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चुनावी मैदान में डिजिटल इंफ्लूएंसर्स की एंट्री: पार्टियां बना रहीं लोकल क्रिएटर्स की टीम, एक कंटेंट के लिए 30 लाख तक का दावा

भारत में चुनाव प्रचार का तरीका तेजी से बदल रहा है। कभी राजनीतिक दलों की सबसे बड़ी ताकत उनके जमीनी कार्यकर्ता, स्थानीय नेता, पोस्टर, रैलियां और घर-घर संपर्क अभियान हुआ करते थे। अब इस पारंपरिक चुनावी मशीनरी के साथ सोशल मीडिया की एक नई व्यवस्था भी जुड़ती जा रही है। पार्टियां अब ऐसे कंटेंट क्रिएटर्स और सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर्स को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही हैं, जिनकी पहुंच सीधे मतदाताओं के मोबाइल फोन तक है।

आने वाले विधानसभा चुनावों को देखते हुए उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड जैसे राज्यों में डिजिटल प्रचार को लेकर गतिविधियां बढ़ने की बात सामने आ रही है। राजनीतिक अभियानों से जुड़े लोगों के मुताबिक, खास तौर पर 10 हजार से लेकर 50 हजार तक फॉलोअर्स रखने वाले स्थानीय क्रिएटर्स पर नजर है। इनकी खासियत सिर्फ फॉलोअर्स की संख्या नहीं, बल्कि किसी खास इलाके या समुदाय में उनकी पकड़ मानी जा रही है।

सोशल मीडिया पर सक्रिय कोई शिक्षक, किसान, युवा कार्यकर्ता, कॉमेडियन या स्थानीय मुद्दों पर वीडियो बनाने वाला व्यक्ति कई बार किसी बड़े सेलिब्रिटी की तुलना में ज्यादा असर डाल सकता है। वजह यह है कि उसके दर्शक उसे अपने आसपास के व्यक्ति के तौर पर देखते हैं और उसकी बात को स्थानीय संदर्भ में समझते हैं।

रैली और पोस्टर के साथ अब रील भी चुनावी हथियार

चुनावी प्रचार में इंस्टाग्राम रील्स, शॉर्ट वीडियो, मीम्स और पॉडकास्ट जैसे माध्यमों का महत्व लगातार बढ़ रहा है। किसी राजनीतिक मुद्दे को लंबे भाषण के बजाय 30 सेकंड या एक मिनट के वीडियो में पेश किया जा सकता है। यही वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर तेजी से शेयर होकर बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकता है।

युवा वर्ग के बीच डिजिटल प्लेटफॉर्म की पहुंच ने राजनीतिक दलों को इस माध्यम की ताकत समझने के लिए मजबूर किया है। हाल के वर्षों में कई आंदोलनों और जनअभियानों में सोशल मीडिया ने लोगों को जोड़ने, मुद्दों को सामने लाने और सरकारों से सवाल पूछने में अहम भूमिका निभाई है।

अब पार्टियां इसी डिजिटल प्रभाव को चुनावी रणनीति का हिस्सा बनाने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं। एक तरफ पार्टी के पारंपरिक कार्यकर्ता बूथ स्तर पर मतदाताओं से संपर्क कर सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ डिजिटल क्रिएटर सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे का माहौल तैयार कर सकते हैं।

फॉलोअर्स से ज्यादा जरूरी है स्थानीय प्रभाव

डिजिटल कैंपेन से जुड़े लोगों के अनुसार, किसी इंफ्लूएंसर को चुनते समय सिर्फ उसके फॉलोअर्स नहीं देखे जाते। उसकी ऑडियंस किस इलाके से आती है, किस उम्र के लोग उसे देखते हैं, उसके वीडियो पर किस तरह की प्रतिक्रिया आती है और वह किस मुद्दे पर प्रभाव डाल सकता है, ये सभी बातें महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

उदाहरण के तौर पर 15 हजार फॉलोअर्स वाला कोई स्थानीय शिक्षक अगर अपने क्षेत्र में युवाओं और अभिभावकों के बीच प्रभाव रखता है, तो वह किसी ऐसे बड़े क्रिएटर से अधिक उपयोगी हो सकता है जिसके लाखों फॉलोअर्स पूरे देश में फैले हों।

यही कारण है कि राजनीतिक दल अब छोटे और मझोले क्रिएटर्स का नेटवर्क तैयार करने पर जोर दे रहे हैं। इन क्रिएटर्स के जरिए अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समूहों तक अलग-अलग संदेश पहुंचाने की रणनीति अपनाई जा सकती है।

एक रील के 15 हजार से 50 हजार रुपये तक के दावे

राजनीतिक सोशल मीडिया कैंपेन से जुड़े लोगों की ओर से क्रिएटर्स को मिलने वाले भुगतान को लेकर अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। बताया जाता है कि राजनीतिक रील के लिए करीब 15 हजार से 50 हजार रुपये तक दिए जा सकते हैं। वहीं सोशल मीडिया पोस्ट के लिए 15 हजार से 20 हजार रुपये तक की रकम का दावा किया गया है।

सोशल मीडिया कंपनी चलाने वाले श्याम तिवारी के मुताबिक, करीब 5 लाख तक सब्सक्राइबर वाले क्रिएटर 50 हजार से एक लाख रुपये तक चार्ज कर सकते हैं। वहीं 50 लाख से अधिक सब्सक्राइबर रखने वाले बड़े क्रिएटर के एक कंटेंट की कीमत 30 लाख रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है।

हालांकि, वास्तविक भुगतान कई बातों पर निर्भर कर सकता है। किसी क्रिएटर की लोकप्रियता, वीडियो की औसत पहुंच, दर्शकों की प्रोफाइल और कैंपेन का स्वरूप उसके शुल्क को प्रभावित कर सकते हैं।

पार्टियां क्रिएटर की बॉडी लैंग्वेज तक देख रही हैं

डिजिटल प्रचार अब केवल किसी व्यक्ति से पार्टी के पक्ष में वीडियो बनवाने तक सीमित नहीं रह गया है। राजनीतिक अभियानों से जुड़े लोगों के अनुसार, क्रिएटर के विचार, सामाजिक छवि, दर्शकों के बीच उसकी विश्वसनीयता और यहां तक कि उसके बोलने के तरीके तथा बॉडी लैंग्वेज पर भी ध्यान दिया जाता है।

किसी नेता की सकारात्मक छवि तैयार करनी हो तो पॉडकास्ट जैसे लंबे फॉर्मेट का सहारा लिया जा सकता है। दूसरी तरफ किसी तत्काल राजनीतिक मुद्दे पर प्रतिक्रिया देनी हो तो छोटी रील या शॉर्ट वीडियो ज्यादा प्रभावी मानी जाती है।

इस तरह अलग-अलग प्लेटफॉर्म और अलग-अलग क्रिएटर के लिए अलग रणनीति बनाई जा रही है।

राजनीतिक प्रचार और पेड कंटेंट को लेकर बड़ा सवाल

डिजिटल राजनीति के विस्तार के साथ पारदर्शिता को लेकर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। चुनावी विज्ञापन और राजनीतिक प्रचार पर चुनाव आयोग के नियम लागू होते हैं। वहीं विज्ञापन से जुड़े दिशा-निर्देशों के तहत पेड प्रमोशन की स्पष्ट जानकारी देने पर भी जोर दिया जाता है।

लेकिन असली चुनौती उस स्थिति में पैदा होती है, जब कोई क्रिएटर सीधे यह न बताए कि उसे किसी राजनीतिक दल या अभियान से भुगतान मिला है।

मान लीजिए कोई शिक्षक अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर किसी सरकार की शिक्षा नीति की तारीफ करता है। दर्शकों के लिए यह समझना आसान नहीं होगा कि वह अपनी व्यक्तिगत राय व्यक्त कर रहा है या उसके पीछे कोई प्रायोजित राजनीतिक अभियान है।

इसी तरह कोई स्थानीय कॉमेडियन किसी राजनीतिक नेता को लेकर मजेदार वीडियो बनाए या कोई किसान किसी सरकारी योजना की प्रशंसा करे, तो दर्शक यह कैसे तय करेंगे कि यह स्वतंत्र कंटेंट है या चुनावी प्रचार का हिस्सा?

आने वाले चुनावों में यह सवाल और महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि राजनीतिक संदेश अब पारंपरिक विज्ञापन की तरह दिखाई देने के बजाय सामान्य सोशल मीडिया कंटेंट के रूप में लोगों तक पहुंच सकता है।

इंफ्लूएंसर बदल सकता है, नेटवर्क नहीं

डिजिटल कैंपेन से जुड़े लोगों का कहना है कि छोटे और मझोले इंफ्लूएंसर आम तौर पर किसी एक राजनीतिक दल के स्थायी प्रचारक नहीं होते। अलग-अलग समय और परिस्थितियों में वे भाजपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी या अन्य राजनीतिक दलों से जुड़े अभियानों के लिए काम कर सकते हैं।

यानी पार्टियां ऐसे लोगों का स्थायी कैडर बनाने के बजाय एक व्यापक डिजिटल नेटवर्क तैयार करने की कोशिश कर रही हैं। जरूरत के हिसाब से अलग इलाके, भाषा, समुदाय और विषय के लिए अलग क्रिएटर का इस्तेमाल किया जा सकता है।

यह मॉडल राजनीतिक दलों को पारंपरिक संगठन से अलग तरह की पहुंच देता है। जहां पार्टी का कार्यकर्ता अपने इलाके में सीमित संख्या में लोगों से संपर्क करता है, वहीं एक वायरल वीडियो हजारों या लाखों स्क्रीन पर एक साथ दिखाई दे सकता है।

वायरल होना और वोट मिलना दो अलग बातें

हालांकि डिजिटल लोकप्रियता को सीधे चुनावी सफलता मानना जल्दबाजी होगी। कांग्रेस की जेन-जी कनेक्ट यात्रा से जुड़े सुधांशु वाजपेयी का कहना है कि सोशल मीडिया पर रील के जरिए किसी व्यक्ति को तेजी से पहचान मिल सकती है, लेकिन मतदाता को मतदान केंद्र तक पहुंचाने का काम अभी भी जमीनी कार्यकर्ता ही करता है।

यही चुनावी राजनीति का अहम अंतर है। किसी वीडियो के लाखों व्यूज आ जाना इस बात की गारंटी नहीं है कि उतने ही लोग चुनाव में उसी दल या उम्मीदवार को वोट देंगे।

सोशल मीडिया किसी मुद्दे पर चर्चा पैदा कर सकता है, किसी नेता की छवि मजबूत कर सकता है या किसी अभियान को तेजी दे सकता है। लेकिन मतदान के दिन बूथ प्रबंधन, स्थानीय संगठन, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और मतदाता से व्यक्तिगत संपर्क जैसे पुराने कारक अब भी महत्वपूर्ण रहेंगे।

सोनम वांगचुक के अभियान से मिली डिजिटल ताकत की झलक

सोशल मीडिया की क्षमता का उदाहरण सोनम वांगचुक के लद्दाख अभियान से भी जोड़ा जाता है। उनके आंदोलन और भूख हड़ताल के बाद देश के अलग-अलग हिस्सों में समर्थन से जुड़े कार्यक्रम आयोजित हुए। 2024 की भूख हड़ताल के बाद कम से कम 50 शहरों में ‘फ्रेंड्स ऑफ लद्दाख’ कार्यक्रम होने की बात सामने आई।

इससे यह संकेत मिला कि ऑनलाइन समर्थन को जमीन पर मौजूद गतिविधियों में बदला जा सकता है। हालांकि हर डिजिटल अभियान का परिणाम ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है।

‘जागो कर्नाटक’ के संयोजक नूर श्रीधर भी सोशल मीडिया और बूथ स्तर के संगठन के बीच तालमेल को अहम मानते हैं। उनके मुताबिक डिजिटल प्लेटफॉर्म लोगों का ध्यान किसी मुद्दे की ओर खींच सकता है, लेकिन उसे वास्तविक राजनीतिक समर्थन में बदलने के लिए जमीन पर मजबूत व्यवस्था की जरूरत होती है।

2027 में दिखेगा डिजिटल चुनावी रणनीति का असर

उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दल डिजिटल प्रचार को लेकर प्रयोग कर रहे हैं। यह रणनीति आने वाले समय में चुनावी अभियानों का स्थायी हिस्सा बन सकती है।

पहले राजनीतिक दलों के पास पोस्टर, बैनर, रैलियां, अखबार और टेलीविजन जैसे माध्यम प्रमुख थे। अब इनके साथ लाखों छोटे डिजिटल चैनल जुड़ गए हैं। हर स्थानीय क्रिएटर अपने क्षेत्र में एक छोटे मीडिया प्लेटफॉर्म की तरह काम कर सकता है।

यही वजह है कि चुनावी राजनीति में ‘डिजिटल फौज’ की चर्चा बढ़ रही है। पार्टियों के सामने चुनौती केवल ज्यादा से ज्यादा इंफ्लूएंसर जोड़ने की नहीं, बल्कि सही क्रिएटर को सही इलाके और सही मुद्दे के साथ जोड़ने की होगी।

अंततः चुनावी नतीजे यह तय करेंगे कि सोशल मीडिया की पहुंच वास्तव में वोट में कितनी बदल पाती है। रील और शॉर्ट वीडियो लोगों का ध्यान जरूर खींच सकते हैं, लेकिन लोकतांत्रिक चुनाव में आखिरी फैसला अब भी मतदाता का होता है। डिजिटल स्क्रीन से शुरू हुआ अभियान बूथ तक पहुंचता है या नहीं, यही राजनीतिक दलों की नई ऑनलाइन रणनीति की सबसे बड़ी परीक्षा होगी।

Photo : AI