दबाव बनाए रखने की अपनी रणनीति से पीछे हटने के मूड में नहीं है।

तकनीकी क्षेत्र के अलावा अन्य उद्योगों की कंपनियां भी इस सूची में शामिल हुई हैं। फार्मास्युटिकल कंपनी वूक्सी ऐपटेक और रोबोटिक्स क्षेत्र में तेजी से उभर रही यूनिट्री का नाम भी जोड़ा गया है। यूनिट्री खासतौर पर अपने ह्यूमनॉइड रोबोट्स के लिए जानी जाती है और हाल के वर्षों में वैश्विक तकनीकी जगत में उसने काफी ध्यान आकर्षित किया है। इन कंपनियों का शामिल होना दर्शाता है कि अमेरिकी चिंताएं केवल रक्षा या इंटरनेट उद्योग तक सीमित नहीं हैं।

वूक्सी ऐपटेक ने अमेरिकी निर्णय का विरोध करते हुए कहा कि कंपनी किसी भी सैन्य या सरकारी संगठन के नियंत्रण में नहीं है। कंपनी का कहना है कि उसका पूरा संचालन व्यावसायिक सिद्धांतों पर आधारित है और उसका किसी रक्षा प्रतिष्ठान से कोई संबंध नहीं है। कंपनी ने उम्मीद जताई कि तथ्यों की निष्पक्ष समीक्षा के बाद उसका नाम सूची से हटा दिया जाएगा।

इसी प्रकार अलीबाबा ने भी अमेरिकी कार्रवाई को अनुचित बताया है। कंपनी के अनुसार वह एक वैश्विक व्यावसायिक मंच के रूप में कार्य करती है और उसका संचालन पूरी तरह बाजार आधारित ढांचे के तहत होता है। कंपनी का कहना है कि उसे इस सूची में शामिल करने के लिए कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है।

बायडू ने भी आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उसके खिलाफ लगाए गए दावों के समर्थन में कोई विश्वसनीय प्रमाण मौजूद नहीं है। कंपनी ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह तकनीकी नवाचार और व्यावसायिक सेवाओं पर केंद्रित संगठन है तथा किसी सैन्य गतिविधि से उसका कोई संबंध नहीं है।

इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग में तेजी से विस्तार कर रही BYD ने भी अमेरिकी निर्णय का विरोध किया है। कंपनी ने हांगकांग स्टॉक एक्सचेंज को भेजे गए अपने बयान में कहा कि उसका व्यवसाय पूरी तरह वाणिज्यिक गतिविधियों पर आधारित है। कंपनी के अनुसार उसे सूची में शामिल करने का फैसला तथ्यों और वास्तविक परिस्थितियों से मेल नहीं खाता।

हालांकि इस सूची में शामिल होने से तत्काल कोई कानूनी प्रतिबंध लागू नहीं होता, लेकिन इसका महत्व कम नहीं माना जा रहा। जानकारों के अनुसार ऐसी सूचियां अक्सर भविष्य में संभावित कड़े कदमों का संकेत होती हैं। कई मामलों में इसी तरह की कार्रवाइयों के बाद निवेश प्रतिबंध, सरकारी अनुबंधों पर रोक या अन्य आर्थिक सीमाएं लागू की गई हैं। इसलिए निवेशक और उद्योग जगत इस घटनाक्रम को गंभीरता से देख रहे हैं।

वैश्विक बाजारों में भी इस फैसले पर नजर रखी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और चीन के बीच तनाव और बढ़ता है तो इसका असर अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखलाओं, तकनीकी साझेदारियों और विदेशी निवेश पर पड़ सकता है। विशेष रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक वाहन जैसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा और अधिक तीखी हो सकती है।

चीन का तर्क है कि अमेरिका अपनी आर्थिक और तकनीकी बढ़त बनाए रखने के लिए सुरक्षा संबंधी चिंताओं का उपयोग कर रहा है। बीजिंग का कहना है कि इस तरह की नीतियां वैश्विक निवेश माहौल को प्रभावित कर सकती हैं और अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था में अनिश्चितता बढ़ा सकती हैं। दूसरी ओर अमेरिका का मानना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जोखिमों को देखते हुए सावधानी बरतना आवश्यक है।

पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच कई बार व्यापारिक और तकनीकी टकराव सामने आ चुके हैं। अमेरिका ने पहले भी कई चीनी कंपनियों पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लगाए हैं, जबकि चीन ने भी जवाबी कदम उठाकर अपनी असहमति जताई है। इस वजह से दोनों देशों के संबंधों में समय-समय पर तनाव देखने को मिलता रहा है।

फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि आने वाले समय में यह विवाद किस दिशा में आगे बढ़ता है। एक तरफ दोनों देश संवाद और सहयोग की बात करते हैं, वहीं दूसरी तरफ ऐसे फैसले आपसी अविश्वास को उजागर करते हैं। चूंकि अमेरिका और चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था की दो सबसे बड़ी शक्तियां हैं, इसलिए उनके बीच बढ़ता तनाव केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं है। इसका प्रभाव अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तकनीकी उद्योग, निवेशकों और वैश्विक बाजारों पर भी व्यापक रूप से पड़ सकता है।