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The Scoopp

 

ट्रम्प-पुतिन की लंबी बातचीत से लेकर यूरोप की सुरक्षा रणनीति तक, वैश्विक राजनीति में तेज हुई हलचल

दुनियाभर में सुरक्षा, कूटनीति और सैन्य रणनीतियों को लेकर एक बार फिर गतिविधियां तेज हो गई हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध, नाटो की तैयारियां, यूरोप की बदलती रक्षा नीति, अमेरिका की भूमिका और प्रवासियों के मुद्दे ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। इसी क्रम में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई लंबी टेलीफोन वार्ता, लिथुआनिया की परमाणु नीति में संभावित बदलाव, पोलैंड में पैट्रियट मिसाइलों को लेकर उठा विवाद और अमेरिकी मूल के पोप का मानवीय संदेश वैश्विक चर्चा का केंद्र बने हुए हैं।

करीब डेढ़ घंटे चली फोन वार्ता में रूस और अमेरिका के शीर्ष नेताओं ने कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय विषयों पर विचार-विमर्श किया। रूस के विदेश मंत्रालय के मुताबिक बातचीत लगभग 90 मिनट तक चली और इसमें यूक्रेन युद्ध सबसे प्रमुख मुद्दा रहा। मंत्रालय ने इस संवाद को सकारात्मक, व्यावहारिक और रचनात्मक करार दिया।

रूसी पक्ष के अनुसार, बातचीत की शुरुआत सौहार्दपूर्ण माहौल में हुई। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस की 250वीं वर्षगांठ के अवसर पर राष्ट्रपति ट्रम्प और अमेरिकी नागरिकों को शुभकामनाएं भी दीं। इसके बाद दोनों नेताओं ने वैश्विक सुरक्षा और मौजूदा भू-राजनीतिक हालात पर विस्तार से चर्चा की।

राष्ट्रपति ट्रम्प ने इस दौरान एक बार फिर यूक्रेन युद्ध को समाप्त कराने की दिशा में सहयोग देने की अपनी इच्छा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि संघर्ष को लंबे समय तक जारी रहने देने के बजाय ऐसा समाधान तलाशना जरूरी है जिससे स्थायी शांति स्थापित हो सके। रूस की ओर से भी यह दोहराया गया कि विवाद का समाधान राजनीतिक और कूटनीतिक माध्यमों से निकाला जाना चाहिए।

हालांकि, मॉस्को का कहना है कि उसकी सेना युद्धक्षेत्र में अपनी रणनीतिक बढ़त बनाए हुए है। रूस का आरोप है कि यूक्रेन और उसके यूरोपीय समर्थक देश संघर्ष को समाप्त करने के बजाय उसे लंबा खींच रहे हैं। दूसरी ओर पश्चिमी देशों का मानना है कि रूस की सैन्य कार्रवाई ही युद्ध जारी रहने का मुख्य कारण है।

इस बीच यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने भी पुष्टि की कि उनकी राष्ट्रपति ट्रम्प से बातचीत हुई है। जेलेंस्की ने इसे सकारात्मक बताते हुए कहा कि अमेरिका यदि सक्रिय भूमिका निभाए तो युद्ध समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हो सकती है। उन्होंने उम्मीद जताई कि भविष्य में कूटनीतिक प्रयास और तेज होंगे।

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब नाटो का आगामी शिखर सम्मेलन निकट है। माना जा रहा है कि इस बैठक में यूक्रेन युद्ध, यूरोप की सामूहिक सुरक्षा और रूस से जुड़े मुद्दे सबसे प्रमुख एजेंडे में शामिल रहेंगे।

इसी बीच रूस के साथ बढ़ते तनाव के कारण बाल्टिक क्षेत्र में भी सुरक्षा संबंधी तैयारियां तेज होती दिखाई दे रही हैं। लिथुआनिया ने अपने संविधान में संशोधन की प्रक्रिया शुरू करने का संकेत दिया है, जिससे भविष्य में देश में परमाणु हथियारों की तैनाती का रास्ता खुल सकता है।

जानकारी के अनुसार, 141 सदस्यीय संसद ‘सीमास’ के 51 सांसदों ने संविधान के अनुच्छेद-137 में बदलाव का प्रस्ताव पेश किया है। यह अनुच्छेद देश की सीमा के भीतर सामूहिक विनाश के हथियारों और विदेशी सैन्य अड्डों की तैनाती पर रोक लगाता है। सरकार का कहना है कि वर्तमान सुरक्षा परिस्थितियों को देखते हुए इस प्रावधान की समीक्षा आवश्यक हो गई है।

राष्ट्रपति गितानास नौसेदा ने भी इस पहल का समर्थन किया है। सरकार का तर्क है कि यूरोप में बदलते सामरिक हालात और रूस से जुड़े सुरक्षा जोखिमों को देखते हुए रक्षा नीति को अधिक लचीला बनाना समय की मांग है।

बाल्टिक देशों का लंबे समय से कहना रहा है कि रूस की सैन्य गतिविधियां उनके लिए चिंता का विषय हैं। हालांकि रूस लगातार इन आरोपों से इनकार करता आया है। मॉस्को का कहना है कि उसकी नाटो देशों पर हमला करने की कोई योजना नहीं है और पश्चिमी देश रूस के खतरे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर पूर्वी यूरोप में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

हाल के महीनों में पूर्वी यूरोप में नाटो की गतिविधियों में लगातार वृद्धि देखी गई है। कई रिपोर्टों में यह संभावना भी जताई गई है कि अमेरिका भविष्य में कुछ अतिरिक्त नाटो सदस्य देशों में परमाणु हथियारों की तैनाती पर विचार कर सकता है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

रूस ने इस तरह की संभावनाओं पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। मॉस्को का कहना है कि यदि नाटो का परमाणु ढांचा उसकी सीमाओं के और निकट लाया गया तो उसे प्रत्यक्ष सैन्य चुनौती माना जाएगा और उसके अनुरूप जवाबी कदम उठाए जाएंगे।

उधर पोलैंड में भी रक्षा उपकरणों को लेकर राजनीतिक विवाद गहराता जा रहा है। विपक्ष ने सरकार से यह स्पष्ट करने की मांग की है कि क्या यूक्रेन को गुप्त रूप से पैट्रियट एयर डिफेंस मिसाइलें भेजी गई हैं।

सोशल मीडिया पर सामने आए कुछ दावों में कहा गया कि मार्च महीने के दौरान अमेरिका निर्मित PAC-3 पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों का एक बैच पोलैंड से यूक्रेन भेजा गया था। हालांकि सरकार की ओर से अब तक इन दावों की पुष्टि नहीं की गई है।

पोलैंड की संसद के उपाध्यक्ष और विपक्षी नेता क्रिज़्टोफ बोसाक ने कहा कि यदि यह जानकारी सही साबित होती है तो यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर विषय है। उनका कहना है कि पैट्रियट मिसाइलें देश की वायु रक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, इसलिए ऐसे किसी भी निर्णय से पहले संसद की अनुमति अनिवार्य होनी चाहिए।

पूर्व रक्षा मंत्री मारियुश ब्लाश्चाक ने भी सरकार से कई सवाल पूछे हैं। उन्होंने जानना चाहा कि क्या वास्तव में यूक्रेन को मिसाइलें भेजी गईं और यदि ऐसा हुआ तो क्या इससे पोलैंड को अमेरिका से मिलने वाली अपनी रक्षा आपूर्ति पर कोई प्रभाव पड़ेगा।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब यूक्रेन युद्ध और पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण दुनिया भर में आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम की मांग तेजी से बढ़ रही है। कई देशों ने पैट्रियट प्रणाली खरीदने में रुचि दिखाई है, जबकि अमेरिका को भी उत्पादन और आपूर्ति की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि पोलैंड ने वास्तव में अपने रक्षा भंडार से मिसाइलें यूक्रेन को दी हैं, तो इससे उसकी अपनी सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल उठ सकते हैं। हालांकि आधिकारिक पुष्टि के बिना इन दावों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं मानी जा रही है।

पोलैंड और यूक्रेन के संबंधों में भी हाल के समय में कुछ मुद्दों को लेकर मतभेद सामने आए हैं। इससे पहले पोलैंड स्पष्ट कर चुका है कि वह अपने शेष मिग-29 लड़ाकू विमान यूक्रेन को उपलब्ध नहीं कराएगा। ऐसे में पैट्रियट मिसाइलों को लेकर उठे नए दावे राजनीतिक बहस को और तेज कर रहे हैं।

दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बीच मानवीय मुद्दों ने भी वैश्विक ध्यान आकर्षित किया। अमेरिकी मूल के पहले पोप ने अमेरिका के स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर प्रवासियों और शरणार्थियों के प्रति संवेदनशीलता दिखाने की अपील की।

उन्होंने यह संदेश इटली के लैम्पेडुसा द्वीप से दिया, जिसे अफ्रीका से यूरोप पहुंचने वाले प्रवासियों का प्रमुख प्रवेश द्वार माना जाता है। अपने संबोधन में पोप ने कहा कि जिन लोगों को युद्ध, गरीबी या अन्य संकटों के कारण अपना घर छोड़ना पड़ता है, उनके साथ सम्मान और सहानुभूति का व्यवहार किया जाना चाहिए।

उन्होंने सरकारों और समाज से आग्रह किया कि प्रवासन को केवल राजनीतिक या सुरक्षा चुनौती के रूप में न देखें, बल्कि इसे मानवीय दृष्टिकोण से भी समझें। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की गरिमा सर्वोपरि है और संकट में फंसे लोगों की सहायता करना वैश्विक जिम्मेदारी है।

पोप का यह संदेश ऐसे समय आया है जब अमेरिका और यूरोप में प्रवासियों तथा शरणार्थियों को लेकर नीतियों पर तीखी बहस चल रही है। कई देशों में सीमा सुरक्षा कड़ी करने और अवैध प्रवासन रोकने के लिए नए कदम उठाए जा रहे हैं, जबकि मानवाधिकार संगठन शरण मांगने वालों के प्रति अधिक संवेदनशील रवैया अपनाने की मांग कर रहे हैं।

इस तरह रूस-यूक्रेन युद्ध, यूरोप की सुरक्षा रणनीति, नाटो की बढ़ती गतिविधियां, पोलैंड का रक्षा विवाद और प्रवासियों को लेकर मानवीय अपील—इन सभी घटनाओं ने वैश्विक कूटनीति को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। आने वाले दिनों में नाटो सम्मेलन, अमेरिका और रूस के संभावित आगे के संवाद तथा यूरोपीय देशों के सुरक्षा संबंधी फैसले अंतरराष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।