Skip to main content

The Scoopp

 

E20 पेट्रोल पर फिर तेज हुई बहस: ईंधन नीति को लेकर बढ़ा असंतोष, पुराने वाहनों के लिए विकल्प की मांग ने पकड़ी रफ्तार

देश में ईंधन नीति को लेकर एक बार फिर बहस तेज होती दिखाई दे रही है। हाल के दिनों में अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर लोगों की सक्रियता बढ़ने के बाद अब पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण से जुड़ा विषय भी चर्चा के केंद्र में आ गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से लेकर परिवहन क्षेत्र से जुड़े संगठनों तक, कई जगह E20 पेट्रोल को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। खासतौर पर पुराने वाहनों के मालिक और टैक्सी-ऑटो संचालक यह मांग कर रहे हैं कि उन्हें ऐसे ईंधन का विकल्प भी उपलब्ध कराया जाए, जो उनके वाहनों के लिए अधिक उपयुक्त हो।

बताया जा रहा है कि कुछ परिवहन संगठनों ने ईंधन नीति और ट्रांसपोर्ट से जुड़े अन्य नियमों के विरोध में 4 अगस्त 2026 को संसद तक शांतिपूर्ण मार्च निकालने की घोषणा की है। हालांकि इस प्रदर्शन का मुख्य उद्देश्य केवल E20 पेट्रोल नहीं बल्कि परिवहन क्षेत्र से जुड़ी कई अन्य मांगें भी बताई जा रही हैं। इसके बावजूद E20 पेट्रोल का मुद्दा इस पूरे आंदोलन का प्रमुख विषय बनता नजर आ रहा है।

दरअसल, इस बहस की पृष्ठभूमि कुछ महीनों पहले शुरू हुए वैश्विक ऊर्जा संकट से जुड़ी हुई है। वर्ष 2026 की शुरुआत में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव और ईरान, इजरायल तथा अमेरिका के बीच संघर्ष ने अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार को प्रभावित किया। हालात उस समय और गंभीर हो गए जब रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में तेल आपूर्ति प्रभावित होने लगी। इसका असर दुनिया के कई देशों की तरह भारत पर भी पड़ा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली।

ऊर्जा संकट के बीच भारत सरकार ने ईंधन की खपत कम करने और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देने पर जोर दिया। इसी रणनीति के तहत इथेनॉल मिश्रित पेट्रोल को लेकर भी चर्चाएं तेज हुईं। पहले से लागू E20 पेट्रोल के बाद भविष्य में अधिक प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण वाले ईंधन की संभावनाओं पर भी विचार किए जाने की बातें सामने आईं। यहीं से आम लोगों के बीच नई बहस शुरू हो गई।

कई वाहन मालिकों का कहना है कि उनके पास मौजूद पुराने मॉडल की कारें और दोपहिया वाहन E20 ईंधन के लिए पूरी तरह उपयुक्त नहीं हैं। उनका दावा है कि ऐसे वाहनों में माइलेज कम होने, इंजन की कार्यक्षमता प्रभावित होने और रखरखाव का खर्च बढ़ने जैसी समस्याएं सामने आ रही हैं। खासकर वर्ष 2023 से पहले खरीदे गए वाहनों के मालिकों ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है। उनका कहना है कि जब वाहन E20 मानकों के अनुसार डिजाइन ही नहीं किए गए थे तो उनके लिए अलग ईंधन उपलब्ध होना चाहिए।

हालांकि सरकार लगातार यह कहती रही है कि E20 पेट्रोल को लेकर फैलाई जा रही कई बातें तथ्यात्मक रूप से सही नहीं हैं। सरकार का दावा है कि निर्धारित मानकों के अनुसार तैयार किए गए इथेनॉल मिश्रित ईंधन से आम वाहनों को कोई बड़ा नुकसान नहीं होता और इससे देश को आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी। इसके अलावा सरकार का यह भी तर्क है कि इथेनॉल मिश्रण बढ़ने से पर्यावरण संरक्षण, किसानों की आय और ऊर्जा सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

सरकारी दावों के बावजूद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में ऐसे लोग अपनी व्यक्तिगत शिकायतें साझा कर रहे हैं, जिनका कहना है कि E20 पेट्रोल इस्तेमाल करने के बाद उन्हें वाहन से जुड़ी विभिन्न परेशानियों का सामना करना पड़ा। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि अलग-अलग मामलों में नहीं हुई है, लेकिन इससे यह स्पष्ट है कि आम लोगों के बीच इस विषय को लेकर भ्रम और असंतोष दोनों मौजूद हैं।

बीते कुछ समय में देशभर में छात्र आंदोलनों और अन्य सामाजिक मुद्दों ने सुर्खियां बटोरी थीं, जिसके कारण E20 पेट्रोल का विषय कुछ समय के लिए चर्चा से बाहर हो गया था। लेकिन अब परिवहन संगठनों और वाहन मालिकों द्वारा इसे दोबारा उठाए जाने के बाद यह मुद्दा फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा बनने लगा है। विपक्षी दल भी समय-समय पर सरकार की ईंधन नीति पर सवाल उठा रहे हैं, जबकि सरकार अपनी नीति को देशहित में जरूरी बता रही है।

ईंधन क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि भारत जैसे बड़े आयातक देश के लिए इथेनॉल मिश्रण बढ़ाना ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होने के साथ-साथ घरेलू स्तर पर गन्ना और अन्य फसलों से बनने वाले इथेनॉल की मांग भी बढ़ती है। वहीं दूसरी ओर विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि किसी नई ईंधन नीति को व्यापक स्तर पर लागू किया जाता है तो उपभोक्ताओं की व्यावहारिक समस्याओं और पुराने वाहनों की तकनीकी सीमाओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।

फिलहाल E20 पेट्रोल को लेकर लोगों की ओर से तीन प्रमुख मांगें सामने आ रही हैं। पहली मांग यह है कि पेट्रोल पंपों पर E10 पेट्रोल का विकल्प भी उपलब्ध कराया जाए ताकि पुराने वाहनों के मालिक अपनी आवश्यकता के अनुसार ईंधन चुन सकें। दूसरी मांग E20 पेट्रोल की कीमतों में कमी को लेकर है। कई लोगों का कहना है कि यदि सरकार वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देना चाहती है तो उसकी कीमतें भी उपभोक्ताओं के लिए अधिक आकर्षक होनी चाहिए। तीसरी मांग शून्य प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण वाले पेट्रोल की उपलब्धता और उसकी कीमतों को लेकर है। कुछ वाहन मालिक चाहते हैं कि उन्हें पारंपरिक पेट्रोल भी उचित दाम पर उपलब्ध कराया जाए।

टैक्सी और व्यावसायिक वाहन संचालकों का कहना है कि उनके लिए ईंधन की लागत सीधे आय से जुड़ी होती है। यदि माइलेज या रखरखाव पर अतिरिक्त खर्च आता है तो उसका असर उनकी रोजमर्रा की कमाई पर पड़ता है। इसलिए वे चाहते हैं कि सरकार इस विषय पर विस्तृत तकनीकी अध्ययन सार्वजनिक करे और सभी प्रकार के वाहनों के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे।

आने वाले दिनों में यदि प्रस्तावित शांतिपूर्ण मार्च आयोजित होता है तो यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस विषय पर क्या रुख अपनाती है। फिलहाल सरकार की ओर से E20 नीति को वापस लेने जैसा कोई संकेत नहीं मिला है, लेकिन लगातार उठ रही मांगों के बीच यह संभावना जरूर जताई जा रही है कि पुराने वाहनों के लिए कुछ अतिरिक्त विकल्पों या सुविधाओं पर विचार किया जा सकता है।

कुल मिलाकर, E20 पेट्रोल को लेकर बहस केवल ईंधन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह उपभोक्ताओं की सुविधा, ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और परिवहन क्षेत्र की आर्थिक चुनौतियों से भी जुड़ चुकी है। एक ओर सरकार इथेनॉल मिश्रण को भविष्य की ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बता रही है, वहीं दूसरी ओर कई वाहन मालिक अपनी तकनीकी और आर्थिक चिंताओं को सामने रख रहे हैं। ऐसे में आने वाले समय में सरकार और संबंधित पक्षों के बीच होने वाली चर्चा इस पूरे विवाद की दिशा तय कर सकती है।