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The Scoopp

 

सिक्किम टनल हादसा: 20 श्रमिकों के शव निकाले गए, जहरीली गैस और मलबे ने रेस्क्यू अभियान को बनाया बेहद कठिन

सिक्किम के नामची जिले में निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजना की सुरंग में हुए भीषण हादसे ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। राहत और बचाव दलों ने कई घंटों की लगातार मेहनत के बाद सुरंग के भीतर फंसे 25 मजदूरों में से 20 के शव बाहर निकाल लिए हैं, जबकि शेष पांच श्रमिकों तक पहुंचने के लिए अभियान लगातार जारी है। बचाव कार्य को सबसे बड़ी चुनौती सुरंग के अंदर फैली मीथेन गैस और लगातार गिर रहा मलबा बना हुआ है, जिसकी वजह से रेस्क्यू टीमों को कई बार अभियान रोकना पड़ा।

जानकारी के अनुसार यह हादसा तीस्ता स्टेज-6 हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना के तहत बनाई जा रही आदित-3 टनल में हुआ। सुरंग का निर्माण कार्य निजी कंपनी पटेल इंजीनियरिंग द्वारा किया जा रहा था। घटना के बाद प्रशासन, आपदा प्रबंधन बल और विशेषज्ञों की कई टीमें मौके पर पहुंचीं और युद्धस्तर पर राहत अभियान शुरू किया गया। हालांकि टनल के अंदर का वातावरण बेहद खतरनाक होने के कारण अभियान अपेक्षा से काफी धीमी गति से आगे बढ़ रहा है।

बचाव अधिकारियों ने बताया कि सुरंग के भीतर अचानक मलबा गिरने के साथ ही बड़ी मात्रा में मीथेन गैस जमा हो गई। यह गैस ऑक्सीजन का स्तर तेजी से कम कर देती है, जिससे सामान्य रूप से सांस लेना लगभग असंभव हो जाता है। कई राहतकर्मियों को भी गैस के प्रभाव के कारण चक्कर आने लगे और कुछ लोग बेहोश हो गए, जिसके बाद उन्हें तत्काल बाहर लाकर चिकित्सकीय सहायता दी गई।

राहत कार्य में शामिल विशेषज्ञों के अनुसार मजदूर सुरंग के प्रवेश द्वार से करीब डेढ़ किलोमीटर अंदर अलग-अलग स्थानों पर फंसे हुए थे। टनल का अधिकांश हिस्सा सुरक्षित है, लेकिन जिस हिस्से में हादसा हुआ, वहीं सबसे अधिक मलबा और जहरीली गैस जमा हो गई है। इसी वजह से राहत दलों को हर कदम बेहद सावधानी के साथ आगे बढ़ाना पड़ रहा है।

रेस्क्यू ऑपरेशन को जारी रखने के लिए टीमों को छोटे-छोटे समूहों में बांटा गया है। आठ-आठ सदस्यों के दल निर्धारित समय के लिए सुरंग के भीतर भेजे जा रहे हैं। प्रत्येक सदस्य को ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध कराया गया है, लेकिन एक सिलेंडर लगभग 40 मिनट तक ही पर्याप्त साबित हो रहा है। जैसे ही ऑक्सीजन कम होने लगती है, पूरी टीम को वापस लौटना पड़ता है। इसके बाद दूसरी टीम अंदर जाकर अभियान को आगे बढ़ाती है। इस प्रक्रिया के कारण बचाव कार्य में काफी समय लग रहा है।

विशेषज्ञों ने सुरंग के भीतर जहरीली गैस के प्रभाव को कम करने के लिए ब्लास्ट-प्रूफ ब्लोअर्स और बड़े वेंटिलेशन पाइप लगाए हैं। इनके जरिए बाहर की ताजा हवा लगातार अंदर भेजी जा रही है ताकि ऑक्सीजन का स्तर बढ़ सके और राहतकर्मियों के लिए काम करना थोड़ा सुरक्षित हो। इसके अलावा गैस की मात्रा और ऑक्सीजन स्तर पर लगातार निगरानी रखी जा रही है।

हादसे के बाद सुरंग की छत और दीवारों की मजबूती भी बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है। जहां-जहां दरारें या ढीले पत्थर दिखाई दे रहे हैं, वहां शॉटक्रीट तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। साथ ही रॉक-बोल्टिंग के जरिए चट्टानों को स्थिर किया जा रहा है ताकि आगे और मलबा न गिरे। इंजीनियरों का मानना है कि यदि बिना सुरक्षा उपायों के अंदर प्रवेश किया जाए तो राहतकर्मियों की जान भी खतरे में पड़ सकती है।

भारी मशीनों के उपयोग की सीमित संभावना को देखते हुए छोटे आकार के लोडर्स और विशेष रोबोटिक उपकरणों की मदद ली जा रही है। इन मशीनों के जरिए धीरे-धीरे मलबा हटाया जा रहा है ताकि सुरंग के भीतर दबे हिस्सों तक सुरक्षित तरीके से पहुंचा जा सके। कई स्थानों पर हाथ से भी मलबा हटाना पड़ रहा है क्योंकि संकरी जगहों पर बड़ी मशीनें नहीं पहुंच पा रही हैं।

राहत अधिकारियों ने बताया कि बचाव अभियान चौबीसों घंटे बिना रुके चल रहा है। दिन और रात की अलग-अलग शिफ्टों में विशेषज्ञ, इंजीनियर, चिकित्सा दल और आपदा प्रबंधन कर्मी लगातार काम कर रहे हैं। मौके पर एंबुलेंस, मेडिकल यूनिट और ऑक्सीजन सपोर्ट सिस्टम भी तैनात किए गए हैं ताकि किसी भी आपात स्थिति से तुरंत निपटा जा सके।

घटना के बाद मृतकों के परिजनों में गहरा शोक है। प्रशासन ने सभी प्रभावित परिवारों से संपर्क बनाए रखा है और उन्हें अभियान की हर प्रगति की जानकारी दी जा रही है। स्थानीय प्रशासन ने कहा है कि शेष पांच मजदूरों तक पहुंचने की पूरी कोशिश की जा रही है और किसी भी स्तर पर लापरवाही नहीं बरती जाएगी।

विशेषज्ञों का कहना है कि जलविद्युत परियोजनाओं की लंबी सुरंगों में मीथेन जैसी गैसों का जमा होना एक गंभीर जोखिम होता है। ऐसे निर्माण स्थलों पर नियमित गैस मॉनिटरिंग, पर्याप्त वेंटिलेशन और आपातकालीन सुरक्षा व्यवस्था बेहद जरूरी मानी जाती है। किसी भी प्रकार की गैस रिसाव या ऑक्सीजन की कमी की स्थिति में तत्काल अलर्ट सिस्टम सक्रिय होना चाहिए ताकि मजदूरों को समय रहते सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जा सके।

इंजीनियरों का यह भी मानना है कि सुरंग निर्माण के दौरान लगातार भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण और चट्टानों की स्थिरता का परीक्षण आवश्यक होता है। पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम, भूगर्भीय गतिविधियों और जल प्रवाह में अचानक बदलाव के कारण इस तरह की घटनाओं का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए निर्माण प्रक्रिया के दौरान सुरक्षा मानकों का सख्ती से पालन करना बेहद महत्वपूर्ण है।

फिलहाल प्रशासन की प्राथमिकता शेष पांच मजदूरों तक जल्द से जल्द पहुंचना है। इसके लिए राहत दल हर संभावित तकनीकी उपाय का इस्तेमाल कर रहे हैं। गैस का प्रभाव कम होने और मलबा हटने के बाद अभियान में तेजी आने की उम्मीद जताई जा रही है। हालांकि अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि जल्दबाजी में कोई ऐसा कदम नहीं उठाया जाएगा जिससे बचाव दल के सदस्यों की सुरक्षा खतरे में पड़े।

घटनास्थल पर विशेषज्ञ लगातार सुरंग की संरचना का निरीक्षण कर रहे हैं। यदि किसी हिस्से में दोबारा मलबा गिरने की आशंका बनती है तो पहले उसे सुरक्षित किया जाता है, उसके बाद ही टीमों को आगे बढ़ने की अनुमति दी जाती है। यही वजह है कि अभियान धीरे-धीरे लेकिन पूरी सावधानी के साथ आगे बढ़ रहा है।

सिक्किम की इस दुखद घटना ने एक बार फिर बड़े निर्माण कार्यों में सुरक्षा व्यवस्थाओं को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक तकनीक, बेहतर निगरानी प्रणाली और नियमित सुरक्षा ऑडिट के जरिए भविष्य में ऐसे हादसों की संभावना को काफी हद तक कम किया जा सकता है। फिलहाल पूरे देश की नजरें राहत अभियान पर टिकी हैं और सभी को उम्मीद है कि शेष फंसे मजदूरों तक जल्द पहुंचकर अभियान को सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकेगा।