अयोध्या स्थित श्रीराम जन्मभूमि मंदिर की धार्मिक व्यवस्थाओं को और अधिक व्यवस्थित, पारदर्शी और परंपराओं के अनुरूप बनाए रखने के उद्देश्य से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने एक नई व्यवस्था लागू की है। इस नई व्यवस्था के तहत मंदिर से जुड़े धार्मिक मामलों की देखरेख के लिए नौ सदस्यीय संत समिति का गठन किया गया है। यह समिति अब मंदिर में होने वाली पूजा-पद्धति, वैदिक अनुष्ठानों, धार्मिक आयोजनों और परंपराओं से जुड़े सभी महत्वपूर्ण विषयों पर मार्गदर्शन देने के साथ-साथ अंतिम निर्णय लेने की भूमिका निभाएगी।
इस कदम को राम मंदिर की धार्मिक मर्यादा और सनातन परंपराओं को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। ट्रस्ट का मानना है कि मंदिर में होने वाले सभी धार्मिक कार्य शास्त्रों और रामानंदी परंपरा के अनुरूप ही संपन्न हों, इसके लिए अनुभवी संतों की भागीदारी आवश्यक है। इसी सोच के साथ इस समिति का गठन किया गया है।
नई व्यवस्था के अनुसार मंदिर में प्रतिदिन होने वाली पूजा-अर्चना, विशेष अनुष्ठान, वैदिक कर्मकांड और धार्मिक कार्यक्रमों की नियमित समीक्षा अब यही समिति करेगी। समिति यह सुनिश्चित करेगी कि सभी अनुष्ठान निर्धारित धार्मिक विधि-विधान और परंपराओं के अनुसार संपन्न हो रहे हैं या नहीं। यदि किसी व्यवस्था में बदलाव या सुधार की आवश्यकता होगी तो उसके लिए भी समिति ही आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करेगी।
समिति के अध्यक्ष के रूप में श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष स्वामी गोविंद देव गिरि को जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनके नेतृत्व में यह समिति मंदिर की धार्मिक व्यवस्थाओं का संचालन और मार्गदर्शन करेगी। समिति में अयोध्या के कई प्रतिष्ठित संतों और धार्मिक विद्वानों को शामिल किया गया है, जिससे स्थानीय परंपराओं और आध्यात्मिक विरासत को प्राथमिकता मिल सके।
समिति में महंत दिनेंद्र दास, महंत कमलनयन दास, महंत डॉ. रामानंद दास, अधिकारी राजकुमार दास और महंत मिथिलेशनंदिनी शरण जैसे अयोध्या के प्रमुख संत शामिल किए गए हैं। इसके अतिरिक्त जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती तथा जगद्गुरु स्वामी विश्वप्रसन्नतीर्थ को भी समिति में स्थान दिया गया है। इन सभी संतों के अनुभव और धार्मिक ज्ञान का लाभ मंदिर की व्यवस्थाओं को और अधिक सुदृढ़ बनाने में मिलेगा।
समिति की एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मंदिर में मनाए जाने वाले प्रमुख धार्मिक पर्वों और उत्सवों की तिथियों का निर्धारण भी होगी। रामनवमी, सीता नवमी, विवाह पंचमी समेत अन्य प्रमुख धार्मिक अवसरों के आयोजन से जुड़े निर्णय अब संत समिति की सहमति से लिए जाएंगे। इससे यह सुनिश्चित होगा कि सभी पर्व-उत्सव पूरी तरह धार्मिक परंपराओं और शास्त्रीय मान्यताओं के अनुरूप आयोजित किए जाएं।
इसके अलावा वेद पारायण, रामार्चा, यज्ञ, हवन और अन्य विशेष वैदिक अनुष्ठानों की योजना बनाने और उनके संचालन की जिम्मेदारी भी समिति के पास रहेगी। कौन-सा अनुष्ठान किस प्रकार आयोजित होगा, उसमें कौन-सी धार्मिक प्रक्रिया अपनाई जाएगी और किन संतों या विद्वानों की भागीदारी होगी, जैसे विषयों पर भी समिति मार्गदर्शन प्रदान करेगी।
राम मंदिर में सेवा देने वाले पुजारियों की व्यवस्था को भी नई प्रणाली के तहत और अधिक व्यवस्थित बनाया जाएगा। समिति अर्चकों के चयन, प्रशिक्षण और नियुक्ति की प्रक्रिया पर नजर रखेगी। साथ ही यह भी सुनिश्चित करेगी कि मंदिर में सेवा करने वाले सभी पुजारी निर्धारित धार्मिक अनुशासन, आचार संहिता और परंपराओं का पालन करें।
नई व्यवस्था में पुजारियों के लिए ड्रेस कोड और आचरण संबंधी नियमों की निगरानी भी संत समिति करेगी। यदि किसी पुजारी के प्रशिक्षण, व्यवहार या पूजा-पद्धति में किसी प्रकार की कमी पाई जाती है तो समिति आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने की सिफारिश कर सकेगी। उद्देश्य यह है कि मंदिर में सेवा देने वाले सभी अर्चक समान धार्मिक मानकों और अनुशासन का पालन करें।
भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए प्रशिक्षित पुजारियों की स्थायी उपलब्धता सुनिश्चित करने की दिशा में भी योजना बनाई गई है। इसके तहत एक स्थायी अर्चक प्रशिक्षण संस्थान स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है। इस संस्थान में वैदिक शिक्षा, पूजा-विधि, संस्कृत, रामानंदी परंपरा और मंदिर सेवा से जुड़े विषयों का व्यवस्थित प्रशिक्षण दिया जाएगा, ताकि आने वाले वर्षों में योग्य और प्रशिक्षित अर्चकों की कोई कमी न रहे।
समिति केवल मंदिर परिसर तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि अयोध्या के विभिन्न मठों, मंदिरों, गुरुकुलों और संत समाज के साथ नियमित संवाद भी स्थापित करेगी। इससे धार्मिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय विकसित होगा और विभिन्न धार्मिक विषयों पर सामूहिक विचार-विमर्श के आधार पर निर्णय लिए जा सकेंगे। ट्रस्ट का मानना है कि इस प्रकार की सहभागिता से धार्मिक परंपराओं को और अधिक मजबूती मिलेगी।
धार्मिक मामलों में स्थानीय संतों की भूमिका बढ़ाने के उद्देश्य से समिति में अयोध्या के संतों को बहुमत दिया गया है। इससे स्थानीय धार्मिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और वर्षों से चली आ रही मान्यताओं को प्राथमिकता मिलने की संभावना है। यह व्यवस्था मंदिर की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान को संरक्षित रखने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
यदि पहले की व्यवस्था और वर्तमान प्रणाली की तुलना की जाए तो पहले मंदिर की पूजा-पद्धति, धार्मिक कार्यक्रमों और प्रमुख आयोजनों की निगरानी मुख्य रूप से श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट और प्रशासनिक स्तर पर होती थी। पर्वों की तिथियों, धार्मिक आयोजनों और कई अन्य महत्वपूर्ण विषयों पर भी ट्रस्ट ही अंतिम निर्णय लेता था। हालांकि धार्मिक विशेषज्ञों से समय-समय पर सलाह ली जाती थी, लेकिन निर्णय प्रक्रिया का केंद्र ट्रस्ट ही था।
अब नई व्यवस्था लागू होने के बाद धार्मिक विषयों से जुड़े अधिकांश निर्णय संत समिति के माध्यम से लिए जाएंगे। इससे धार्मिक मामलों में संत समाज की भागीदारी पहले की तुलना में अधिक प्रभावी हो जाएगी। ट्रस्ट प्रशासनिक और प्रबंधन संबंधी जिम्मेदारियों का निर्वहन करता रहेगा, जबकि पूजा-पद्धति, धार्मिक अनुष्ठानों और परंपराओं से जुड़े विषयों में संत समिति सर्वोच्च मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगी।
धार्मिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यवस्था से मंदिर में होने वाले सभी अनुष्ठानों में एकरूपता बनी रहेगी और आने वाले समय में किसी प्रकार के धार्मिक मतभेद या भ्रम की स्थिति की संभावना भी कम होगी। साथ ही यह व्यवस्था मंदिर की वैदिक परंपरा और रामानंदी संप्रदाय की मान्यताओं को व्यवस्थित रूप से आगे बढ़ाने में सहायक साबित हो सकती है।
श्रीराम जन्मभूमि मंदिर देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। ऐसे में मंदिर की धार्मिक व्यवस्था को सुव्यवस्थित और शास्त्रसम्मत बनाए रखने के लिए संतों की प्रत्यक्ष भागीदारी को एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। ट्रस्ट को उम्मीद है कि नई समिति के गठन से पूजा-पद्धति, धार्मिक आयोजनों और पुजारियों की व्यवस्था अधिक संगठित होगी तथा मंदिर की परंपराएं आने वाली पीढ़ियों तक उसी स्वरूप में सुरक्षित रह सकेंगी, जिस स्वरूप में सनातन धर्म और रामानंदी परंपरा उन्हें संरक्षित रखने की अपेक्षा करती है।