ओमान के डुक्म पोर्ट के समीप खड़े एक वाणिज्यिक जहाज पर तैनात भारतीय नाविक की मौत के बाद नया विवाद खड़ा हो गया है। मृतक की पहचान निशांत उर्थनाथन के रूप में हुई है, जो मोटर टैंकर एमटी सेलेस्टियल सी में सेकेंड ऑफिसर के पद पर कार्यरत थे। घटना को लेकर सामने आए दस्तावेजों और जहाज के चालक दल के बयानों में दावा किया गया है कि बीमार पड़ने के बाद निशांत के लिए कई बार आपातकालीन सहायता मांगी गई, लेकिन समय पर मदद नहीं पहुंच सकी। अब आरोप यह भी लगाया जा रहा है कि मृतक के शव को जहाज से उतारने की प्रक्रिया में भी बाधाएं पैदा हो रही हैं।
भारतीय दूतावास ने इस दुखद घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं के कारण निशांत उर्थनाथन का निधन हुआ। हालांकि, उनकी मौत के हालात को लेकर लगातार नए दावे सामने आ रहे हैं, जिससे मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।
जानकारी के अनुसार, निशांत की तबीयत 8 जून को अचानक बिगड़नी शुरू हुई। जहाज के रिकॉर्ड के मुताबिक उन्होंने दोपहर के समय अस्वस्थ महसूस करने और लगातार उल्टियां होने की शिकायत की थी। स्थिति सामान्य न देखते हुए जहाज के अधिकारियों ने तत्काल कंपनी मुख्यालय को सूचना भेजी। साथ ही रेडियो संचार प्रणाली के माध्यम से समुद्री क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी नौसेना से भी चिकित्सकीय सहायता की मांग की गई।
जहाज के चालक दल का कहना है कि शुरुआती सूचना भेजने के बाद काफी समय तक किसी प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं मिली। इस बीच निशांत की हालत लगातार खराब होती चली गई। क्रू मेंबर्स के अनुसार, कुछ घंटों के भीतर उनकी उल्टियों की संख्या तेजी से बढ़ गई और उन्हें हर कुछ मिनट में उल्टी होने लगी। जहाज पर उपलब्ध प्राथमिक चिकित्सा सुविधाओं का उपयोग करते हुए उन्हें उल्टी रोकने की दवा दी गई, लेकिन कोई खास सुधार नहीं हुआ।
शाम होते-होते स्थिति और गंभीर हो गई। चालक दल ने फिर से मदद के लिए संपर्क साधने की कोशिश की। दावा किया गया है कि समुद्री संचार चैनल के जरिए बार-बार संदेश भेजे गए, लेकिन अपेक्षित सहायता नहीं मिल सकी। रात तक निशांत को लगातार निगरानी में रखा गया और उपलब्ध चिकित्सा संसाधनों से उनका इलाज करने का प्रयास जारी रहा।
अगले दिन यानी 9 जून को उल्टियां कुछ कम हुईं, लेकिन उनके शरीर में दर्द और कमजोरी बनी रही। जहाज पर मौजूद कर्मचारियों ने उन्हें तरल आहार, ओआरएस, पानी और हल्का भोजन दिया। कंपनी को लगातार स्वास्थ्य अपडेट भेजे जाते रहे ताकि आवश्यक चिकित्सा व्यवस्था की जा सके। हालांकि समुद्र में होने के कारण तत्काल विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध नहीं हो पाया।
बताया जा रहा है कि 10 जून को भी निशांत की स्थिति पूरी तरह सामान्य नहीं हुई थी। जहाज प्रबंधन ने एक बार फिर बाहरी सहायता प्राप्त करने की कोशिश की। चालक दल का कहना है कि उन्होंने कई बार रेडियो संदेशों के जरिए स्थिति की गंभीरता बताई। इसके साथ ही एजेंटों और अन्य माध्यमों से भी तटीय चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया गया। डॉक्टरों की ओर से मिली सलाह के अनुसार दवाइयां दी जाती रहीं, लेकिन स्वास्थ्य में अपेक्षित सुधार नहीं आया।
जहाज के कैप्टन राजेंद्र यादव और अन्य कर्मचारियों के हस्ताक्षर वाले एक पत्र में दावा किया गया है कि बीमार नाविक की हालत को लेकर बार-बार जानकारी साझा की गई थी। दस्तावेज में यह भी उल्लेख किया गया है कि हर संभव प्रयास के बावजूद समय रहते मेडिकल इवैक्युएशन या विशेषज्ञ उपचार उपलब्ध नहीं कराया जा सका।
स्थिति ने 11 जून को दुखद मोड़ ले लिया, जब निशांत उर्थनाथन की मौत हो गई। चालक दल के अनुसार, उनकी सांसें थमने से पहले तक जहाज पर मौजूद लोग उन्हें बचाने की कोशिश करते रहे। घटना के बाद पूरे जहाज में शोक का माहौल फैल गया और सहकर्मियों ने गहरा दुख व्यक्त किया।
मामले को लेकर विवाद तब और बढ़ गया जब कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह दावा सामने आया कि अमेरिकी नौसेना ने सहायता संबंधी संदेशों पर उचित प्रतिक्रिया नहीं दी। रिपोर्टों में कहा गया है कि बीमारी की जानकारी बार-बार दिए जाने के बावजूद तत्काल राहत नहीं पहुंचाई गई। हालांकि इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों की ओर से अभी तक कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
इसके अलावा एक और गंभीर दावा यह किया जा रहा है कि मृतक के शव को जहाज से बाहर लाने और आगे की प्रक्रिया पूरी करने में भी देरी हो रही है। इस संबंध में विभिन्न स्तरों पर बातचीत जारी बताई जा रही है। हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है।
घटना के बाद भारतीय समुदाय और समुद्री क्षेत्र से जुड़े कई लोगों ने चिंता जताई है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों पर काम करने वाले नाविकों की सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर स्पष्ट और प्रभावी व्यवस्था होना बेहद जरूरी है। समुद्र में किसी भी चिकित्सा आपातकाल की स्थिति में समय पर सहायता मिलना जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर साबित हो सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी जहाज पर गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति मौजूद हो तो त्वरित चिकित्सा सहायता, हेलीकॉप्टर निकासी या नजदीकी बंदरगाह तक पहुंचाने जैसी व्यवस्थाएं अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। ऐसे मामलों में संचार व्यवस्था और संबंधित एजेंसियों की प्रतिक्रिया भी निर्णायक भूमिका निभाती है।
फिलहाल भारतीय दूतावास मामले पर नजर बनाए हुए है और मृतक के परिवार को हर संभव सहायता देने की बात कही गई है। वहीं, घटना से जुड़े सभी दावों और परिस्थितियों की जांच की मांग भी उठने लगी है। निशांत उर्थनाथन की मौत ने समुद्री सुरक्षा, आपातकालीन चिकित्सा सहायता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जुड़े कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब आने वाले दिनों में सामने आ सकते हैं।