अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता सैन्य टकराव अब और गंभीर रूप लेता दिखाई दे रहा है। गुरुवार शाम अमेरिका ने ईरान के खिलाफ एक बार फिर हवाई कार्रवाई की। यह तीसरा मौका बताया जा रहा है जब अमेरिकी सेना ने ईरानी ठिकानों को निशाना बनाया है। इस बार हमले का केंद्र ईरान का रणनीतिक रूप से बेहद अहम शहर बंदर अब्बास रहा। फारस की खाड़ी के किनारे स्थित इस पोर्ट सिटी में कई बड़े धमाकों की आवाजें सुनी गईं, जिसके बाद इलाके में अफरा-तफरी का माहौल बन गया।
रिपोर्टों के मुताबिक, अमेरिकी हमलों का मुख्य निशाना ईरानी सेना और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़े सैन्य ठिकाने और बुनियादी ढांचे थे। हमले के बाद बंदर अब्बास के कई हिस्सों में धुएं के गुबार दिखाई दिए। हालांकि, शुरुआती रिपोर्टों में स्थानीय प्रशासन की ओर से नुकसान या हताहतों की पूरी जानकारी सामने नहीं आई थी।
वहीं, अमेरिका की कार्रवाई के बाद ईरान ने भी पलटवार किया। ईरानी सेना ने अमेरिका के सहयोगी देशों और वहां मौजूद अमेरिकी सैन्य सुविधाओं को निशाना बनाते हुए जवाबी हमले किए। जॉर्डन, कुवैत और बहरीन समेत कुछ खाड़ी देशों में धमाकों और मिसाइल गतिविधियों की खबरें सामने आईं। इन घटनाओं के बाद पूरे क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था को और कड़ा कर दिया गया है।
बंदर अब्बास बना अमेरिकी हमले का केंद्र
ईरान का बंदर अब्बास शहर देश के सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाहों में गिना जाता है। यह होर्मुज जलडमरूमध्य के करीब स्थित है, जहां से दुनिया के बड़े हिस्से का तेल व्यापार गुजरता है। यही वजह है कि सैन्य और आर्थिक दृष्टि से यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील माना जाता है।
ईरानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बंदर अब्बास में लगातार कई विस्फोट हुए। ईरानी न्यूज एजेंसी मेहर ने बताया कि शहर में धमाकों की आवाजें सुनी गईं और घटनास्थल के आसपास काले धुएं के बादल उठते दिखाई दिए। हालांकि, रिपोर्ट में तत्काल किसी बड़े नुकसान या मौत की पुष्टि नहीं की गई।
बंदर अब्बास सिर्फ व्यापारिक गतिविधियों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यहां ईरानी नौसेना और सैन्य गतिविधियों से जुड़े कई अहम ठिकाने भी मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका ने इसी रणनीतिक महत्व को देखते हुए इस इलाके को निशाना बनाया।
हमले के बाद ईरान की सुरक्षा एजेंसियां सक्रिय हो गईं और प्रभावित इलाकों में जांच शुरू कर दी गई। स्थानीय लोगों में भी डर का माहौल देखा गया, क्योंकि यह क्षेत्र पहले से ही अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण संवेदनशील बना हुआ है।
अमेरिकी हमले में ईरानी ठिकानों को बनाया गया निशाना
अमेरिका की ओर से की गई कार्रवाई को ईरानी सैन्य क्षमता को कमजोर करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। अमेरिकी हमलों में कथित तौर पर ईरानी सेना और IRGC से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया गया।
IRGC ईरान की सबसे शक्तिशाली सैन्य संस्थाओं में से एक है, जो देश की सुरक्षा और क्षेत्रीय सैन्य अभियानों में बड़ी भूमिका निभाती है। अमेरिका पहले भी IRGC से जुड़े कई ठिकानों और अधिकारियों पर प्रतिबंध और सैन्य कार्रवाई कर चुका है।
रिपोर्टों में दावा किया गया कि अमेरिकी हमलों के दौरान ईरान में कुछ सैन्य सुविधाओं को नुकसान पहुंचा है। कुछ रिपोर्टों में 14 ईरानी नागरिकों की मौत का भी दावा किया गया है, हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
ईरान ने अमेरिकी कार्रवाई को अपनी संप्रभुता पर हमला बताया और चेतावनी दी कि वह इसका जवाब देने से पीछे नहीं हटेगा।
ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी ठिकानों पर किए हमले
अमेरिकी हमले के बाद ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए उन देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया, जो अमेरिका के सहयोगी हैं। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड ने बहरीन, कुवैत और कतर में मौजूद अमेरिकी सैन्य सुविधाओं पर हमले किए।
कुवैत में अमेरिकी सैन्य ठिकाने आरिफजान और अली अल सलेम को निशाना बनाए जाने की खबर सामने आई। वहीं बहरीन में जुफैर और शेख ईसा एयर बेस से जुड़ी सुविधाओं पर हमले की जानकारी दी गई।
कुवैत के रक्षा मंत्रालय ने पुष्टि की कि हमले के दौरान एक व्यक्ति घायल हुआ है। मंत्रालय के मुताबिक, यह चोट किसी विस्फोट के बाद गिरे मलबे से लगी, जिसके बाद घायल व्यक्ति को इलाज के लिए अस्पताल भेजा गया।
इन हमलों के बाद खाड़ी देशों में सुरक्षा अलर्ट बढ़ा दिया गया। कई स्थानों पर हवाई सुरक्षा प्रणालियों को सक्रिय किया गया और नागरिकों को सतर्क रहने की सलाह दी गई।
जॉर्डन ने रोकी ईरानी मिसाइलें
ईरान के हमलों का असर जॉर्डन में भी देखने को मिला। जॉर्डन की सेना ने बताया कि देशभर में सुरक्षा सायरन बजने के बाद उसकी वायु रक्षा प्रणाली सक्रिय हुई। सेना के अनुसार, जॉर्डन के हवाई क्षेत्र में प्रवेश करने वाली ईरान की आठ मिसाइलों को रोक दिया गया।
जॉर्डन अमेरिका का करीबी सहयोगी माना जाता है और वहां अमेरिकी सैन्य मौजूदगी भी है। यही कारण है कि ईरान की ओर से संभावित हमलों को लेकर पहले से ही चिंता बनी हुई थी।
जॉर्डन सरकार ने कहा कि उसकी प्राथमिकता अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। सेना ने किसी बड़े नुकसान की जानकारी नहीं दी, लेकिन पूरे क्षेत्र में तनाव को देखते हुए निगरानी बढ़ा दी गई है।
खाड़ी क्षेत्र में बढ़ा युद्ध का खतरा
अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से तनाव रहा है, लेकिन हालिया घटनाओं ने स्थिति को और खतरनाक बना दिया है। दोनों देशों के बीच सैन्य कार्रवाई और जवाबी हमलों का सिलसिला शुरू होने से पूरे मध्य पूर्व में चिंता बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का कहना है कि फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य की स्थिति बेहद महत्वपूर्ण है। अगर संघर्ष और बढ़ता है तो इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है।
बंदर अब्बास पर हमला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि यह ईरान की समुद्री गतिविधियों और व्यापार का प्रमुख केंद्र है। वहीं, अमेरिकी ठिकानों पर ईरानी हमले यह संकेत देते हैं कि तेहरान सीधे जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता दिखाना चाहता है।
अमेरिका और ईरान के बीच आगे क्या होगा?
फिलहाल दोनों देशों की ओर से सख्त बयान जारी किए जा रहे हैं। अमेरिका अपनी सैन्य कार्रवाई को सुरक्षा कारणों से उचित ठहरा रहा है, जबकि ईरान इसे आक्रामक कार्रवाई बता रहा है।
दुनिया के कई देश इस संघर्ष को रोकने की अपील कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय को डर है कि अगर सैन्य टकराव इसी तरह जारी रहा तो यह केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता बढ़ सकती है।
खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डे और ईरान की रणनीतिक स्थिति इस संघर्ष को और जटिल बना रहे हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश बातचीत का रास्ता अपनाते हैं या सैन्य कार्रवाई का दौर और तेज होता है।