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नो इंश्योरेंस तो नहीं मिलेगा पेट्रोल! सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को पायलट प्रोजेक्ट जल्द लागू करने को कहा

सड़कों पर बिना वैध बीमा के दौड़ रहे वाहनों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को सख्त रुख अपनाने का निर्देश दिया है। अदालत ने कहा है कि वाहनों के थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस को ईंधन की उपलब्धता से जोड़ने की दिशा में तैयार किए जा रहे पायलट प्रोजेक्ट को अब आगे बढ़ाया जाए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि योजना को केवल कागजों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।

बुधवार को मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा कि वह पायलट प्रोजेक्ट को शुरू करे। अदालत ने इसके लिए दिल्ली को शुरुआती क्षेत्र के तौर पर इस्तेमाल करने का सुझाव भी दिया। कोर्ट का कहना था कि यदि किसी वाहन के पास जरूरी वैध बीमा नहीं है तो उसे पेट्रोल या डीजल उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर गंभीरता से काम किया जाना चाहिए।

यह मामला जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ के सामने सुनवाई के लिए आया था। सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की तरफ से पेश वकील ने अदालत को बताया कि इस दिशा में काम करने के लिए पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के सामने कुछ व्यावहारिक चिंताएं हैं। इसके बाद अदालत ने सरकार से कहा कि इन चुनौतियों के बावजूद पायलट प्रोजेक्ट को आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

चार अगस्त के आदेश के बाद बढ़ी कार्रवाई

दरअसल, यह पूरा मामला सड़क सुरक्षा और वाहनों के अनिवार्य बीमा से जुड़ा हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने चार अगस्त को दिए अपने महत्वपूर्ण आदेश में इस बात पर चिंता जताई थी कि देश में बड़ी संख्या में वाहन ऐसे हैं जो बिना वैध थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस के सड़कों पर चल रहे हैं। मोटर वाहन कानून के तहत थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस जरूरी है, लेकिन इसके बावजूद कई वाहन मालिक बीमा नियमों का पालन नहीं करते।

अदालत ने इस स्थिति को गंभीरता से लेते हुए केंद्र सरकार को एक पायलट प्रोजेक्ट तैयार करने का निर्देश दिया था। इस योजना का उद्देश्य वाहन के बीमा स्टेटस और ईंधन खरीदने की सुविधा के बीच सीधा संबंध स्थापित करना है। यानी भविष्य में ऐसा सिस्टम तैयार करने की कोशिश की जा रही है जिसमें पेट्रोल पंप पर ईंधन लेने से पहले वाहन के बीमा की वैधता की जांच हो सके।

सुप्रीम कोर्ट का मानना है कि इस तरह की व्यवस्था लागू होने से बिना बीमा वाले वाहनों की संख्या को कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही इससे वाहन मालिकों को अपने बीमा दस्तावेज समय पर अपडेट कराने के लिए भी प्रोत्साहन मिलेगा।

दिल्ली से शुरू हो सकता है ट्रायल

बुधवार की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि इस व्यवस्था का परीक्षण पहले दिल्ली में किया जा सकता है। अदालत ने केंद्र को सुझाव दिया कि पायलट प्रोजेक्ट के लिए राजधानी को शुरुआती क्षेत्र के रूप में चुना जाए और वहां इसके व्यावहारिक असर को देखा जाए।

हालांकि, इस तरह की व्यवस्था लागू करना केवल सरकार के एक विभाग के फैसले से संभव नहीं होगा। इसके लिए पेट्रोलियम मंत्रालय, तेल विपणन कंपनियों, पेट्रोल पंप डीलरों और संबंधित तकनीकी एजेंसियों के बीच समन्वय की जरूरत होगी। केंद्र की ओर से अदालत को बताया गया कि तेल विपणन कंपनियों को अपने डीलरों के साथ बैठक करनी होगी, ताकि इस योजना को लागू करने की प्रक्रिया और उससे जुड़ी व्यावहारिक समस्याओं पर चर्चा की जा सके।

इसी बिंदु पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बातचीत और तैयारियों की प्रक्रिया चलती रह सकती है, लेकिन पायलट प्रोजेक्ट को शुरू करने में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए। अदालत ने केंद्र से कहा कि वह योजना को अमल में लाने की दिशा में आगे बढ़े।

पेट्रोल पंपों पर कैसे हो सकती है बीमा की जांच?

प्रस्तावित व्यवस्था का मूल विचार यह है कि ईंधन लेने वाले वाहन की बीमा स्थिति को किसी डिजिटल या इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के जरिए सत्यापित किया जाए। यदि वाहन का थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस वैध पाया जाता है तो ईंधन देने की प्रक्रिया सामान्य रूप से जारी रह सकती है। वहीं बीमा समाप्त होने की स्थिति में वाहन मालिक को पहले अपना बीमा रिन्यू कराने की जरूरत पड़ सकती है।

हालांकि, अभी यह तय नहीं हुआ है कि पायलट प्रोजेक्ट में किस तकनीकी मॉडल का इस्तेमाल होगा और बीमा की जांच किस स्तर पर की जाएगी। यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि पेट्रोल पंपों पर कर्मचारियों के लिए प्रक्रिया कितनी सरल रखी जाएगी और ऐसे मामलों से कैसे निपटा जाएगा जहां डिजिटल रिकॉर्ड अपडेट नहीं हुआ हो।

इसी वजह से तेल कंपनियों और डीलरों के बीच चर्चा को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिससे वाहन मालिकों को अनावश्यक परेशानी न हो और पेट्रोल पंपों पर ईंधन बिक्री की प्रक्रिया भी प्रभावित न हो।

केंद्र को समय-सीमा वाला प्रस्ताव देना होगा

सुप्रीम कोर्ट ने केवल पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने की बात नहीं कही, बल्कि केंद्र से चार अगस्त के आदेश में दिए गए निर्देशों पर कार्रवाई के लिए समय-सीमा के साथ ठोस प्रस्ताव पेश करने को भी कहा है। इसका मतलब है कि सरकार को अदालत के सामने यह बताना होगा कि वह इस व्यवस्था को लागू करने के लिए क्या कदम उठाएगी, उन्हें पूरा करने में कितना समय लगेगा और पायलट प्रोजेक्ट कब शुरू किया जा सकता है।

अदालत के इस रुख से साफ है कि वह इस मामले में केवल आश्वासन से संतुष्ट नहीं है। कोर्ट चाहती है कि केंद्र सरकार एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करे और उसके आधार पर आगे बढ़े।

मामले की अगली सुनवाई 21 अगस्त को निर्धारित की गई है। उस दिन केंद्र की ओर से पायलट प्रोजेक्ट को लेकर विस्तृत प्रस्ताव और अब तक की कार्रवाई की जानकारी अदालत के सामने रखी जा सकती है।

बिना बीमा वाहन चलाना क्यों है गंभीर मामला?

थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस का उद्देश्य सड़क दुर्घटना की स्थिति में पीड़ित पक्ष को आर्थिक सुरक्षा उपलब्ध कराना है। किसी वाहन से दुर्घटना होने पर सामने वाले व्यक्ति को चोट लगने, मृत्यु होने या संपत्ति को नुकसान पहुंचने की स्थिति में मुआवजे का सवाल उठता है। बीमा कवर होने पर ऐसी स्थिति में आर्थिक दायित्व को संभालने में मदद मिलती है।

लेकिन जब कोई वाहन बिना वैध थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस के सड़क पर चलता है, तो दुर्घटना की स्थिति में पीड़ित को मुआवजा हासिल करने में अतिरिक्त कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इसी वजह से कानून में थर्ड-पार्टी बीमा को अनिवार्य बनाया गया है।

इसके बावजूद बड़ी संख्या में वाहनों के बिना वैध बीमा चलने की समस्या सामने आती रही है। केवल चालान या जुर्माने के जरिए नियमों का पालन सुनिश्चित करना हमेशा आसान नहीं होता। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की ओर से ईंधन व्यवस्था को बीमा से जोड़ने का विचार नियमों के पालन के लिए एक अलग तरह का तरीका माना जा रहा है।

योजना लागू हुई तो वाहन मालिकों पर बढ़ेगी जिम्मेदारी

यदि पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है और आगे इसे बड़े स्तर पर लागू किया जाता है, तो वाहन मालिकों को अपने बीमा की वैधता को लेकर अधिक सतर्क रहना पड़ेगा। बीमा समाप्त होने के बाद वाहन चलाने की स्थिति में केवल कानूनी कार्रवाई का जोखिम ही नहीं रहेगा, बल्कि पेट्रोल पंप पर ईंधन हासिल करने में भी परेशानी हो सकती है।

हालांकि, किसी भी बड़े स्तर की व्यवस्था लागू करने से पहले सरकार को कई व्यावहारिक पहलुओं पर विचार करना होगा। उदाहरण के लिए, नए वाहन, हाल ही में खरीदी गई पॉलिसी, बीमा कंपनी के रिकॉर्ड में अपडेट में देरी या तकनीकी खराबी जैसे मामलों के लिए अलग प्रावधान की जरूरत पड़ सकती है।

इसी तरह यह भी देखना होगा कि पेट्रोल पंपों पर बीमा सत्यापन की प्रक्रिया से ग्राहकों की लंबी कतारें न लगें। अगर हर वाहन की जांच में अतिरिक्त समय लगता है तो इसका असर ईंधन बिक्री की गति पर पड़ सकता है। इसलिए पायलट प्रोजेक्ट का एक उद्देश्य ऐसी तकनीकी व्यवस्था तैयार करना भी होगा जो तेज और भरोसेमंद हो।

अगली सुनवाई पर सरकार के रुख पर नजर

सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्देश के बाद अब केंद्र सरकार के सामने इस योजना को जमीन पर उतारने की चुनौती है। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की ओर से जताई गई चिंताओं को दूर करते हुए सरकार को ऐसा मॉडल तैयार करना होगा जिसे सीमित स्तर पर लागू करके उसकी कमियों और प्रभावों का आकलन किया जा सके।

दिल्ली से पायलट प्रोजेक्ट शुरू करने का सुझाव इसी परीक्षण प्रक्रिया का हिस्सा हो सकता है। इसके जरिए यह देखा जा सकेगा कि बीमा सत्यापन और ईंधन बिक्री को आपस में जोड़ने पर वास्तविक परिस्थितियों में किस तरह की समस्याएं सामने आती हैं और उनका समाधान कैसे किया जा सकता है।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को साफ संदेश दिया है कि चार अगस्त को दिए गए निर्देशों पर आगे बढ़ना होगा। अदालत ने पायलट प्रोजेक्ट को जल्द शुरू करने और समय-सीमा के साथ ठोस योजना प्रस्तुत करने को कहा है। अब सभी की नजर 21 अगस्त की अगली सुनवाई पर रहेगी, जहां केंद्र की ओर से इस दिशा में उठाए गए कदमों की जानकारी सामने आ सकती है।

अगर यह व्यवस्था सफल रहती है, तो आने वाले समय में वाहन बीमा नियमों के पालन को सुनिश्चित करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण मॉडल बन सकती है। फिलहाल इसका परीक्षण सीमित स्तर पर करने की तैयारी है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सख्त रुख से यह स्पष्ट है कि बिना वैध बीमा सड़कों पर चलने वाले वाहनों की समस्या को अब नजरअंदाज नहीं किया जा रहा है।