कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों और उन पर होने वाले मुनाफे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कई अहम सवाल पूछे हैं। अदालत ने जानना चाहा कि जब कैंसर की दवाओं पर कारोबारियों के मुनाफे की सीमा तय की जा सकती है, तो दूसरी बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं को भी कीमतों के नियंत्रण के दायरे में क्यों नहीं लाया जाता। केंद्र सरकार की ओर से दिए गए जवाब पर संतोष जताने के बजाय अदालत ने स्पष्ट किया कि इस मामले में अभी कई सवालों का समाधान होना बाकी है। कोर्ट ने दवाओं की कीमत निर्धारित करने की मौजूदा व्यवस्था और सरकार के अधिकारों को लेकर विस्तृत जानकारी मांगी है। इसके लिए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को 27 अक्टूबर तक का समय दिया गया है।
यह मामला ऐसे समय में सामने आया है, जब कैंसर का इलाज कराने वाले परिवारों के सामने दवाओं का खर्च एक बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकता है। लंबे समय तक चलने वाले उपचार, नियमित जांच और महंगी दवाओं के कारण मरीजों पर आर्थिक दबाव बढ़ता है। ऐसे में दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण और उनकी उपलब्धता का सवाल केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे मरीजों के इलाज और उनकी आर्थिक स्थिति से जुड़ जाता है। अदालत की सुनवाई में इसी बात पर जोर रहा कि सरकार की नीतियों का वास्तविक फायदा मरीजों तक पहुंचना चाहिए।
कैंसर की दवाओं पर 30% मार्जिन की सीमा से जुड़े सवाल
केंद्र सरकार ने कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं पर मुनाफे को सीमित करने के लिए 30% की सीमा तय करने का कदम उठाया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य दवाओं की कीमतों में कमी लाना और मरीजों को आर्थिक राहत देना है। सरकार के अनुमान के मुताबिक, इस कदम से कैंसर के मरीजों को सालाना लगभग 2,500 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। हालांकि, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने केवल इस फैसले के संभावित लाभ पर ध्यान देने के बजाय दवाओं की कीमत निर्धारित करने की पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाए।
अदालत जानना चाहती है कि जब एक विशेष श्रेणी की दवाओं पर मुनाफे की सीमा लागू करना संभव है, तो बाकी दवाओं के मामले में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं अपनाई जा सकती। कोर्ट के सवालों का केंद्र यह था कि क्या मौजूदा नीतियां मरीजों को उचित कीमत पर दवाएं उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त हैं या फिर इनमें व्यापक बदलाव की जरूरत है। सरकार को यह भी स्पष्ट करना होगा कि दवाओं की कीमत तय करने के लिए किन आधारों का इस्तेमाल किया जाता है और किन परिस्थितियों में किसी दवा को मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाया जाता है।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकार के जवाब को पर्याप्त नहीं माना। उसका रुख यह संकेत देता है कि केवल कैंसर की दवाओं पर सीमित राहत देने से व्यापक समस्या का समाधान नहीं होता। अगर दूसरी बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतें भी मरीजों की पहुंच से बाहर हैं, तो उनके लिए क्या व्यवस्था होनी चाहिए, यह महत्वपूर्ण सवाल है। अब केंद्र को अगली सुनवाई में इन पहलुओं पर अपना पक्ष स्पष्ट करना होगा।
दवाओं की बिक्री में लगातार बढ़ोतरी, तीन साल में 56% का इजाफा
भारत में कैंसर की दवाओं के बाजार में बढ़ती बिक्री भी इस मुद्दे को महत्वपूर्ण बनाती है। सरकार के फार्मास्यूटिकल्स विभाग की वर्ष 2025-26 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, देश में कैंसर-रोधी दवाओं की बिक्री वित्त वर्ष 2024-25 में 5,281 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। इसके मुकाबले वित्त वर्ष 2021-22 में इन दवाओं की सालाना बिक्री 3,382 करोड़ रुपये दर्ज की गई थी। इस तरह तीन वर्षों के दौरान बिक्री में करीब 56% की वृद्धि हुई।
बिक्री के आंकड़े बाजार के विस्तार को दर्शाते हैं, लेकिन केवल इनसे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि दवाओं की कीमतें कितनी बढ़ीं या मरीजों पर खर्च का कितना अतिरिक्त बोझ पड़ा। इसके बावजूद, ये आंकड़े कैंसर की दवाओं के बाजार के आकार और इस क्षेत्र में मूल्य निर्धारण के महत्व को रेखांकित करते हैं। जब किसी गंभीर बीमारी के इलाज में दवाओं की भूमिका अहम होती है, तब उनकी कीमतों को लेकर पारदर्शिता और उचित नियमन की मांग और महत्वपूर्ण हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट की चिंता भी इसी व्यापक संदर्भ से जुड़ी है। अदालत यह समझना चाहती है कि दवा बनाने से लेकर मरीज तक पहुंचने के बीच कीमत किस तरह तय होती है, अलग-अलग स्तरों पर कितना मार्जिन जोड़ा जाता है और सरकार किस सीमा तक हस्तक्षेप कर सकती है। इन सवालों के जवाब से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि मौजूदा मूल्य नियंत्रण प्रणाली मरीजों के हितों की रक्षा किस तरह करती है।
लागत से कई गुना अधिक कीमत पर बिक्री का मुद्दा
सुनवाई के दौरान अदालत ने दवाओं की वास्तविक लागत और बाजार में उनकी बिक्री कीमत के बीच अंतर को लेकर भी सवाल उठाए। बेंच ने पूछा कि जब दवा की अधिकतम खुदरा कीमत यानी एमआरपी में परिवहन, अनुसंधान और दूसरे खर्चों को शामिल किया जाता है, तो कुछ दवाएं अपनी वास्तविक लागत से सैकड़ों गुना अधिक कीमत पर कैसे बेची जा सकती हैं। अदालत ने यह जानना चाहा कि कीमत तय करने की प्रक्रिया में ऐसे बड़े अंतर को रोकने के लिए क्या पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद हैं।
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने सरकार का पक्ष रखा। भाटी ने दलील दी कि भारत में दवाएं दुनिया के कई दूसरे देशों की तुलना में सस्ती हैं। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में उपचार कराने के लिए विदेशों से मरीज आते हैं। सरकार का तर्क था कि देश में दवाओं की उपलब्धता और कीमतों की व्यवस्था को देखते समय इस पहलू को भी ध्यान में रखना चाहिए।
वहीं, मेहता ने अधिक ट्रेड मार्जिन के पक्ष में तर्क देते हुए कहा कि इससे दवाओं को दूर-दराज के इलाकों तक पहुंचाने में मदद मिलती है। दवा वितरण व्यवस्था में थोक विक्रेताओं और खुदरा कारोबारियों की भूमिका होती है। उनके मुताबिक, मार्जिन का सवाल दवाओं की पहुंच और वितरण से भी जुड़ा हुआ है।
हालांकि, अदालत ने इस मुद्दे को केवल व्यापार और वितरण तक सीमित रखने के बजाय मरीजों के हितों के नजरिये से देखने पर जोर दिया। सवाल यह है कि वितरण व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ दवाओं की कीमतों को किस तरह उचित स्तर पर रखा जाए, ताकि मरीजों को जरूरी इलाज हासिल करने में परेशानी न हो। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि दवा की लागत, वितरण खर्च और कारोबारियों के मार्जिन के बीच संतुलन किस तरह बनाया जा सकता है।
सरकार की जिम्मेदारी केवल कीमत तय करने तक सीमित नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में कहा कि ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर यानी डीपीसीओ के अंतर्गत जिन दवाओं की कीमतें नियंत्रित की जाती हैं, उन्हें मरीजों तक उपलब्ध कराना भी सरकार की जिम्मेदारी है। अदालत के सवालों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह था कि मूल्य नियंत्रण का लाभ तभी सार्थक होगा, जब मरीज निर्धारित कीमत पर दवा खरीद सकें और जरूरत के समय उन्हें उसकी उपलब्धता में बाधा न आए।
दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण और उनकी आपूर्ति, दोनों अलग-अलग लेकिन आपस में जुड़े विषय हैं। अगर किसी दवा की कीमत निर्धारित कर दी जाती है, लेकिन वह बाजार में उपलब्ध नहीं है, तो मरीज को अपेक्षित राहत नहीं मिल पाएगी। इसी तरह, दवा आसानी से उपलब्ध होने के बावजूद अगर उसकी कीमत आम लोगों की पहुंच से बाहर है, तो उपचार कराना मुश्किल हो सकता है।
अदालत ने इसीलिए मूल प्रश्न पर ध्यान केंद्रित किया कि किन दवाओं को मूल्य नियंत्रण के दायरे में रखा जाना चाहिए। कैंसर की दवाओं पर मुनाफे की सीमा तय करने के फैसले से यह बहस और व्यापक हो गई है कि क्या दूसरी जरूरी दवाओं के लिए भी ऐसी व्यवस्था की जरूरत है। केंद्र सरकार को अपने जवाब में यह बताना होगा कि मौजूदा व्यवस्था के तहत दवाओं का चयन किन मानकों पर किया जाता है और मूल्य नियंत्रण का दायरा बढ़ाने की संभावनाओं पर किस तरह विचार किया जाता है।
डीपीसीओ के तहत कैसे निर्धारित होती हैं दवाओं की अधिकतम कीमतें?
केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि ड्रग प्राइस कंट्रोल ऑर्डर, 2013 के तहत शेड्यूल-I में शामिल दवाओं की अधिकतम कीमत तय करने के लिए बाजार के आंकड़ों का इस्तेमाल किया जाता है। इस व्यवस्था का उद्देश्य निर्धारित दवाओं की कीमतों पर सीमा लगाना है, ताकि कंपनियां तय मानकों से अधिक कीमत पर उन्हें नहीं बेच सकें।
सरकार के मुताबिक, मूल्य निर्धारण के लिए संबंधित दवाओं के ब्रांडेड और जेनेरिक संस्करणों की कीमतों का औसत निकाला जाता है। इस गणना में उन्हीं दवाओं को शामिल किया जाता है, जिनकी बाजार हिस्सेदारी कम से कम 1% होती है। इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार 16% मार्जिन जोड़ा जाता है और अधिकतम कीमत तय की जाती है।
इस व्यवस्था के तहत कंपनियों और विक्रेताओं को कीमत के संबंध में तय नियमों का पालन करना होता है। सरकार ने बताया कि निर्धारित सीलिंग प्राइस से अधिक कीमत पर दवा बेचने की अनुमति नहीं है। हालांकि, अधिकतम कीमत की सीमा के भीतर थोक और खुदरा विक्रेताओं को मार्जिन मिल सकता है।
केंद्र के अनुसार, अब तक 935 फॉर्म्युलेशन की अधिकतम कीमत निर्धारित की जा चुकी है। यह आंकड़ा बताता है कि मूल्य नियंत्रण की व्यवस्था पहले से कई दवाओं पर लागू है। फिर भी, सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का प्रमुख सवाल यह है कि मौजूदा व्यवस्था कितनी व्यापक है और क्या इसके दायरे में दूसरी दवाओं को भी शामिल करने की जरूरत है।
जिन दवाओं की कीमत तय नहीं है, उन पर क्या नियम लागू होते हैं?
सरकार ने नॉन-शेड्यूल्ड दवाओं की कीमतों के बारे में भी अदालत को जानकारी दी। इन दवाओं की शुरुआती कीमत निर्धारित करने में निर्माताओं को स्वतंत्रता होती है। यानी इनकी कीमत तय करने के लिए शेड्यूल-I में शामिल दवाओं जैसी सीलिंग प्राइस व्यवस्था लागू नहीं होती। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि कंपनियां कीमतों में किसी भी तरह की बढ़ोतरी कर सकती हैं।
केंद्र के अनुसार, बाजार में प्रतिस्पर्धा कंपनियों को कीमतें मनमाने ढंग से बढ़ाने से रोकने का काम करती है। इसके अलावा, नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी यानी एनपीपीए इन दवाओं की एमआरपी पर नजर रखता है। सरकार ने बताया कि कोई निर्माता 12 महीने की अवधि में किसी नॉन-शेड्यूल्ड दवा की कीमत 10% से अधिक नहीं बढ़ा सकता।
इस तरह मौजूदा व्यवस्था में एक तरफ कुछ दवाओं की अधिकतम कीमत सीधे निर्धारित की जाती है, जबकि दूसरी तरफ कुछ दवाओं के लिए कीमत बढ़ाने पर सीमा लागू होती है। अदालत यह जानना चाहती है कि क्या ये दोनों व्यवस्थाएं मरीजों के हितों की पर्याप्त रक्षा करती हैं। खास तौर पर यह सवाल महत्वपूर्ण है कि किसी दवा को सीधे मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाने का निर्णय किन आधारों पर लिया जाता है।
27 अक्टूबर की सुनवाई पर टिकी नजरें
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दवाओं की कीमतें तय करने की प्रक्रिया पर अतिरिक्त जानकारी देने के लिए 27 अक्टूबर तक का समय दिया है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता अगली सुनवाई में सरकार की ओर से इस विषय पर जवाब देंगे। अदालत के सामने अब यह स्पष्ट करना होगा कि कैंसर की दवाओं पर लागू मुनाफे की सीमा और दूसरी दवाओं की कीमतों के नियमन के बीच क्या अंतर है तथा व्यापक मूल्य नियंत्रण को लेकर सरकार का दृष्टिकोण क्या है।
फिलहाल, कैंसर की दवाओं पर मुनाफे की सीमा से मरीजों को सालाना करीब 2,500 करोड़ रुपये की संभावित बचत होने का सरकारी अनुमान इस फैसले को महत्वपूर्ण बनाता है। हालांकि, इस राहत का वास्तविक प्रभाव दवाओं की कीमतों और मरीजों की खरीद पर निर्भर करेगा। अगली सुनवाई में अदालत का ध्यान केवल एक श्रेणी की दवाओं तक सीमित रहने के बजाय दवाओं की कीमत तय करने की पूरी व्यवस्था पर रह सकता है।
इस मामले का व्यापक महत्व इसलिए भी है, क्योंकि दवाओं की कीमतों से जुड़े फैसले गंभीर बीमारियों के उपचार और आम लोगों के स्वास्थ्य खर्च को प्रभावित करते हैं। अब केंद्र के जवाब से यह समझने में मदद मिलेगी कि वर्तमान नियमों के तहत कीमतों को नियंत्रित करने की क्या सीमाएं हैं और मरीजों को राहत देने के लिए किन पहलुओं पर आगे विचार किया जा सकता है।