कांग्रेस सांसद और लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से जुड़े मानहानि मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने राहुल गांधी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए जारी किए गए समन को रद्द करने की मांग की थी। मामला वर्ष 2018 में राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर की गई उनकी कथित टिप्पणी से जुड़ा है।
बॉम्बे हाई कोर्ट की एकल पीठ ने मंगलवार को इस मामले में अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि निचली अदालत की ओर से पारित आदेश में ऐसा कोई कानूनी दोष या अनियमितता नजर नहीं आती, जिसके आधार पर हाई कोर्ट को उसमें हस्तक्षेप करना चाहिए। न्यायमूर्ति एनआर बोरकर की पीठ ने इसी आधार पर राहुल गांधी की याचिका को खारिज कर दिया।
हालांकि, इस फैसले के साथ ही राहुल गांधी के लिए आगे कानूनी चुनौती का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। हाई कोर्ट ने अपने 2021 के उस आदेश को कायम रखा, जिसके तहत मजिस्ट्रेट अदालत को शिकायत पर आगे की सुनवाई छह सप्ताह तक स्थगित रखने का निर्देश दिया गया था। यह अवधि राहुल गांधी को हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का अवसर देने के लिए रखी गई है।
किस मामले में फंसे हैं राहुल गांधी?
यह पूरा मामला राहुल गांधी की उस टिप्पणी से जुड़ा है, जो उन्होंने राफेल सौदे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए की थी। शिकायतकर्ता एमएच श्रीश्रीमल ने आरोप लगाया था कि राहुल गांधी ने राजस्थान में आयोजित एक जनसभा के दौरान प्रधानमंत्री के लिए ‘चोरों का सरदार’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।
शिकायत के मुताबिक, राहुल गांधी ने सितंबर 2018 में राजस्थान में एक राजनीतिक सभा को संबोधित करते हुए राफेल विमान सौदे के मुद्दे पर केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर गंभीर आरोप लगाए थे। शिकायतकर्ता का दावा था कि इन टिप्पणियों से प्रधानमंत्री की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा और उनके खिलाफ मानहानिकारक आरोप लगाए गए।
इसी आधार पर राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक मानहानि की शिकायत दायर की गई थी। बाद में मामले में गिरगांव मजिस्ट्रेट अदालत ने 28 अगस्त 2019 को राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया आगे बढ़ाने का आदेश दिया था। इसी आदेश को कांग्रेस नेता ने बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी।
हाई कोर्ट ने क्यों नहीं माना निचली अदालत का आदेश गलत?
राहुल गांधी की याचिका पर सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या मजिस्ट्रेट द्वारा आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने का आदेश कानून के मुताबिक था या उसमें ऐसी कोई गंभीर खामी थी, जिसके कारण उसे रद्द किया जाना चाहिए।
न्यायमूर्ति एनआर बोरकर ने मामले की सुनवाई के बाद कहा कि अदालत को मजिस्ट्रेट के आदेश में किसी तरह की गैरकानूनी बात या ऐसी त्रुटि दिखाई नहीं देती, जिसके कारण हाई कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़े। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आदेश में कोई खामी नहीं पाई गई और इसी वजह से राहुल गांधी की याचिका खारिज की जा रही है।
इस फैसले का सीधा मतलब यह है कि राहुल गांधी के खिलाफ इस मामले में निचली अदालत की ओर से शुरू की गई आपराधिक प्रक्रिया को फिलहाल रद्द नहीं किया गया है।
शिकायतकर्ता ने लगाए थे ये आरोप
राहुल गांधी के खिलाफ शिकायत करने वाले एमएच श्रीश्रीमल ने खुद को भारतीय जनता पार्टी का कार्यकर्ता बताया था। उन्होंने अपनी शिकायत में केवल जनसभा में दिए गए बयान का ही जिक्र नहीं किया, बल्कि राहुल गांधी के सोशल मीडिया पोस्ट का भी हवाला दिया था।
श्रीश्रीमल के अनुसार, राहुल गांधी ने अपने ‘एक्स’ अकाउंट पर एक वीडियो साझा किया था, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ‘कमांडर-इन-थीफ’ शब्द का इस्तेमाल किया गया था। शिकायतकर्ता ने इन बयानों को प्रधानमंत्री और भाजपा से जुड़े लोगों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला बताया।
शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया था कि राहुल गांधी की टिप्पणियों का असर केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक सीमित नहीं था। शिकायतकर्ता का दावा था कि इन बयानों के जरिए भाजपा के सदस्यों और प्रधानमंत्री से जुड़े भारतीय नागरिकों पर भी चोरी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए।
इसी कथित मानहानिकारक बयान को आधार बनाकर शिकायतकर्ता ने राहुल गांधी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की थी।
राहुल गांधी की तरफ से क्या दलील दी गई?
बॉम्बे हाई कोर्ट में राहुल गांधी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सुदीप पसबोला और कुशल मोर ने पक्ष रखा। उनकी ओर से अदालत में तर्क दिया गया कि शिकायत का कोई ठोस कानूनी आधार नहीं है और इसे स्वीकार करके राहुल गांधी के खिलाफ आपराधिक प्रक्रिया शुरू करना उचित नहीं था।
राहुल गांधी के वकीलों ने शिकायतकर्ता की कानूनी स्थिति पर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि जिस तरह से शिकायत दायर की गई है, उसमें शिकायतकर्ता को ऐसा मामला लाने का आवश्यक कानूनी अधिकार नहीं था। इसी आधार पर उन्होंने अदालत से मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द करने की मांग की।
हालांकि, हाई कोर्ट ने बचाव पक्ष की दलीलों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने निचली अदालत के आदेश में हस्तक्षेप करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं पाया और याचिका खारिज कर दी।
2019 के आदेश को राहुल गांधी ने दी थी चुनौती
गिरगांव मजिस्ट्रेट अदालत ने 28 अगस्त 2019 को राहुल गांधी के खिलाफ शिकायत के आधार पर आपराधिक प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया था। इसके बाद कांग्रेस नेता ने इस आदेश को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी।
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने 2021 में एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश भी पारित किया था। अदालत ने मजिस्ट्रेट को शिकायत से संबंधित कार्यवाही को छह सप्ताह के लिए आगे नहीं बढ़ाने का निर्देश दिया था। इसका उद्देश्य राहुल गांधी को हाई कोर्ट के अंतिम फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करने का पर्याप्त अवसर देना था।
अब हाई कोर्ट ने राहुल गांधी की मौजूदा याचिका को खारिज करते हुए अपने पहले के निर्देश को बरकरार रखा है। ऐसे में इस मामले में आगे की कानूनी लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच सकती है।
राफेल सौदा बना था राजनीतिक टकराव का बड़ा मुद्दा
यह विवाद उस दौर से जुड़ा है, जब राफेल लड़ाकू विमान सौदा केंद्र की तत्कालीन सरकार और कांग्रेस के बीच बड़े राजनीतिक विवाद का विषय बना हुआ था। कांग्रेस की ओर से इस सौदे को लेकर सरकार पर लगातार सवाल उठाए जा रहे थे और राहुल गांधी व्यक्तिगत रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साध रहे थे।
राफेल सौदे को लेकर राहुल गांधी के बयानों ने उस समय राजनीतिक माहौल को काफी गर्म कर दिया था। इसी दौरान प्रधानमंत्री के खिलाफ उनकी कथित ‘चोरों का सरदार’ टिप्पणी भी सामने आई, जिसे लेकर बाद में मानहानि की शिकायत दाखिल की गई।
शिकायतकर्ता ने अदालत के सामने यह तर्क रखा कि राजनीतिक विरोध के नाम पर किसी व्यक्ति की सार्वजनिक प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाली टिप्पणियां करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। वहीं राहुल गांधी की ओर से यह दावा किया गया कि उनके खिलाफ दर्ज शिकायत कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है।
अब आगे क्या होगा?
बॉम्बे हाई कोर्ट के ताजा फैसले के बाद राहुल गांधी के खिलाफ चल रही कानूनी प्रक्रिया को तत्काल कोई राहत नहीं मिली है। हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द करने से इनकार कर दिया है। हालांकि, छह सप्ताह की कार्यवाही पर रोक से जुड़ा पुराना निर्देश राहुल गांधी को आगे अपील का विकल्प देता है।
अब इस मामले में राहुल गांधी के पास सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का रास्ता मौजूद है। यदि वह हाई कोर्ट के फैसले को शीर्ष अदालत में चुनौती देते हैं, तो वहां इस मामले के कानूनी पहलुओं पर दोबारा सुनवाई हो सकती है।
फिलहाल बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला राहुल गांधी के लिए राहत वाला नहीं है। अदालत ने साफ कर दिया है कि उसे मजिस्ट्रेट के आदेश में न तो कोई ऐसी कानूनी गलती दिखाई दी और न ही ऐसी अनियमितता, जिसके आधार पर आदेश को रद्द किया जा सके। इसलिए मानहानि की शिकायत के आधार पर शुरू की गई आपराधिक प्रक्रिया को खत्म करने की राहुल गांधी की कोशिश इस स्तर पर सफल नहीं हो सकी है।
इस तरह राफेल सौदे से जुड़ा कई साल पुराना यह विवाद एक बार फिर कानूनी सुर्खियों में आ गया है। एक ओर शिकायतकर्ता द्वारा राहुल गांधी के कथित बयानों को मानहानिकारक बताया गया है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस नेता की कानूनी टीम लगातार इस मामले की वैधता पर सवाल उठा रही है। हाई कोर्ट के ताजा आदेश के बाद अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि राहुल गांधी इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हैं या नहीं।