ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान ने 23 सितंबर 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा के मंच से अमेरिका और इजराइल पर तीखा हमला बोला। युद्ध के बीच दिए गए अपने भाषण में पजशकियान ने ईरान को आतंक फैलाने वाला देश बताए जाने का विरोध किया और दावा किया कि उनका देश खुद आतंकवाद और सैन्य हमलों का शिकार रहा है। उन्होंने अपने भाषण के दौरान दिवंगत सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की तस्वीर के साथ मिनाब के एक स्कूल पर हुए हमले में मारे गए बच्चों की तस्वीरें भी दिखाईं।
पजशकियान ने कहा कि ईरान ने लंबे समय से किसी दूसरे देश पर हमला नहीं किया है। उनका कहना था कि इसके बावजूद ईरान को क्षेत्रीय अस्थिरता और आतंकवाद से जोड़कर देखा जाता है। उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि ईरानी जनता आतंकवाद की शिकार रही है और उसने अपने ऊपर हुए हमलों का जवाब अपनी रक्षा के तौर पर दिया है।
ईरानी राष्ट्रपति का भाषण ऐसे समय आया, जब एक दिन पहले ट्रम्प ने UN में ईरान को लेकर बेहद कड़ा रुख अपनाया था और कहा था कि अगर समझौता नहीं हुआ तो ईरान को तबाह करने की कार्रवाई की जा सकती है। ट्रम्प ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी दबाव बनाए रखने की बात कही थी।
पजशकियान ने अपने भाषण में युद्ध, परमाणु कार्यक्रम, अमेरिकी प्रतिबंध, गाजा और UN की भूमिका जैसे कई मुद्दों को एक साथ उठाया। उनके संबोधन को ईरान की ओर से अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने अपनी स्थिति रखने की कोशिश के तौर पर देखा गया।
बच्चों की तस्वीरें दिखाकर युद्ध की भयावहता बताई
पजशकियान ने भाषण की शुरुआत में ही मिनाब के स्कूल पर हुए हमले का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि स्कूल में मौजूद बच्चे किसी सैन्य कार्रवाई का हिस्सा नहीं थे, फिर भी वे हमले की चपेट में आ गए। उनके मुताबिक इस हमले में अमेरिकी और इजराइली हथियारों का इस्तेमाल हुआ।
मिनाब स्कूल हमले में 156 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें 120 बच्चे शामिल थे। सितंबर 2026 में जारी संयुक्त राष्ट्र की एक जांच में कहा गया कि इस हमले में अमेरिकी जिम्मेदारी को लेकर गंभीर आधार मौजूद हैं। UN जांच के अनुसार स्कूल को निशाना बनाए जाने में ऐसी खुफिया जानकारी का इस्तेमाल हुआ, जिसमें वहां एक सैन्य कमांडर की मौजूदगी की गलत सूचना थी। रिपोर्ट ने हमले को युद्ध अपराध से जुड़े सवालों के संदर्भ में देखा है।
हालांकि, इस मामले में अमेरिकी पक्ष की अपनी स्थिति रही है और अमेरिका ने जानबूझकर बच्चों को निशाना बनाने से इनकार किया है। इसलिए हमले की जिम्मेदारी और परिस्थितियों को लेकर अलग-अलग पक्षों के दावे मौजूद हैं।
पजशकियान ने इसी घटना को अपने भाषण का अहम हिस्सा बनाया। उन्होंने तस्वीरें दिखाकर यह संदेश देने की कोशिश की कि युद्ध का असर केवल सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आम नागरिकों और बच्चों ने भी इसकी कीमत चुकाई है।
खामेनेई की तस्वीर लेकर पहुंचे पजशकियान
ईरानी राष्ट्रपति अपने साथ अयातुल्लाह अली खामेनेई की तस्वीर भी लेकर पहुंचे थे। उन्होंने खामेनेई की मौत का उल्लेख करते हुए इसे ईरान के खिलाफ हुई कार्रवाई का हिस्सा बताया। उनके मुताबिक ईरान ऐसे देश की तस्वीर दुनिया के सामने लेकर आया है, जहां उसके शीर्ष नेता की हत्या हुई और उसके बाद भी देश पर दबाव बनाया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि ईरान को आतंकवाद का स्रोत बताने वाले देशों को यह देखना चाहिए कि युद्ध और हमलों में ईरानी नागरिकों के साथ क्या हुआ। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा कि ईरान खुद आतंकवाद का पीड़ित रहा है।
यह बयान सीधे तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के उन आरोपों का जवाब था, जिनमें उन्होंने ईरान को क्षेत्र में अस्थिरता पैदा करने वाला देश बताया था। पजशकियान ने कहा कि ईरान ने अपनी रक्षा की है और उसे किसी बाहरी शक्ति से अपनी सुरक्षा के लिए अनुमति लेने की जरूरत नहीं है।
ट्रम्प की धमकी के बाद बातचीत का संकेत भी दिया
पजशकियान का भाषण केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान बातचीत और कूटनीति के लिए तैयार है, लेकिन दबाव और धमकी की भाषा स्वीकार नहीं करेगा।
यह बयान उस समय महत्वपूर्ण था जब ट्रम्प ने अपने UN भाषण में ईरान के खिलाफ कड़े सैन्य विकल्प की बात की थी। ट्रम्प ने ईरान से परमाणु समझौते को लेकर नई शर्तों पर सहमति बनाने का दबाव बनाया। इसके बाद अमेरिकी और ईरानी अधिकारियों के बीच UN महासभा के दौरान अप्रत्यक्ष बातचीत भी हुई।
इस तरह पजशकियान ने एक तरफ सैन्य दबाव का विरोध किया, तो दूसरी तरफ यह संदेश दिया कि बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं है। हालांकि ईरान और अमेरिका के बीच कई मूलभूत मुद्दों पर मतभेद अभी भी बने हुए हैं।
परमाणु कार्यक्रम पर ईरान का रुख
ईरानी राष्ट्रपति ने अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी अपनी स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि ईरान परमाणु हथियार हासिल करने का दावा नहीं कर रहा, लेकिन शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक के इस्तेमाल का अधिकार भी नहीं छोड़ेगा।
ईरान लंबे समय से कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम नागरिक और शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, जबकि अमेरिका और उसके सहयोगी देश ईरान की परमाणु गतिविधियों को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं जताते रहे हैं।
UN में पजशकियान की बात का मूल संदेश यह था कि परमाणु हथियार और शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक को एक ही चीज नहीं माना जाना चाहिए। ईरान अपने नागरिक परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसके अधिकार को बनाए रखने की बात कर रहा है।
यही मुद्दा अमेरिका और ईरान के बीच किसी संभावित समझौते में सबसे महत्वपूर्ण विषयों में से एक बना हुआ है।
गाजा और इजराइल का मुद्दा भी उठाया
पजशकियान ने अपने संबोधन में गाजा का भी उल्लेख किया। उन्होंने इजराइल की सैन्य कार्रवाई और वहां नागरिकों की मौत का मुद्दा उठाते हुए पश्चिमी देशों की नीतियों पर सवाल किया।
उनका तर्क था कि अगर आम नागरिकों की मौत पर चिंता जताई जाती है, तो यह सिद्धांत सभी देशों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। उन्होंने गाजा में इजराइली कार्रवाई और ईरान पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों को एक साथ रखकर पश्चिमी देशों की नीति पर सवाल उठाया।
उन्होंने इजराइल की परमाणु क्षमता का भी संदर्भ दिया और पूछा कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान मुख्य रूप से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर ही क्यों केंद्रित रहता है।
यह मुद्दा ईरान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाता रहा है। हालांकि अमेरिका और इजराइल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अलग सुरक्षा चिंताएं व्यक्त करते हैं।
अमेरिकी प्रतिबंधों को लेकर भी निशाना
ईरानी राष्ट्रपति ने आर्थिक प्रतिबंधों का मुद्दा भी UN में उठाया। उन्होंने कहा कि प्रतिबंधों का असर केवल सरकार या राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित नहीं रहता, बल्कि आम नागरिकों पर भी पड़ता है।
उनके अनुसार गरीब परिवार, मरीज, बुजुर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर लोग प्रतिबंधों से सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। ईरान ने लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों को अपनी अर्थव्यवस्था और आम लोगों की मुश्किलों का कारण बताया है।
पजशकियान ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने यह तर्क रखा कि किसी देश पर आर्थिक दबाव डालने का असर वहां के आम लोगों की जिंदगी पर पड़ सकता है। इसलिए प्रतिबंधों को लेकर भी मानवीय प्रभाव को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
UN की भूमिका पर भी सवाल
ईरानी राष्ट्रपति ने संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि अगर UN वास्तव में अंतरराष्ट्रीय शांति और नागरिकों की सुरक्षा के लिए बना है, तो उसे युद्धग्रस्त क्षेत्रों में ज्यादा प्रभावी कार्रवाई करनी चाहिए।
उन्होंने गाजा, लेबनान और सीरिया का उल्लेख करते हुए कहा कि जब आम नागरिक मारे जाते हैं तो अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्रतिक्रिया पर्याप्त नहीं दिखाई देती।
पजशकियान ने UN को शक्तिशाली देशों के प्रभाव से मुक्त और ज्यादा निष्पक्ष बनाने की जरूरत की बात कही। उनका आरोप था कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में ताकतवर देशों के प्रभाव के कारण छोटे और कमजोर देशों की आवाज उतनी प्रभावी नहीं रह जाती।
यह उनके भाषण का वह हिस्सा था जिसमें उन्होंने मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर व्यापक सवाल उठाए।
युद्ध में बड़े पैमाने पर नुकसान का दावा
ईरान में युद्ध के मानवीय और भौतिक नुकसान को लेकर भी अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं। ईरानी पक्ष से जुड़े आंकड़ों और मीडिया रिपोर्टों में हजारों लोगों के मारे जाने और घायल होने की बात कही गई है। साथ ही बड़ी संख्या में लोगों के विस्थापित होने तथा इमारतों और स्वास्थ्य सुविधाओं को नुकसान पहुंचने का दावा किया गया है।
कुछ रिपोर्टों में करीब 7,300 लोगों की मौत और 32,314 लोगों के घायल होने का आंकड़ा दिया गया है। इसी तरह करीब 1.49 लाख इमारतों के क्षतिग्रस्त होने और लगभग 32 लाख लोगों के घर छोड़ने का दावा किया गया है। इन आंकड़ों को युद्धकालीन परिस्थितियों में रिपोर्ट किए गए अनुमान के तौर पर देखा जाना चाहिए, क्योंकि अलग-अलग स्रोतों में आंकड़े अलग हो सकते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी फरवरी 2026 से ईरान और व्यापक मध्य पूर्व में बढ़े संघर्ष के कारण नागरिकों, स्वास्थ्यकर्मियों और स्वास्थ्य सुविधाओं पर असर पड़ने की जानकारी दी है। WHO के मुताबिक हिंसा के कारण लोगों को घर छोड़ना पड़ा है और स्वास्थ्य सेवाओं में व्यवधान आया है।
स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी पड़ा असर
युद्ध के दौरान स्वास्थ्य व्यवस्था पर पड़ने वाले असर को लेकर भी चिंता जताई गई है। अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों को नुकसान होने के अलावा दवाओं, चिकित्सा उपकरणों और मरीजों की आवाजाही में बाधाएं पैदा हुईं।
WHO ने कहा है कि संघर्ष के कारण घायल लोगों के साथ-साथ पहले से गंभीर या लंबे समय से इलाज करा रहे मरीजों के लिए भी स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच मुश्किल हुई। खासतौर पर डायलिसिस, इंसुलिन और अन्य जीवनरक्षक उपचार पर निर्भर मरीजों के लिए व्यवधान गंभीर समस्या बन सकता है।
इस पूरे संदर्भ में पजशकियान ने अपने UN भाषण को केवल ईरान की सैन्य स्थिति बताने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने नागरिकों की मौत, विस्थापन, आर्थिक प्रतिबंध, परमाणु कार्यक्रम और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका जैसे मुद्दों को जोड़कर ईरान का पक्ष रखा।
भाषण का मुख्य संदेश क्या रहा?
पजशकियान के संबोधन में छह प्रमुख बातें सामने आईं। पहली, ईरान को आतंकवाद से जोड़ने वाले अमेरिकी आरोपों को खारिज करना। दूसरी, युद्ध में मारे गए ईरानी नागरिकों और बच्चों को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने रखना। तीसरी, ट्रम्प की सैन्य धमकियों के बावजूद बातचीत का रास्ता खुला रखने की बात करना। चौथी, परमाणु हथियार से इनकार करते हुए शांतिपूर्ण परमाणु तकनीक के अधिकार पर जोर देना। पांचवीं, अमेरिकी प्रतिबंधों के मानवीय प्रभाव को उठाना। और छठी, गाजा तथा दूसरे संघर्षों के संदर्भ में UN की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था पर सवाल करना।
इस भाषण से यह स्पष्ट हुआ कि ईरान ने UN के मंच का इस्तेमाल अपनी सैन्य और कूटनीतिक स्थिति दोनों को सामने रखने के लिए किया। वहीं अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के साथ बातचीत की संभावना भी चर्चा में बनी हुई है। ऐसे में पजशकियान का संबोधन युद्ध के बीच ईरान की आधिकारिक राजनीतिक और कूटनीतिक स्थिति को समझने के लिए महत्वपूर्ण रहा।