ब्रिटेन की राजनीति में इन दिनों एंडी बर्नहैम का नाम तेजी से चर्चा में है। प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के इस्तीफे के बाद लेबर पार्टी के भीतर नए नेतृत्व को लेकर हलचल तेज हो गई है और बर्नहैम ने प्रधानमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पेश कर दी है। 19 जून को मेकरफील्ड सीट से उपचुनाव जीतकर संसद में वापसी करने वाले बर्नहैम को अब पार्टी के संभावित बड़े चेहरे के तौर पर देखा जा रहा है। उनकी लोकप्रियता और जमीनी पकड़ ने उन्हें लेबर पार्टी के अंदर मजबूत दावेदार बना दिया है।
लेकिन एंडी बर्नहैम की राजनीतिक यात्रा किसी आम नेता जैसी नहीं रही। उन्होंने राजनीति में कदम किसी राजनीतिक परिवार या बड़े नेता की प्रेरणा से नहीं, बल्कि एक टीवी सीरियल देखकर रखा था। आज वही नेता ब्रिटेन के प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल हैं।
एक टीवी शो ने बदली जिंदगी की दिशा
एंडी बर्नहैम का जन्म 1970 में लिवरपूल में हुआ था। हालांकि उनका बचपन चेशायर के कुलचेथ गांव में गुजरा। उनके पिता ब्रिटेन की टेलीकॉम कंपनी BT में इंजीनियर थे और मां एक क्लिनिक में काम करती थीं। उनका परिवार शुरू से ही लेबर पार्टी की विचारधारा से जुड़ा हुआ था।
बर्नहैम बताते हैं कि राजनीति में आने का विचार उन्हें 14 साल की उम्र में आया, जब उन्होंने BBC का मशहूर ड्रामा ‘बॉयज फ्रॉम द ब्लैकस्टफ’ देखा। यह सीरियल लिवरपूल में बेरोजगारी और आर्थिक परेशानियों से जूझते लोगों की कहानी दिखाता था। इस शो ने बर्नहैम पर इतना प्रभाव डाला कि उन्होंने समाज और आम लोगों की समस्याओं को समझने के लिए राजनीति में आने का फैसला किया।
कैम्ब्रिज में पढ़ाई और संगीत ने बदला नजरिया
बर्नहैम ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इंग्लिश लिटरेचर की पढ़ाई की। हालांकि वहां का माहौल उनके लिए शुरुआत में आसान नहीं था। अपनी किताब ‘हेड नॉर्थ’ में उन्होंने लिखा कि कई बार उन्हें ऐसा महसूस होता था कि वह उस जगह के नहीं हैं और खुद को बाहरी व्यक्ति समझते थे। यूनिवर्सिटी के दिनों में संगीत ने भी उनके व्यक्तित्व को प्रभावित किया। मैनचेस्टर के इंडी म्यूजिक बैंड्स जैसे द स्मिथ्स और द स्टोन रोजेज के गानों ने उनके सोचने के तरीके को बदला।
इसी दौरान उनकी मुलाकात नीदरलैंड में जन्मीं मैरी-फ्रांस वैन हील से हुई। दोनों के बीच दोस्ती आगे चलकर रिश्ते में बदली और साल 2000 में दोनों ने शादी कर ली। आज उनके तीन बच्चे हैं।
राजनीति से पहले पत्रकारिता में बनाया करियर
एंडी बर्नहैम ने अपने करियर की शुरुआत सीधे चुनावी राजनीति से नहीं की थी। ग्रेजुएशन के बाद उन्होंने पत्रकारिता की दुनिया में कदम रखा और कई पत्रिकाओं में काम किया। 20 साल की उम्र में उन्हें राजनीति में पहला बड़ा मौका मिला, जब वह लेबर सांसद टेसा जोवेल के रिसर्चर बने। इसके बाद उन्होंने पार्टी के अंदर तेजी से अपनी जगह बनाई।
वह संस्कृति मंत्री क्रिस स्मिथ के सलाहकार रहे और 2001 में पहली बार ग्रेटर मैनचेस्टर की लीघ सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद उन्होंने टोनी ब्लेयर सरकार में जूनियर मंत्री के रूप में काम किया। गॉर्डन ब्राउन के प्रधानमंत्री बनने के बाद उनका राजनीतिक कद और बढ़ा। उन्होंने वित्त, संस्कृति और स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाली।
प्रधानमंत्री बनने की कोशिश में दो बार मिली हार
2010 में लेबर पार्टी की हार के बाद बर्नहैम ने पार्टी नेतृत्व संभालने की कोशिश की, लेकिन वह चुनाव में सफल नहीं हो सके। पांच उम्मीदवारों की दौड़ में वह चौथे नंबर पर रहे और एड मिलिबैंड पार्टी नेता बने। 2015 में उन्होंने दोबारा पार्टी नेतृत्व के लिए चुनाव लड़ा, लेकिन इस बार भी उन्हें हार का सामना करना पड़ा। जेरेमी कॉर्बिन ने यह मुकाबला जीत लिया।
लगातार दो हार के बावजूद बर्नहैम ने पार्टी कार्यकर्ताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी। वह लगातार जमीनी राजनीति से जुड़े रहे और समर्थकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।
ब्रेक्जिट से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक अलग पहचान
ब्रेक्जिट के मुद्दे पर बर्नहैम का रुख साफ रहा। उन्होंने 2016 के जनमत संग्रह में ब्रिटेन के यूरोपीय संघ में बने रहने का समर्थन किया था। बाद में उन्होंने कहा कि वह अपने जीवन में ब्रिटेन को दोबारा यूरोपीय संघ का हिस्सा बनते देखना चाहते हैं। हालांकि उनके राजनीतिक रुख को लेकर कई बार आलोचना भी हुई और विरोधियों ने उन पर समय के साथ अपनी स्थिति बदलने के आरोप लगाए।
मेयर बनने के बाद मिली ‘किंग ऑफ द नॉर्थ’ की पहचान
2017 में बर्नहैम ने वेस्टमिंस्टर की राजनीति से कुछ समय दूरी बनाई और ग्रेटर मैनचेस्टर के पहले सीधे चुने गए मेयर का चुनाव लड़ा। उन्होंने भारी समर्थन के साथ जीत हासिल की। 2021 में उन्होंने दोबारा बड़ी जीत दर्ज की। कोरोना महामारी के दौरान उनकी लोकप्रियता तेजी से बढ़ी। उन्होंने केंद्र सरकार पर उत्तरी इंग्लैंड के साथ भेदभाव करने का आरोप लगाया और लंदन की सत्ता के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई।
उनके इस आक्रामक रुख के बाद मीडिया ने उन्हें ‘किंग ऑफ द नॉर्थ’ कहना शुरू कर दिया।
अपनी पार्टी की नीतियों पर भी उठाए सवाल
कीर स्टार्मर के नेतृत्व वाली सरकार बनने के बाद भी बर्नहैम ने अपनी राय खुलकर रखी। उन्होंने सरकार की आर्थिक नीतियों, खर्च और कर्ज से जुड़े फैसलों पर सवाल उठाए। इसके कारण पार्टी के कुछ नेताओं ने उनकी आलोचना भी की, लेकिन समर्थकों के बीच उनकी लोकप्रियता बनी रही।
2025 तक उन्हें लेबर पार्टी के भविष्य के बड़े नेताओं में गिना जाने लगा था। जब ग्रेटर मैनचेस्टर के सांसद एंड्रयू ग्विन ने अपनी सीट छोड़ने की घोषणा की, तो बर्नहैम की संसद वापसी की चर्चा तेज हो गई।
उपचुनाव जीतकर फिर पहुंचे संसद
शुरुआत में लेबर पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार नहीं बनाया, लेकिन बाद में मेकरफील्ड सीट खाली होने के बाद उन्हें मौका मिला। जोश साइमंस के सीट छोड़ने के बाद बर्नहैम को उम्मीदवार बनाया गया और उन्होंने उपचुनाव जीतकर वेस्टमिंस्टर में वापसी कर ली।
यह जीत उनके लिए सिर्फ सांसद बनने की वापसी नहीं थी, बल्कि प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल होने का रास्ता भी खोल गई। क्योंकि पार्टी नेता बनने के लिए संसद सदस्य होना जरूरी है।
आम लोगों से जुड़ने की कला सबसे बड़ी ताकत
मैनचेस्टर यूनिवर्सिटी के राजनीति विशेषज्ञों के अनुसार, बर्नहैम की सबसे बड़ी ताकत उनकी संवाद शैली है। वह कठिन राजनीतिक मुद्दों को भी सरल भाषा में जनता के सामने रखते हैं। उनकी छवि ऐसे नेता की है जो आम लोगों की परेशानियों को समझते हैं और उन्हें अपनी बातों में जगह देते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यही खूबी उन्हें कई दूसरे नेताओं से अलग बनाती है। जहां कुछ नेता तकनीकी और प्रशासनिक छवि के लिए जाने जाते हैं, वहीं बर्नहैम भावनात्मक जुड़ाव बनाने में सफल रहे हैं।
अब देखना होगा कि क्या ‘किंग ऑफ द नॉर्थ’ एंडी बर्नहैम ब्रिटेन की राजनीति में अगला बड़ा अध्याय लिख पाएंगे या नहीं।