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होर्मुज संकट से सबक, भारत बनाएगा बड़ा एनर्जी कवच: तेल के साथ LPG और LNG भंडारण बढ़ाने की तैयारी

मध्य पूर्व में बढ़े तनाव और ईंधन आपूर्ति को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता ने भारत को अपनी ऊर्जा सुरक्षा रणनीति पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर कर दिया है। ईरान से जुड़े हालिया हालात और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बनी चिंता ने दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातक देशों को यह एहसास करा दिया है कि केवल वैश्विक सप्लाई चेन पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। इसी को देखते हुए भारत अब कच्चे तेल के साथ-साथ एलपीजी और एलएनजी के लिए भी बड़े स्तर पर रणनीतिक भंडार तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

भारत की योजना एक ऐसे ऊर्जा सुरक्षा ढांचे को तैयार करने की है, जो किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट, युद्ध या सप्लाई बाधित होने की स्थिति में देश की जरूरतों को पूरा कर सके। सरकार का लक्ष्य ऐसा रिजर्व बनाना है, जिससे कम से कम एक महीने तक घरेलू मांग को संभाला जा सके। इस तरह भारत उन देशों की रणनीति अपनाने की कोशिश कर रहा है, जिन्होंने पहले से बड़े पैमाने पर ऊर्जा भंडार तैयार कर रखे हैं।

पेट्रोलियम मंत्रालय ने शुरू किया बड़ा प्लान

ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए पेट्रोलियम मंत्रालय ने एक विशेष समिति बनाई है। यह समिति देश में नए रणनीतिक भंडारण केंद्रों की संभावनाओं का अध्ययन करेगी। इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि भविष्य के लिए तेल, गैस और अन्य ईंधनों को किस तरह सुरक्षित तरीके से स्टोर किया जा सकता है।

समिति यह तय करेगी कि भंडारण के लिए जमीन के ऊपर बने टैंक बेहतर होंगे या फिर भूमिगत गुफाओं जैसी संरचनाओं का इस्तेमाल किया जाए। साथ ही ऑपरेशन मॉडल, निवेश और लंबे समय तक रखरखाव जैसे पहलुओं पर भी विचार किया जाएगा।

सरकार का उद्देश्य सिर्फ मौजूदा क्षमता बढ़ाना नहीं है, बल्कि ऐसा सिस्टम तैयार करना है जो किसी भी बड़े वैश्विक संकट में भारत को मजबूती दे सके।

चीन से पीछे है भारत की रणनीतिक तैयारी

ऊर्जा खपत के मामले में भारत दुनिया के सबसे बड़े देशों में शामिल है, लेकिन रणनीतिक तेल भंडार के मामले में अभी भी चीन से काफी पीछे है। मौजूदा समय में भारत के पास करीब 3.9 करोड़ बैरल कच्चे तेल का रणनीतिक रिजर्व मौजूद है। यह मात्रा लगभग आठ दिनों के आयात के बराबर मानी जाती है।

इसके मुकाबले चीन ने काफी पहले से बड़े स्तर पर तेल भंडारण की नीति अपनाई है। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव या आपूर्ति संकट के दौरान चीन को अपेक्षाकृत कम दबाव झेलना पड़ता है।

हालांकि भारत की स्थिति पूरी तरह कमजोर नहीं है। अगर सरकारी रणनीतिक भंडार के अलावा निजी कंपनियों, रिफाइनरियों और तेल कारोबारियों के पास मौजूद व्यावसायिक स्टॉक को भी शामिल किया जाए तो देश के पास करीब 70 दिनों से ज्यादा की तेल जरूरत पूरी करने की क्षमता मौजूद है। फिर भी सरकार मानती है कि भविष्य की चुनौतियों को देखते हुए केवल मौजूदा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है और अतिरिक्त सुरक्षा कवच जरूरी है।

पांच साल में दोगुने से ज्यादा बढ़ेगा तेल भंडार

भारत अब अपने रणनीतिक कच्चे तेल भंडार को बड़े स्तर पर विस्तार देने की तैयारी कर रहा है। इसके लिए देश के पूर्वी और पश्चिमी समुद्री तटों के पास भूमिगत भंडारण सुविधाओं को विकसित किया जा रहा है।

इन भूमिगत गुफाओं में बड़ी मात्रा में कच्चा तेल सुरक्षित रखा जा सकता है और इन्हें आपातकालीन स्थिति में इस्तेमाल किया जा सकता है। योजना के तहत अगले पांच वर्षों में भारत अपनी मौजूदा क्षमता को काफी बढ़ाना चाहता है। सरकार का दीर्घकालिक लक्ष्य रणनीतिक तेल रिजर्व को लगभग 12 करोड़ बैरल तक पहुंचाना है। इससे भारत वैश्विक ऊर्जा संकट के समय ज्यादा आत्मनिर्भर तरीके से फैसले ले सकेगा।

LPG और LNG में सबसे बड़ी चुनौती

जहां कच्चे तेल के भंडारण पर भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है, वहीं रसोई गैस यानी LPG और प्राकृतिक गैस यानी LNG के लिए रणनीतिक रिजर्व बनाना आसान नहीं है।

इन दोनों ईंधनों की स्टोरेज तकनीक काफी जटिल है। LPG को तरल रूप में रखने के लिए बहुत अधिक दबाव की जरूरत होती है, जबकि LNG को बेहद कम तापमान पर संरक्षित करना पड़ता है। इसके कारण इनके भंडारण में सुरक्षा, तकनीक और लागत बड़ी चुनौती बन जाती है।

LPG या LNG के रिसाव की स्थिति में बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। इसलिए इनके स्टोरेज सिस्टम के लिए बेहद सख्त सुरक्षा मानकों की जरूरत होती है।

यही वजह है कि भारत में अभी तक इन दोनों गैसों का रणनीतिक भंडार बहुत सीमित है।

LPG रिजर्व सिर्फ कुछ दिनों की जरूरत के बराबर

एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की लंबी अवधि वाली LPG भंडारण क्षमता करीब 1.4 लाख टन है। यह क्षमता देश की कुल खपत के हिसाब से लगभग दो दिनों की जरूरत के बराबर है। यह भंडारण मुख्य रूप से देश के पूर्वी और पश्चिमी तटों पर मौजूद भूमिगत चट्टानी संरचनाओं में किया जाता है।

मंत्रालय अब सरकारी तेल कंपनियों के साथ मिलकर इस दिशा में काम कर रहा है कि आपातकालीन परिस्थितियों के लिए LPG का अतिरिक्त स्टॉक तैयार किया जा सके। इसका मकसद घरेलू उपभोक्ताओं को किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट के दौरान परेशानी से बचाना है।

भारत में LPG की मांग पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ी है। उज्ज्वला योजना समेत कई योजनाओं के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में भी LPG का इस्तेमाल बढ़ा है। ऐसे में पर्याप्त रिजर्व बनाना सरकार के लिए अहम हो गया है।

LNG के लिए अभी भी खाली है रणनीतिक रिजर्व

प्राकृतिक गैस यानी LNG के मामले में भारत की स्थिति और चुनौतीपूर्ण है। फिलहाल देश में LNG का कोई बड़ा रणनीतिक रिजर्व मौजूद नहीं है। LNG का इस्तेमाल बिजली उत्पादन, उद्योगों और शहरों में गैस सप्लाई के लिए किया जाता है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में अचानक सप्लाई बाधित होती है तो इसका असर कई क्षेत्रों पर पड़ सकता है।

सरकार ने LNG सुरक्षा को लेकर एक नीति मसौदा भी तैयार किया है। इसमें टर्मिनल ऑपरेटरों को अपनी सामान्य जरूरत से लगभग 10 प्रतिशत ज्यादा LNG स्टोरेज क्षमता रखने के लिए प्रोत्साहित करने का प्रस्ताव रखा गया है।

हालांकि LNG के लिए बड़े स्तर का रिजर्व तैयार करना अभी लंबी प्रक्रिया होगी क्योंकि इसके लिए महंगी तकनीक और विशेष इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता होती है।

होर्मुज संकट ने बढ़ाई चिंता

दुनिया के ऊर्जा बाजार में होर्मुज स्ट्रेट का महत्व बहुत ज्यादा है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है। किसी भी तरह की रुकावट का असर सीधे तेल और गैस की कीमतों पर पड़ सकता है। ईरान से जुड़े तनाव के दौरान भी यही चिंता सामने आई थी कि अगर सप्लाई बाधित हुई तो ऊर्जा आयात करने वाले देशों पर दबाव बढ़ सकता है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में शामिल है, इसलिए ऐसी परिस्थितियों में रणनीतिक भंडार देश की अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में अहम भूमिका निभा सकता है।

भारत की नई ऊर्जा नीति का फोकस

भारत अब केवल सस्ता ईंधन खरीदने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि भविष्य के लिए मजबूत सुरक्षा व्यवस्था बनाना चाहता है। कच्चे तेल, LPG और LNG तीनों के लिए बेहतर भंडारण क्षमता तैयार करना इसी रणनीति का हिस्सा है। चीन जैसे देशों से सीख लेते हुए भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। आने वाले वर्षों में अगर यह योजना सफल होती है तो किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट के समय भारत के पास पर्याप्त समय और विकल्प होंगे।

ऊर्जा सुरक्षा को लेकर यह बदलाव भारत की आर्थिक स्थिरता और रणनीतिक मजबूती दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।