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AI के दौर में बदल रहा रोजगार का गणित: 2030 तक लाखों नौकरियां होंगी प्रभावित, डिग्री के साथ नई स्किल्स बनेंगी सबसे बड़ी ताकत

जो युवा अपनी पढ़ाई पूरी कर चुके हैं, उनके लिए भी अवसर समाप्त नहीं हुए हैं। विशेषज्ञों का सुझाव है कि वे इंटर्नशिप, स्टार्टअप्स, गैर-सरकारी संस्थाओं या स्थानीय उद्योगों के साथ मिलकर वास्तविक समस्याओं पर AI आधारित समाधान विकसित करें। इस तरह का अनुभव रिज्यूमे को मजबूत बनाने के साथ-साथ कौशल भी बढ़ाता है।

भविष्य में ग्रेजुएशन की भूमिका को लेकर भी बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। फिलहाल अधिकांश कंपनियां आवेदन की प्रारंभिक छंटनी के लिए डिग्री को आवश्यक मानती हैं, लेकिन आने वाले वर्षों में व्यावहारिक कौशल, प्रोजेक्ट अनुभव और प्रोफेशनल क्रेडिट सिस्टम को अधिक महत्व मिलने की संभावना जताई जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि टेक उद्योग में एक बार अनुभव मिलने के बाद डिग्री से ज्यादा महत्व आपके काम और कौशल का होगा।

नौकरी पाने के इच्छुक युवाओं के लिए सलाह दी जा रही है कि वे खुद को सामान्य कर्मचारी की बजाय अधिक उत्पादक पेशेवर बनाएं। यदि कोई व्यक्ति AI की सहायता से कम समय में बेहतर परिणाम दे सकता है और कंपनी की लागत बचा सकता है, तो उसे बेहतर वेतन और तेज करियर ग्रोथ मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

हालांकि AI कोर्सों के नाम पर चल रहे दावों को लेकर भी विशेषज्ञ सावधानी बरतने की सलाह देते हैं। केवल किसी संस्थान से प्रमाणपत्र हासिल कर लेना नौकरी की गारंटी नहीं है। वास्तविक अवसर उन्हीं को मिलेंगे जिनके पास बुनियादी विषयों की मजबूत समझ, AI का व्यावहारिक उपयोग और चयन प्रक्रिया में सफल होने की क्षमता होगी।

एंट्री लेवल नौकरियों पर फिलहाल दबाव जरूर महसूस किया जा रहा है। कई ऐसे कार्य जिन्हें पहले बड़ी टीम मिलकर करती थी, अब सीमित संख्या में कर्मचारी AI की मदद से पूरा कर रहे हैं। कुछ प्रमुख आईटी कंपनियों ने हाल के समय में फ्रेशर्स की भर्ती धीमी की है, लेकिन विशेषज्ञ इसे स्थायी स्थिति नहीं मानते। उनका मानना है कि लंबी अवधि में नई तकनीकों के कारण नए प्रकार के रोजगार भी बड़ी संख्या में पैदा होंगे।

इसी बीच भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCC) तेजी से विस्तार कर रहे हैं। इन केंद्रों में AI और डिजिटल तकनीकों की समझ रखने वाले युवाओं की मांग लगातार बढ़ रही है और उन्हें आकर्षक वेतन पैकेज भी मिल रहे हैं। उद्योग जगत का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में ऐसे केंद्र रोजगार सृजन का बड़ा माध्यम बन सकते हैं।

AI के पूरी तरह इंसानों की जगह लेने की आशंका पर भी विशेषज्ञों की अलग राय है। उनका कहना है कि कई मामलों में AI सिस्टम को चलाने की लागत भी कम नहीं होती। कई कंपनियां यह महसूस कर रही हैं कि कुछ परिस्थितियों में दो प्रशिक्षित कर्मचारियों को नियुक्त करना अत्यधिक महंगे AI संसाधनों के उपयोग से अधिक व्यावहारिक हो सकता है। विशेष रूप से ऐसे कार्य जिनमें मानवीय संवेदनशीलता, निर्णय क्षमता और लोगों के साथ संवाद आवश्यक हो, वहां इंसानों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी।

भविष्य के लिए चार मानवीय गुण सबसे अधिक मूल्यवान माने जा रहे हैं—जटिल जानकारियों को जोड़ने और समझने की क्षमता, प्रभावी निर्णय लेना, उच्च भावनात्मक बुद्धिमत्ता और स्पष्ट संचार कौशल। हॉस्पिटैलिटी, डेटा साइंस, सेल्स और AI का उपयोग करने वाले विशेषज्ञ पेशों में इन गुणों की मांग लगातार बनी रहने की संभावना है।

शिक्षा क्षेत्र में बदलाव का सबसे बड़ा उदाहरण चीन में देखने को मिला है। वर्ष 2021 से 2025 के बीच वहां के विश्वविद्यालयों ने 12,200 से अधिक स्नातक कार्यक्रमों को बंद या निलंबित कर दिया, जबकि लगभग 10,200 नए पाठ्यक्रम शुरू किए गए। इनमें विशेष जोर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, सेमीकंडक्टर और अन्य उभरती तकनीकों से जुड़े विषयों पर दिया गया। कई कला, मानविकी, विदेशी भाषाओं और प्रबंधन संबंधी कार्यक्रमों में कटौती भी की गई ताकि उद्योग की नई जरूरतों के अनुरूप प्रतिभा तैयार की जा सके।

भारत में भी बदलाव के संकेत दिखाई दे रहे हैं। कर्नाटक सरकार ने कम दाखिलों और अन्य कारणों का हवाला देते हुए 2026-27 सत्र के लिए सरकारी कॉलेजों में सैकड़ों बीए, बीएससी और बीकॉम संयोजनों को बंद करने तथा 1,300 से अधिक पाठ्यक्रमों की सीटें कम करने का फैसला लिया है। इससे साफ है कि उच्च शिक्षा संस्थान भी बदलती आर्थिक और तकनीकी जरूरतों के अनुसार अपनी संरचना में बदलाव कर रहे हैं।

कुल मिलाकर विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाला समय डिग्री बनाम AI का नहीं, बल्कि डिग्री और AI कौशल के संयोजन का होगा। जो छात्र और पेशेवर समय रहते नई तकनीकों को अपनाकर खुद को लगातार अपडेट करेंगे, वही बदलते रोजगार बाजार में सबसे मजबूत स्थिति में रहेंगे।