देश में बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं का स्वरूप पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बदला है। बैंकिंग लेनदेन अब केवल कागजों और शाखाओं तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि मोबाइल ऐप, इंटरनेट बैंकिंग, डिजिटल पेमेंट, फिनटेक प्लेटफॉर्म और इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड इसका अहम हिस्सा बन चुके हैं। इसी बदलती व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने बैंकिंग रिकॉर्ड को कानूनी सुबूत के तौर पर इस्तेमाल करने से जुड़े पुराने कानून को बदलने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
‘बैंकर्स बुक्स एविडेंस बिल-2026’ को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी मिल गई है। राज्यसभा ने सोमवार को इस विधेयक को ध्वनिमत से पारित कर दिया। इससे पहले लोकसभा में इसे 5 अगस्त को मंजूरी दी जा चुकी थी। संसद की मंजूरी मिलने के बाद अब यह विधेयक 1891 में बने ब्रिटिश कालीन ‘बैंकर्स बुक्स एविडेंस एक्ट’ की जगह लेगा।
लगभग 135 साल पुराने कानून को हटाकर नया कानूनी ढांचा तैयार करने के पीछे सबसे बड़ी वजह वित्तीय क्षेत्र में आया व्यापक बदलाव है। सरकार का कहना है कि जिस दौर में पुराना कानून बनाया गया था, उस समय बैंकिंग व्यवस्था आज की तरह डिजिटल और बहुआयामी नहीं थी। अब बैंकिंग रिकॉर्ड कई अलग-अलग इलेक्ट्रॉनिक प्रणालियों में तैयार और सुरक्षित किए जाते हैं। ऐसे में कानूनी कार्यवाही में इन रिकॉर्ड को प्रमाण के रूप में स्वीकार करने के लिए मौजूदा जरूरतों के अनुरूप व्यवस्था जरूरी हो गई थी।
बदल चुका है बैंकिंग और वित्तीय सेवाओं का स्वरूप
राज्यसभा में विधेयक पर चर्चा के दौरान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्तीय क्षेत्र में हुए बदलावों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पिछले कई दशकों में देश की वित्तीय व्यवस्था का दायरा काफी बढ़ा है। बैंकिंग संस्थाओं के साथ-साथ गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां यानी NBFC, पेमेंट एग्रीगेटर, फिनटेक कंपनियां और कई अन्य वित्तीय सेवा प्रदाता भी लोगों की जरूरतों को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
आज ग्राहक के लिए बैंकिंग का मतलब केवल बैंक की शाखा में जाकर खाता संचालित करना नहीं है। मोबाइल फोन से भुगतान करना, ऑनलाइन पैसे ट्रांसफर करना, डिजिटल स्टेटमेंट प्राप्त करना, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से लोन लेना और अलग-अलग वित्तीय प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करना आम हो चुका है।
इस बदलाव के कारण वित्तीय लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड का स्वरूप भी बदल गया है। पहले बैंकिंग रिकॉर्ड का मतलब मुख्य रूप से कागजों पर दर्ज खाते और दस्तावेज होते थे। अब बड़ी मात्रा में डेटा इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से तैयार होता है। ऐसे में कानूनी प्रक्रिया में डिजिटल रिकॉर्ड की भूमिका लगातार बढ़ रही है।
सरकार का तर्क है कि वित्तीय क्षेत्र में शामिल अलग-अलग संस्थाओं के लिए सुबूतों से जुड़ा स्पष्ट और समान कानूनी ढांचा होना जरूरी है। इसी उद्देश्य से नए विधेयक में पुराने कानून की सीमाओं को आधुनिक वित्तीय व्यवस्था के अनुरूप बदलने का प्रयास किया गया है।
पुराने कानून की जगह क्यों जरूरी हुआ नया कानून?
1891 में लागू किया गया बैंकर्स बुक्स एविडेंस एक्ट उस समय की बैंकिंग व्यवस्था को ध्यान में रखकर बनाया गया था। उस दौर में बैंकिंग रिकॉर्ड मुख्य रूप से भौतिक दस्तावेजों और रजिस्टरों में दर्ज किए जाते थे। लेकिन आज बैंकिंग सिस्टम पूरी तरह से तकनीक आधारित हो चुका है।
बैंकिंग लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड अब सर्वर, कंप्यूटर सिस्टम, इलेक्ट्रॉनिक डेटाबेस और अन्य डिजिटल माध्यमों में उपलब्ध होते हैं। कई मामलों में एक ही वित्तीय लेनदेन से जुड़ी जानकारी अलग-अलग डिजिटल प्रणालियों में दर्ज हो सकती है। ऐसे में पुराने कानूनी प्रावधानों को उसी रूप में लागू करना व्यावहारिक नहीं माना जा रहा था।
नया विधेयक इसी अंतर को दूर करने की कोशिश करता है। इसका उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि बैंकिंग रिकॉर्ड को कानूनी कार्यवाही में किस तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है और किस तरह के रिकॉर्ड को सुबूत के रूप में स्वीकार किया जाएगा।
फिजिकल और इलेक्ट्रॉनिक दोनों रिकॉर्ड की व्यवस्था
नए विधेयक की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसमें बैंकिंग रिकॉर्ड को केवल पारंपरिक कागजी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रखा गया है। जरूरत के अनुसार रिकॉर्ड को फिजिकल या इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई है।
इसका सीधा असर उन कानूनी मामलों पर पड़ सकता है, जिनमें बैंकिंग लेनदेन या वित्तीय रिकॉर्ड महत्वपूर्ण सुबूत की भूमिका निभाते हैं। डिजिटल बैंकिंग के बढ़ते इस्तेमाल के कारण ऐसे मामलों में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड की अहमियत पहले की तुलना में काफी अधिक हो गई है।
उदाहरण के तौर पर किसी वित्तीय विवाद, बैंकिंग लेनदेन या अन्य कानूनी मामले में यदि संबंधित जानकारी इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में दर्ज है, तो उसे कानूनी प्रक्रिया में प्रस्तुत करने के लिए आधुनिक व्यवस्था उपलब्ध होगी। इससे रिकॉर्ड पेश करने की प्रक्रिया को मौजूदा तकनीकी व्यवस्था के साथ जोड़ने में मदद मिलने की उम्मीद है।
दूसरे वित्तीय संस्थानों तक भी बढ़ सकता है दायरा
विधेयक में केवल बैंकों को ध्यान में रखकर प्रावधान नहीं किए गए हैं। वित्त मंत्री ने चर्चा के दौरान इसकी धारा-4 का विशेष रूप से उल्लेख किया। इसके तहत केंद्र सरकार को अधिसूचना के माध्यम से इस कानून को अन्य विनियमित वित्तीय संस्थाओं पर भी लागू करने का अधिकार दिया गया है।
इस प्रावधान का महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि भारत का वित्तीय क्षेत्र अब बैंकिंग संस्थाओं से कहीं बड़ा हो चुका है। NBFC, पेमेंट एग्रीगेटर, फिनटेक कंपनियां और अन्य विनियमित वित्तीय सेवा प्रदाता लोगों की रोजमर्रा की आर्थिक गतिविधियों का हिस्सा बन चुके हैं।
अगर जरूरत के अनुसार नए कानून का दायरा इन संस्थाओं तक बढ़ाया जाता है, तो वित्तीय क्षेत्र के अलग-अलग हिस्सों में सुबूतों से संबंधित नियमों को एक समान बनाने में मदद मिल सकती है। सरकार का उद्देश्य भी पूरे वित्तीय क्षेत्र के लिए एक समान और स्पष्ट कानूनी ढांचा तैयार करना है।
ग्राहकों की निजता और गोपनीयता पर भी जोर
बैंकिंग रिकॉर्ड में ग्राहकों से जुड़ी संवेदनशील वित्तीय जानकारी होती है। ऐसे रिकॉर्ड में खाते से संबंधित विवरण, लेनदेन और अन्य निजी वित्तीय सूचनाएं शामिल हो सकती हैं। इसलिए किसी भी कानूनी ढांचे में रिकॉर्ड को सुबूत के रूप में इस्तेमाल करने के साथ-साथ ग्राहक की निजता और गोपनीयता का सवाल भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि नया विधेयक बैंकिंग रिकॉर्ड के इस्तेमाल के लिए सुरक्षित और पारदर्शी व्यवस्था तैयार करने के साथ ग्राहकों की निजता और गोपनीयता की सुरक्षा पर भी ध्यान देता है।
इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जब किसी कानूनी कार्यवाही में बैंकिंग रिकॉर्ड की जरूरत हो, तब संबंधित जानकारी को उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत इस्तेमाल किया जा सके। वहीं ग्राहकों के निजी वित्तीय विवरण की सुरक्षा भी बनी रहे।
वित्तीय विवादों और कानूनी मामलों में क्या बदलेगा?
बैंकिंग रिकॉर्ड कई प्रकार की कानूनी कार्यवाहियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वित्तीय लेनदेन से जुड़े विवादों, बैंकिंग मामलों और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं में खाते से संबंधित रिकॉर्ड को सुबूत के रूप में पेश करने की आवश्यकता पड़ सकती है।
नया कानून ऐसे मामलों के लिए अधिक स्पष्ट व्यवस्था उपलब्ध कराने की कोशिश करता है। इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को कानूनी प्रक्रिया के अनुकूल मान्यता देने की व्यवस्था से डिजिटल बैंकिंग के दौर में पैदा होने वाली व्यावहारिक चुनौतियों को कम किया जा सकता है।
इसके अलावा, रिकॉर्ड को इलेक्ट्रॉनिक या भौतिक रूप में पेश करने का विकल्प उपलब्ध होने से कानूनी प्रक्रिया में सुविधा बढ़ने की उम्मीद है। इससे यह भी सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है कि तकनीक के कारण महत्वपूर्ण वित्तीय रिकॉर्ड को कानूनी कार्यवाही में इस्तेमाल करने में अनावश्यक अड़चन न आए।
वित्तीय क्षेत्र में एकरूपता लाने की कोशिश
सरकार की ओर से विधेयक को केवल पुराने कानून को बदलने की कवायद के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इसके पीछे व्यापक वित्तीय क्षेत्र को एक आधुनिक कानूनी ढांचे के तहत लाने का उद्देश्य भी है।
देश में डिजिटल भुगतान और ऑनलाइन वित्तीय सेवाओं के विस्तार के साथ वित्तीय संस्थाओं की संख्या और उनकी सेवाओं का दायरा बढ़ा है। ऐसे में अलग-अलग संस्थाओं और अलग-अलग प्रकार के रिकॉर्ड के लिए स्पष्ट नियम होना जरूरी हो गया है।
वित्त मंत्री के अनुसार, वित्तीय क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाएं आम लोगों की बैंकिंग और वित्तीय जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। इसलिए जब भी किसी संस्थान के रिकॉर्ड की कानूनी कार्यवाही में जरूरत पड़े, तो उसके लिए स्पष्ट और समान सुबूत संबंधी व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिए।
1891 के कानून से आधुनिक डिजिटल व्यवस्था तक
इस पूरे बदलाव को समझने के लिए 1891 और 2026 के बैंकिंग सिस्टम के बीच का अंतर देखना जरूरी है। जब बैंकर्स बुक्स एविडेंस एक्ट बनाया गया था, तब बैंकिंग रिकॉर्ड मुख्य रूप से पुस्तकों और कागजी दस्तावेजों के रूप में मौजूद थे। आज बैंकिंग की बड़ी मात्रा डिजिटल सिस्टम पर निर्भर है।
ग्राहक मोबाइल से भुगतान कर सकता है, ऑनलाइन बैंकिंग के जरिए पैसा भेज सकता है और डिजिटल माध्यम से वित्तीय सेवाओं का इस्तेमाल कर सकता है। इन सभी गतिविधियों के रिकॉर्ड इलेक्ट्रॉनिक रूप में तैयार होते हैं।
ऐसे में 135 वर्ष पुराने कानून को बदलकर मौजूदा तकनीकी और वित्तीय वास्तविकताओं के अनुसार नया ढांचा तैयार करना सरकार के लिए जरूरी कदम माना जा रहा है।
संसद की मंजूरी के बाद आगे क्या?
लोकसभा से 5 अगस्त को पारित होने के बाद राज्यसभा में भी विधेयक को सोमवार को मंजूरी मिल गई। दोनों सदनों से पारित होने के बाद यह कानून बनने की प्रक्रिया में आगे बढ़ेगा और निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद लागू किया जा सकेगा।
इस कानून के लागू होने के बाद बैंकिंग रिकॉर्ड से जुड़े कानूनी मामलों में आधुनिक डिजिटल व्यवस्था को अधिक स्पष्ट आधार मिलने की उम्मीद है। साथ ही, सरकार को अधिसूचना के माध्यम से जरूरत के अनुसार अन्य विनियमित वित्तीय संस्थाओं को भी इसके दायरे में लाने की शक्ति मिलेगी।
कुल मिलाकर ‘बैंकर्स बुक्स एविडेंस बिल-2026’ का प्रमुख उद्देश्य बैंकिंग और वित्तीय रिकॉर्ड से जुड़े कानून को मौजूदा दौर की जरूरतों के अनुरूप बनाना है। 1891 के कानून की जगह लेने वाला यह नया ढांचा फिजिकल और इलेक्ट्रॉनिक दोनों तरह के रिकॉर्ड को ध्यान में रखता है। इसके साथ ही वित्तीय क्षेत्र में बढ़ती विविधता को देखते हुए अन्य विनियमित संस्थाओं तक कानून का दायरा बढ़ाने का रास्ता भी खुलता है।
सरकार का दावा है कि इससे कानूनी कार्यवाही में बैंकिंग रिकॉर्ड के इस्तेमाल की प्रक्रिया अधिक स्पष्ट, सुरक्षित और पारदर्शी होगी। वहीं ग्राहकों की गोपनीयता और निजी वित्तीय जानकारी की सुरक्षा को भी कानून के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में देखा गया है। डिजिटल बैंकिंग के तेजी से विस्तार के बीच संसद की मंजूरी से पुराने बैंकिंग कानून को आधुनिक वित्तीय व्यवस्था के अनुरूप बदलने की दिशा में एक अहम कदम उठाया गया है।