कई महीनों से जारी तनाव और सैन्य टकराव के बाद अमेरिका और ईरान ने आखिरकार शांति की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया है। दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व ने एक प्रारंभिक समझौते पर डिजिटल हस्ताक्षर कर दिए हैं, जिसके बाद युद्धविराम लागू हो गया है। इस समझौते में कुल 14 प्रमुख बिंदु शामिल हैं, जो आने वाले 60 दिनों में दोनों देशों के संबंधों की नई दिशा तय करेंगे।
समझौते के तहत सबसे अहम लक्ष्य एक व्यापक और अंतिम समझौते तक पहुंचना है। इसके लिए अमेरिका और ईरान ने अधिकतम 60 दिन का समय निर्धारित किया है। हालांकि जरूरत पड़ने पर यह अवधि दोनों देशों की सहमति से बढ़ाई भी जा सकती है।
डील के सबसे चर्चित पहलुओं में से एक ईरान के पुनर्निर्माण के लिए प्रस्तावित 300 अरब डॉलर का फंड है। भारतीय मुद्रा में इसकी कीमत लगभग 28 लाख करोड़ रुपए बैठती है। यह राशि सीधे अमेरिका नहीं देगा, बल्कि खाड़ी देशों की भागीदारी से फंड तैयार किए जाने की संभावना जताई गई है। अंतिम समझौते के बाद ही तय होगा कि पैसा कहां से आएगा और उसका उपयोग किन परियोजनाओं में होगा।
इसके साथ ही अमेरिका ने संकेत दिया है कि वह ईरान पर वर्षों से लागू आर्थिक प्रतिबंधों को चरणबद्ध तरीके से हटाने की प्रक्रिया शुरू करेगा। प्रतिबंधों में राहत मिलने से ईरानी अर्थव्यवस्था को बड़ी मदद मिल सकती है, क्योंकि बैंकिंग, व्यापार, बीमा और अंतरराष्ट्रीय लेनदेन पर लगी कई बाधाएं धीरे-धीरे समाप्त हो जाएंगी।
तेल निर्यात को लेकर भी ईरान को महत्वपूर्ण राहत मिलने वाली है। अमेरिकी प्रशासन आवश्यक मंजूरियां जारी करेगा, जिससे ईरान दोबारा वैश्विक बाजार में अपना कच्चा तेल बेच सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम ईरान की विदेशी मुद्रा आय को तेज गति से बढ़ा सकता है और उसकी अर्थव्यवस्था को तत्काल राहत दे सकता है।
समझौते का एक और बड़ा हिस्सा ईरानी संपत्तियों से जुड़ा है, जो वर्षों से विदेशों में फ्रीज पड़ी हैं। अमेरिका ने इन्हें चरणबद्ध तरीके से रिलीज करने का वादा किया है। अनुमान लगाया जा रहा है कि यह राशि 24 अरब डॉलर से अधिक हो सकती है। हालांकि धन जारी करने की सटीक प्रक्रिया पर अभी आगे बातचीत होनी बाकी है।
होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर भी महत्वपूर्ण सहमति बनी है। ईरान ने आश्वासन दिया है कि वह इस समुद्री मार्ग को फिर से पूरी तरह खोल देगा। अगले 60 दिनों तक यहां से गुजरने वाले जहाजों से कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लिया जाएगा। हालांकि समझौते में यह भी स्पष्ट है कि यह व्यवस्था सिर्फ 60 दिन के लिए लागू होगी। इसके बाद शुल्क व्यवस्था को लेकर नए फैसले संभव हैं।
यही कारण है कि वैश्विक व्यापार जगत इस बिंदु पर खास नजर बनाए हुए है। यदि भविष्य में जहाजों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है तो अंतरराष्ट्रीय समुद्री परिवहन की लागत बढ़ सकती है, जिसका असर दुनिया भर की सप्लाई चेन पर पड़ सकता है।
सैन्य मोर्चे पर भी कई अहम निर्णय लिए गए हैं। अमेरिका ने वादा किया है कि वह ईरानी बंदरगाहों पर लागू नौसैनिक नाकेबंदी को 30 दिनों के भीतर पूरी तरह समाप्त कर देगा। इससे ईरान को अपने बंदरगाहों के माध्यम से व्यापार और निर्यात गतिविधियां सामान्य करने का अवसर मिलेगा।
समझौते के अनुसार अमेरिका, ईरान और उनके सहयोगी देशों के बीच चल रही सभी सैन्य कार्रवाइयों को तत्काल और स्थायी रूप से रोक दिया जाएगा। इस प्रावधान में क्षेत्रीय संघर्षों को भी शामिल किया गया है। माना जा रहा है कि इसका प्रभाव लेबनान समेत पश्चिम एशिया के कई संवेदनशील क्षेत्रों पर पड़ सकता है।
परमाणु कार्यक्रम इस पूरे समझौते का सबसे संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषय बना हुआ है। ईरान ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि वह परमाणु हथियार विकसित नहीं करेगा और न ही उन्हें हासिल करने की कोशिश करेगा। हालांकि यह वादा पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय समझौतों में किया जा चुका है।
इसके अलावा ईरान के पास मौजूद संवर्धित यूरेनियम के विशाल भंडार को लेकर भी नई व्यवस्था प्रस्तावित की गई है। समझौते के अनुसार लगभग 11 टन संवर्धित सामग्री को इस स्तर तक कम किया जाएगा कि उसका उपयोग परमाणु हथियार निर्माण में न किया जा सके। इस प्रक्रिया को तकनीकी भाषा में डाउन-ब्लेंडिंग कहा जाता है।
इन भंडारों में करीब 440 किलोग्राम ऐसा यूरेनियम भी शामिल है जिसे 60 प्रतिशत तक संवर्धित किया जा चुका है। विशेषज्ञ इसे परमाणु हथियार निर्माण के लिए आवश्यक स्तर के काफी करीब मानते हैं। इसलिए इस सामग्री के भविष्य को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय विशेष रुचि दिखा रहा है।
हालांकि कई महत्वपूर्ण प्रश्न अभी भी अनुत्तरित हैं। उदाहरण के लिए यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि ईरान अपने पास मौजूद यूरेनियम भंडार को देश के भीतर रख सकेगा या नहीं। इसी तरह यह भी तय नहीं हुआ है कि उसे भविष्य में यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिलेगी या उस पर लंबी अवधि की रोक लगेगी।
परमाणु गतिविधियों की निगरानी के लिए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) की भूमिका भी तय की गई है। एजेंसी यह सुनिश्चित करेगी कि ईरान अपने परमाणु वादों का पालन कर रहा है और संवर्धित सामग्री को हथियार निर्माण योग्य स्तर पर नहीं पहुंचा रहा।
दोनों देशों ने यह भी तय किया है कि अंतिम समझौते तक कोई भी पक्ष मौजूदा स्थिति में बड़ा बदलाव नहीं करेगा। इसका मतलब है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम का विस्तार नहीं करेगा, जबकि अमेरिका नए प्रतिबंध या अतिरिक्त सैन्य दबाव बनाने से बचेगा।
डील में एक संयुक्त निगरानी तंत्र बनाने का भी प्रस्ताव रखा गया है। यह व्यवस्था समझौते के हर बिंदु पर नजर रखेगी और यह जांच करेगी कि दोनों देश अपनी-अपनी जिम्मेदारियां पूरी कर रहे हैं या नहीं। निगरानी प्रणाली परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक राहत, प्रतिबंध हटाने और समयसीमा के पालन जैसे विषयों की नियमित समीक्षा करेगी।
राजनीतिक स्तर पर भी दोनों देशों ने एक-दूसरे की संप्रभुता और सीमाओं का सम्मान करने की प्रतिबद्धता जताई है। समझौते में साफ कहा गया है कि कोई भी पक्ष दूसरे देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। इस प्रावधान को लेकर विभिन्न राजनीतिक समूहों की अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं।
आगे की प्रक्रिया के तहत दोनों देशों को युद्धविराम बनाए रखने, तेल निर्यात बहाल करने, होर्मुज मार्ग को खुला रखने, नौसैनिक नाकेबंदी समाप्त करने और फ्रीज्ड संपत्तियों की वापसी जैसे शुरुआती कदमों पर काम करना होगा। इन उपायों को अंतिम समझौते की दिशा में भरोसा बढ़ाने वाले कदम माना जा रहा है।
यदि आने वाले 60 दिनों में व्यापक समझौता तैयार हो जाता है, तो उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के समक्ष मंजूरी के लिए पेश किया जाएगा। ऐसा होने पर यह केवल द्विपक्षीय समझौता नहीं रहेगा, बल्कि उसे अंतरराष्ट्रीय कानूनी मान्यता भी मिल जाएगी।
फिलहाल दुनिया की निगाहें इसी बात पर टिकी हैं कि क्या अमेरिका और ईरान अगले दो महीनों में उन कठिन मुद्दों पर भी सहमति बना पाएंगे, जो दशकों से दोनों देशों के बीच अविश्वास और टकराव का कारण बने हुए हैं। परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों की समाप्ति और क्षेत्रीय सुरक्षा से जुड़े सवालों का समाधान ही इस ऐतिहासिक पहल की वास्तविक सफलता तय करेगा।