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पंजाब में हवारा पैरोल पर सियासत तेज, 2027 से पहले AAP का पंथक दांव अकाली दल के लिए बनी चुनौती

पंजाब की सियासत में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले एक बार फिर पंथक मुद्दों की वापसी होती दिखाई दे रही है। पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे जगतार सिंह हवारा को पैरोल दिए जाने की सिफारिश कर मुख्यमंत्री भगवंत मान ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा को जन्म दे दिया है। मान ने हवारा की बीमार मां से मुलाकात के लिए 10 दिन की पैरोल की मांग की है। इस संबंध में उन्होंने पंजाब के राज्यपाल गुलाब चंद कटारिया को पत्र लिखकर मानवीय आधार पर मामले पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने का आग्रह किया है।

मुख्यमंत्री की इस पहल को केवल प्रशासनिक या मानवीय कदम के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। पंजाब की राजनीति में बंदी सिंहों, सिख कैदियों और पंथक भावनाओं से जुड़े मुद्दे लंबे समय से चुनावी राजनीति को प्रभावित करते रहे हैं। ऐसे में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले हवारा के पैरोल का मुद्दा राजनीतिक रूप से काफी संवेदनशील माना जा रहा है।

बीमार मां से मुलाकात बना पैरोल का आधार

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अपने पत्र में हवारा की मां की खराब होती सेहत का उल्लेख किया है। सरकार की ओर से पैरोल की सिफारिश का प्रमुख आधार मां की बीमारी और बेटे से मुलाकात की उनकी इच्छा को बताया गया है।

हवारा फिलहाल मंडोली जेल में सजा काट रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में दोषी ठहराए जाने के बाद वह लंबे समय से जेल में बंद है। ऐसे में उसकी मां की बीमारी का मामला सामने आने के बाद एक बार फिर पैरोल की मांग ने जोर पकड़ा है।

इस मामले की खास बात यह है कि सरकार ने सीधे पैरोल देने के बजाय संबंधित संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत राज्यपाल के सामने मामला रखा है। इससे यह भी संकेत मिलता है कि सरकार कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए इस संवेदनशील मुद्दे को आगे बढ़ाना चाहती है।

पहले भी उठ चुकी है पैरोल की मांग

हवारा की पैरोल का मुद्दा पंजाब में अचानक सामने नहीं आया है। इससे पहले भी पंथक संगठनों और समर्थकों की ओर से उसकी मां से मुलाकात के लिए पैरोल देने की मांग की जाती रही है।

फरवरी में हवारा कलां में हुई पंथक सभा के दौरान भी यह विषय प्रमुखता से उठा था। सभा में हवारा की बीमार मां का हवाला देते हुए सरकार से पैरोल मामले में जल्द फैसला लेने की मांग की गई थी। उस समय भी यह सवाल उठाया गया था कि यदि किसी कैदी की मां गंभीर रूप से बीमार है तो मानवीय आधार पर उसे परिवार से मिलने का अवसर दिया जाना चाहिए।

इसके बाद मामला न्यायिक प्रक्रिया तक पहुंचा। जुलाई में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हवारा की पैरोल याचिका को लेकर संबंधित प्रशासन को समयबद्ध तरीके से कार्रवाई करने के निर्देश दिए। अदालत ने जेल अधीक्षक और अन्य संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट लेने तथा नियमों के अनुसार आगे की प्रक्रिया पूरी करने को कहा।

यानी मुख्यमंत्री की वर्तमान सिफारिश उस पूरी प्रक्रिया की अगली कड़ी के रूप में भी देखी जा रही है।

AAP के लिए क्यों अहम है यह कदम?

पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए हवारा का मुद्दा कई स्तरों पर महत्वपूर्ण हो सकता है। पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल कर सत्ता पर कब्जा किया था। लेकिन अब 2027 की तैयारी के साथ राजनीतिक दल उन मुद्दों पर भी ध्यान दे रहे हैं जिनका राज्य के अलग-अलग सामाजिक और धार्मिक समूहों पर प्रभाव पड़ सकता है।

पंथक राजनीति पंजाब के चुनावी समीकरण का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है। सिख कैदियों की रिहाई, धार्मिक संस्थाओं से जुड़े विवाद और सिख समुदाय से संबंधित भावनात्मक मुद्दे चुनावी बहस को प्रभावित करते रहे हैं।

ऐसे में हवारा की पैरोल की सिफारिश AAP को यह संदेश देने का अवसर दे सकती है कि सरकार संवेदनशील मानवीय मामलों पर पहल करने के लिए तैयार है। यदि पैरोल मंजूर होती है तो आम आदमी पार्टी इसे राजनीतिक सौदेबाजी के बजाय मानवीय दृष्टिकोण से लिया गया फैसला बताने की कोशिश कर सकती है।

हालांकि विरोधी दल इस कदम को अलग नजरिए से देख सकते हैं। चुनाव नजदीक होने के कारण यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकार की इस पहल में राजनीतिक रणनीति भी शामिल है।

अकाली दल के सामने सबसे बड़ी चुनौती

हवारा पैरोल प्रकरण का सबसे दिलचस्प राजनीतिक असर शिरोमणि अकाली दल पर पड़ सकता है। अकाली दल लंबे समय से खुद को पंजाब की पंथक राजनीति के प्रमुख राजनीतिक प्रतिनिधि के तौर पर स्थापित करता आया है।

बंदी सिंहों और जेलों में बंद सिख कैदियों की रिहाई जैसे मुद्दे अकाली दल की राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। ऐसे में यदि AAP सरकार हवारा की पैरोल के मामले में सकारात्मक भूमिका निभाती है तो वह पंथक मुद्दे पर अकाली दल के पारंपरिक राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयास करती हुई दिखाई दे सकती है।

अकाली दल के लिए समस्या यह है कि इस मुद्दे का खुलकर विरोध करना आसान नहीं होगा। यदि पार्टी पैरोल की मांग का समर्थन करती है तो इसका राजनीतिक लाभ AAP को मिलने की संभावना बन सकती है। दूसरी ओर, यदि अकाली दल सरकार की पहल पर सवाल उठाता है या विरोध करता है तो उसके सामने यह चुनौती होगी कि पंथक मतदाताओं के बीच उसका रुख किस तरह देखा जाएगा।

यही वजह है कि हवारा की पैरोल अब सिर्फ एक कैदी की रिहाई या अस्थायी राहत का मामला नहीं रह गया है। यह पंजाब की पंथक राजनीति में राजनीतिक प्रभाव और नैरेटिव की लड़ाई का हिस्सा बनता दिखाई दे रहा है।

BJP के लिए भी आसान नहीं होगा फैसला

इस घटनाक्रम में भारतीय जनता पार्टी की भूमिका भी अहम मानी जा रही है। पंजाब की राजनीति में भाजपा का आधार अकाली दल से अलग होने के बाद नए समीकरणों के साथ विकसित हुआ है। पार्टी के सामने पंथक भावनाओं और बेअंत सिंह हत्याकांड से जुड़े पुराने राजनीतिक संदर्भ के बीच संतुलन बनाने की चुनौती हो सकती है।

हवारा का नाम बेअंत सिंह हत्याकांड से जुड़ा है। बेअंत सिंह पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री थे और उनकी हत्या राज्य के राजनीतिक इतिहास की बेहद संवेदनशील घटनाओं में गिनी जाती है। इसलिए पैरोल का मुद्दा केवल धार्मिक या मानवीय नजरिए से नहीं देखा जाएगा। इसके साथ कानून, सुरक्षा और पीड़ित परिवार की भावनाओं जैसे सवाल भी जुड़े हैं।

यदि प्रशासनिक और कानूनी प्रक्रिया के बाद पैरोल मंजूर होती है तो भाजपा समेत दूसरे दलों को भी अपना रुख स्पष्ट करना पड़ सकता है। वहीं अगर पैरोल पर रोक लगती है तो पंथक संगठनों की ओर से सवाल उठ सकते हैं कि मानवीय आधार पर की गई मांग को क्यों स्वीकार नहीं किया गया।

हाईकोर्ट के निर्देशों के बाद बढ़ी निगरानी

हवारा के पैरोल मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जुलाई में अदालत ने अधिकारियों को मामले पर समयबद्ध तरीके से कार्रवाई करने को कहा था। इसके बाद जेल प्रशासन और संबंधित अधिकारियों से रिपोर्ट लेने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

ऐसे मामलों में पैरोल का फैसला केवल राजनीतिक इच्छा से नहीं होता। संबंधित नियमों, प्रशासनिक रिपोर्ट, जेल रिकॉर्ड, सुरक्षा पहलुओं और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं को भी ध्यान में रखा जाता है। इसलिए मुख्यमंत्री की सिफारिश के बावजूद अंतिम निर्णय पूरी प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगा।

यही वजह है कि फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगी कि हवारा को पैरोल निश्चित रूप से मिल जाएगी। लेकिन मुख्यमंत्री की सिफारिश ने इस मामले को पंजाब की राजनीतिक बहस के केंद्र में जरूर ला दिया है।

2027 की राजनीति में बनेगा बड़ा मुद्दा?

पंजाब विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक दलों ने तैयारियां शुरू कर दी हैं। राज्य में सत्ता की वापसी के लिए AAP जहां अपने काम और शासन के मुद्दों को आगे रखेगी, वहीं विपक्ष सरकार को अलग-अलग मोर्चों पर घेरने की कोशिश करेगा।

पंथक मुद्दों की संवेदनशीलता को देखते हुए हवारा पैरोल प्रकरण आने वाले महीनों में भी चर्चा में रह सकता है। अगर पैरोल मिलती है तो AAP के पास इसे मानवीय पहल के रूप में प्रस्तुत करने का मौका होगा। इसके उलट, अगर अनुमति नहीं मिलती तो सरकार को यह स्पष्ट करना पड़ सकता है कि प्रक्रिया में अड़चन कहां आई।

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक असर अकाली दल पर पड़ सकता है, क्योंकि पंथक मुद्दों पर उसकी पारंपरिक पकड़ को AAP चुनौती देती दिखाई दे रही है। भाजपा भी इस संवेदनशील विषय पर अपने राजनीतिक और कानूनी रुख के बीच संतुलन साधने की कोशिश करेगी।

फिलहाल मुख्यमंत्री भगवंत मान की सिफारिश ने हवारा की पैरोल के पुराने मामले को फिर से सुर्खियों में ला दिया है। एक ओर बीमार मां से बेटे की मुलाकात का मानवीय पहलू है, तो दूसरी ओर इससे जुड़ा पंजाब का संवेदनशील राजनीतिक और पंथक इतिहास। आने वाले दिनों में प्रशासनिक प्रक्रिया किस दिशा में जाती है, यही तय करेगा कि यह मामला केवल पैरोल तक सीमित रहता है या 2027 के विधानसभा चुनाव की बड़ी राजनीतिक बहसों में शामिल हो जाता है।