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रुपये की कमजोरी पर वित्त मंत्री का बड़ा बयान, बोलीं- वैश्विक तनाव, आयात और विदेशी निवेश का सीधा पड़ता है असर

डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में हाल के समय में आई कमजोरी को लेकर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने विस्तार से अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि मुद्रा विनिमय दर किसी एक वजह से प्रभावित नहीं होती, बल्कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों, विदेशी निवेश के रुख, कच्चे तेल और सोने जैसे आयात पर निर्भरता सहित कई आर्थिक कारक मिलकर इसकी दिशा तय करते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) का उद्देश्य रुपये को किसी तय स्तर पर बनाए रखना नहीं है, बल्कि बाजार में जरूरत पड़ने पर अत्यधिक अस्थिरता को कम करना है।

बेंगलुरु के निकट देवनहल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से बातचीत में वित्त मंत्री ने कहा कि वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रमों का असर दुनिया की लगभग हर अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अनिश्चितता और प्रमुख देशों की आर्थिक नीतियां भारतीय मुद्रा पर भी प्रभाव डालती हैं। ऐसे समय में डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव बन सकता है।

सीतारमण ने कहा कि भारत ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर कच्चे तेल का आयात करता है। इसके अलावा उर्वरक और सोने की खरीद के लिए भी विदेशी मुद्रा में भुगतान करना पड़ता है। जब इन वस्तुओं के आयात का बिल बढ़ता है तो डॉलर की मांग भी बढ़ जाती है, जिसका असर सीधे तौर पर रुपये की विनिमय दर पर दिखाई देता है। यही कारण है कि वैश्विक बाजार में तेल या सोने की कीमतों में बदलाव भारत की मुद्रा पर असर डाल सकता है।

उन्होंने आरबीआई की भूमिका पर भी विस्तार से प्रकाश डाला। उनके अनुसार, केंद्रीय बैंक तब हस्तक्षेप करता है जब बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। यह हस्तक्षेप विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करके किया जाता है ताकि अचानक आने वाली अस्थिरता को नियंत्रित किया जा सके। हालांकि, यह प्रक्रिया सीमित होती है और केवल आवश्यकता पड़ने पर ही अपनाई जाती है। उनका कहना था कि आरबीआई विनिमय दर को कृत्रिम रूप से नियंत्रित करने के बजाय बाजार में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता है।

वित्त मंत्री ने यह भी बताया कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति का भारतीय रुपये पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। यदि अमेरिका में ब्याज दरों को बढ़ाने या घटाने के संकेत मिलते हैं तो वैश्विक निवेशकों की रणनीति बदल जाती है। इससे पूंजी का प्रवाह विभिन्न देशों के बीच बदल सकता है और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राओं में उतार-चढ़ाव देखने को मिलता है। भारत भी इससे अछूता नहीं रहता।

उन्होंने कहा कि केवल डॉलर ही नहीं, बल्कि जापानी येन, दक्षिण कोरियाई वॉन और अन्य प्रमुख मुद्राओं में होने वाले बदलाव भी वैश्विक मुद्रा बाजार को प्रभावित करते हैं। अलग-अलग देशों की आर्थिक स्थिति, केंद्रीय बैंकों की नीतियां और निवेशकों का विश्वास विनिमय दरों को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण तत्व हैं। इसलिए रुपये की चाल को केवल घरेलू परिस्थितियों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता।

विदेशी निवेशकों की गतिविधियों पर बात करते हुए सीतारमण ने कहा कि कई बार विदेशी संस्थागत निवेशक (एफआईआई) और प्रत्यक्ष विदेशी निवेशक (एफडीआई) अपने निवेश पर मुनाफा कमाने के बाद धन को दूसरे बाजारों में स्थानांतरित कर देते हैं। ऐसी स्थिति में विदेशी मुद्रा का बहिर्गमन बढ़ सकता है, जिससे रुपये और विदेशी मुद्रा भंडार दोनों पर दबाव पड़ता है। यह वैश्विक निवेश चक्र का सामान्य हिस्सा है और कई देशों की मुद्राओं पर इसका असर दिखाई देता है।

उर्वरक सब्सिडी का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कोविड काल के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में उर्वरकों की कीमतों में भारी उछाल आया था। इसके बावजूद सरकार ने किसानों पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ने दिया। उनके अनुसार, एक समय ऐसा था जब आयातित उर्वरक की एक बोरी की लागत लगभग 3,000 रुपये तक पहुंच गई थी, लेकिन किसानों को यह करीब 300 रुपये में उपलब्ध कराई गई। इस अंतर की भरपाई सरकार ने सब्सिडी के माध्यम से की ताकि कृषि क्षेत्र पर प्रतिकूल असर न पड़े।

वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था पिछले कई वर्षों से लगातार मजबूत प्रदर्शन कर रही है। उनके मुताबिक विनिर्माण, कृषि, सेवा क्षेत्र, लॉजिस्टिक्स और परिवहन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। आधिकारिक आंकड़ों और विभिन्न वैश्विक संस्थानों के आकलन में भी भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया गया है।

राज्यों को मिलने वाले वित्तीय आवंटन के मुद्दे पर भी उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि राज्यों के बीच संसाधनों का बंटवारा केंद्र सरकार की मनमर्जी से नहीं होता, बल्कि इसके लिए वित्त आयोग निर्धारित मानकों के आधार पर सिफारिशें करता है। आयोग विभिन्न राज्यों का अध्ययन कर जरूरतों और तय मानकों के अनुसार हिस्सा तय करता है, जिसके बाद केंद्र सरकार उसी व्यवस्था का पालन करती है।

कर्नाटक को लेकर उठाए गए सवालों पर सीतारमण ने कहा कि किसी राज्य द्वारा यह अपेक्षा करना कि उसके क्षेत्र से एकत्रित पूरा कर उसी को वापस मिल जाए, व्यावहारिक व्यवस्था नहीं है। संघीय ढांचे में कर संग्रह और संसाधनों का वितरण व्यापक राष्ट्रीय जरूरतों और वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार किया जाता है ताकि सभी राज्यों के बीच संतुलन बना रहे।

उन्होंने दोहराया कि मुद्रा बाजार कई परस्पर जुड़े आर्थिक और वैश्विक कारकों से संचालित होता है। भू-राजनीतिक संकट, तेल की कीमतें, विदेशी निवेश का प्रवाह, अंतरराष्ट्रीय ब्याज दरें, आयात की लागत और वैश्विक बाजार की धारणा जैसे तत्व मिलकर रुपये की दिशा तय करते हैं। ऐसे में किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

सीतारमण का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत बुनियाद पर आगे बढ़ रही है और सरकार का ध्यान आर्थिक स्थिरता बनाए रखने पर है। वहीं आरबीआई भी जरूरत पड़ने पर अपने विदेशी मुद्रा भंडार और अन्य उपायों के माध्यम से बाजार में हस्तक्षेप कर अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने का काम करता रहेगा। उनके अनुसार, यही संतुलित दृष्टिकोण लंबे समय में भारतीय वित्तीय प्रणाली और रुपये की स्थिरता के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।