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पंजाब में कर्मचारी आंदोलन पर सरकार का शिकंजा, सीएम की बैठक ठुकराने पर बढ़ा विवाद; बोले कर्मचारी- हक लेकर रहेंगे

पंजाब में सरकारी कर्मचारियों और भगवंत मान सरकार के बीच चल रहा विवाद अब और गहराता नजर आ रहा है। कर्मचारियों और पेंशनर्स की ओर से बुलाई गई महाहड़ताल के बाद सरकार ने जहां सख्त रुख अपनाना शुरू कर दिया है, वहीं कर्मचारी संगठनों ने भी पीछे हटने से इनकार कर दिया है। दोनों पक्षों के बीच बातचीत के जरिए रास्ता निकालने की कोशिश उस समय कमजोर पड़ गई, जब मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने कर्मचारियों के साथ प्रस्तावित बैठक को हड़ताल खत्म होने तक टालने का संदेश दिया।

सरकार और कर्मचारियों के बीच पैदा हुए इस गतिरोध का असर आने वाले दिनों में और दिखाई दे सकता है। कर्मचारी संगठनों ने साफ कर दिया है कि वे अपनी मांगों से पीछे हटने वाले नहीं हैं। उनका कहना है कि लंबे समय से लंबित मुद्दों का समाधान किए बिना आंदोलन खत्म करने का सवाल ही नहीं उठता। दूसरी ओर सरकार ने महाहड़ताल के दौरान ड्यूटी से अनुपस्थित रहने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों की जानकारी जुटाकर कार्रवाई की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं।

दरअसल, कर्मचारियों और पेंशनर्स की साझा समन्वय समिति ने लंबित मांगों को लेकर गुरुवार को पूरे पंजाब में महाहड़ताल का आह्वान किया था। इस दौरान बड़ी संख्या में सरकारी विभागों में कामकाज प्रभावित रहा। कई जगह कर्मचारियों ने दफ्तरों में काम नहीं किया और स्वास्थ्य विभाग से जुड़े कर्मचारियों ने भी आंदोलन का समर्थन किया। ओपीडी सेवाएं बंद रहने से अस्पतालों में सामान्य मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ा। शिक्षकों ने भी हड़ताल के समर्थन में अपनी भागीदारी दर्ज कराई।

हालांकि कर्मचारी संगठनों का कहना रहा कि आंदोलन के दौरान आपातकालीन सेवाओं को जानबूझकर प्रभावित नहीं किया गया। उनका दावा है कि जनता से जुड़ी अत्यावश्यक सेवाओं को ध्यान में रखते हुए इमरजेंसी व्यवस्था को चालू रखा गया, जबकि सरकार पर अपनी मांगों को लेकर दबाव बनाने के लिए नियमित सरकारी कामकाज बंद रखा गया।

महाहड़ताल के बीच सरकार की ओर से कर्मचारियों से बातचीत का रास्ता खोलने की कोशिश भी हुई। मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान की ओर से जालंधर में कर्मचारी नेताओं के साथ बैठक तय की गई थी। माना जा रहा था कि आमने-सामने बातचीत के जरिए लंबे समय से चले आ रहे विवाद को खत्म करने का प्रयास किया जाएगा। लेकिन बैठक शुरू होने से पहले ही मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर अपना रुख स्पष्ट कर दिया।

सीएम मान ने कहा कि सरकारी कर्मचारी सरकार के लिए परिवार के महत्वपूर्ण सदस्य हैं और उनकी जायज समस्याओं को सुनने के लिए सरकार तैयार है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हड़ताल और बातचीत दोनों चीजें एक साथ नहीं चल सकतीं। सरकार की तरफ से संदेश दिया गया कि यदि कर्मचारी आंदोलन वापस लेते हैं तो उनके मुद्दों पर बातचीत की जा सकती है।

मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद कर्मचारियों के बीच नाराजगी और बढ़ गई। कर्मचारी नेताओं का तर्क है कि सरकार पहले उनकी मांगों पर ठोस फैसला करे, तभी आंदोलन वापस लेने पर विचार किया जा सकता है। उनका कहना है कि यदि हर बार बातचीत की शर्त हड़ताल खत्म करना रखी जाएगी तो कर्मचारियों के पास अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाने के लिए आंदोलन के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा।

विवाद का दूसरा बड़ा पहलू सरकार की ओर से शुरू की गई कार्रवाई की तैयारी है। महाहड़ताल के दिन ही कार्मिक विभाग ने सभी प्रशासनिक सचिवों और विभागाध्यक्षों को निर्देश जारी किए। इसमें कहा गया कि जो अधिकारी और कर्मचारी बिना अधिकृत अनुमति के ड्यूटी से अनुपस्थित रहे हैं, उनकी सूची तैयार की जाए। इन सूचियों को गुरुवार को कार्यदिवस समाप्त होने तक सामान्य प्रशासन विभाग को भेजने के निर्देश दिए गए।

सरकार ने अपने निर्देश में कर्मचारियों की अनुपस्थिति के कारण आम जनता को हुई असुविधा का भी उल्लेख किया। प्रशासन की ओर से यह संदेश दिया गया कि सरकारी सेवाओं में तैनात कर्मचारियों की जिम्मेदारी है कि वे निर्धारित ड्यूटी निभाएं और बिना अनुमति अनुपस्थित रहकर सरकारी कामकाज को प्रभावित न करें।

कार्मिक विभाग के निर्देश जारी होने के बाद अलग-अलग विभागों ने कर्मचारियों की सूची तैयार करना शुरू कर दिया। विभागों की ओर से अनुपस्थित रहने वाले कर्मचारियों के नाम कार्मिक शाखा को भेजे जाने लगे। इससे कर्मचारियों के बीच यह आशंका पैदा हुई कि सरकार आंदोलन में शामिल कर्मचारियों पर विभागीय कार्रवाई कर सकती है।

कर्मचारी नेताओं ने सरकार के इस रुख पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उनका कहना है कि आंदोलन किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं बल्कि कर्मचारियों और पेंशनर्स की लंबे समय से लंबित मांगों को लेकर किया जा रहा है। नेताओं ने सरकार को चेतावनी दी कि दबाव या कार्रवाई के जरिए आंदोलन को खत्म नहीं किया जा सकता।

साझा समन्वय समिति ने आंदोलन को आगे बढ़ाने का भी फैसला किया है। कर्मचारी संगठनों के मुताबिक 28 और 29 अगस्त को पंजाब के विभिन्न ब्लॉक और तहसील स्तर पर सरकार के पुतले फूंके जाएंगे। इसके जरिए सरकार के मौजूदा रवैये के खिलाफ विरोध दर्ज कराया जाएगा। संगठन इस प्रदर्शन को महाहड़ताल के बाद आंदोलन के अगले चरण के तौर पर देख रहे हैं।

इसके बाद 30 अगस्त को लुधियाना में साझा समन्वय समिति की अहम बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में कर्मचारी और पेंशनर्स संगठनों के प्रतिनिधि आगे की रणनीति पर चर्चा करेंगे। माना जा रहा है कि बैठक में सरकार के साथ बातचीत, संभावित कार्रवाई और आंदोलन को आगे बढ़ाने जैसे मुद्दों पर फैसला लिया जा सकता है।

कर्मचारी संगठनों की प्रमुख मांगों में बकाया महंगाई भत्ता यानी डीए का भुगतान और पुरानी पेंशन योजना की बहाली शामिल है। इसके अलावा भी कर्मचारियों और पेंशनर्स से जुड़े कई मुद्दे हैं, जिन्हें लेकर संगठन सरकार के सामने अपनी मांगें रख चुके हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि कई मांगों पर लंबे समय से चर्चा होने के बावजूद उन्हें अपेक्षित समाधान नहीं मिला है।

महंगाई भत्ते से जुड़ी मांग कर्मचारियों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बनी हुई है। कर्मचारियों का कहना है कि बढ़ती महंगाई के दौर में डीए का समय पर भुगतान उनके वेतन और आर्थिक स्थिति से सीधे जुड़ा हुआ है। वहीं पुरानी पेंशन योजना की बहाली को लेकर भी कर्मचारी संगठन लगातार दबाव बनाते रहे हैं।

महाहड़ताल की सफलता को कर्मचारी संगठन अपने आंदोलन की मजबूती के तौर पर पेश कर रहे हैं। उनका दावा है कि पंजाब के अलग-अलग हिस्सों में बड़ी संख्या में कर्मचारियों ने कामकाज से दूरी बनाकर सरकार को अपनी ताकत का एहसास कराया है। शिक्षकों और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कर्मचारियों के समर्थन को भी संगठन अपने पक्ष में महत्वपूर्ण मान रहे हैं।

दूसरी ओर सरकार के लिए भी यह मामला सिर्फ कर्मचारी संगठनों से बातचीत तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक सरकारी कामकाज प्रभावित होने से आम लोगों को होने वाली परेशानी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन सकती है। इसी वजह से प्रशासन ने अनुपस्थित कर्मचारियों की जानकारी जुटाने और व्यवस्था को सामान्य बनाए रखने पर जोर दिया है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकार और कर्मचारी संगठन दोबारा बातचीत की मेज पर लौटेंगे। मुख्यमंत्री ने साफ संकेत दिया है कि हड़ताल जारी रहते हुए बातचीत संभव नहीं है, जबकि कर्मचारी संगठन आंदोलन खत्म करने से पहले अपनी मांगों पर ठोस आश्वासन चाहते हैं। यही अंतर दोनों पक्षों के बीच सबसे बड़ी अड़चन बन गया है।

कर्मचारी नेताओं का रुख फिलहाल आक्रामक है। वे सरकार की कार्रवाई की चेतावनी से पीछे हटने के बजाय आंदोलन को आगे बढ़ाने की तैयारी में हैं। नेताओं ने अपने समर्थकों को संदेश दिया है कि किसी भी तरह के दबाव से डरने की जरूरत नहीं है और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष जारी रखा जाएगा।

आने वाले कुछ दिन पंजाब के सरकारी कर्मचारियों और सरकार के बीच संबंधों के लिहाज से अहम रहने वाले हैं। 28 और 29 अगस्त के विरोध प्रदर्शन तथा 30 अगस्त की लुधियाना बैठक के बाद आंदोलन की अगली दिशा स्पष्ट हो सकती है। यदि सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच बीच का रास्ता नहीं निकलता, तो टकराव और बढ़ने की आशंका बनी रहेगी।

फिलहाल स्थिति यही है कि एक तरफ सरकार बातचीत के लिए हड़ताल वापस लेने की शर्त रख रही है, तो दूसरी तरफ कर्मचारी बिना मांगों पर ठोस प्रगति के आंदोलन खत्म करने को तैयार नहीं हैं। सरकारी विभागों में अनुपस्थित कर्मचारियों की सूची तैयार होने और संभावित कार्रवाई की चर्चा ने तनाव और बढ़ा दिया है। ऐसे में अब सबकी नजर कर्मचारी संगठनों की अगली बैठक और सरकार की आगे की रणनीति पर टिकी हुई है।

फोटो : अमर उजाला