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रूस से तेल खरीद घटाएगा भारत? महंगे फ्रेट और मिडिल ईस्ट के बेहतर सौदों ने बदली BPCL की रणनीति

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में जारी उथल-पुथल के बीच भारत की प्रमुख तेल कंपनियां अपनी खरीद रणनीति में बदलाव कर रही हैं। सऊदी अरब पर हमलों के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर रूस से कच्चा तेल मंगाने की लागत बढ़ने से भारतीय कंपनियों के सामने नए विकल्पों पर विचार करने की स्थिति पैदा हो गई है। इसी कड़ी में भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (BPCL) नवंबर में रूस से कच्चे तेल की खरीद कम करने की तैयारी में है। कंपनी अब मिडिल ईस्ट से मिलने वाले उन विकल्पों पर अधिक ध्यान दे रही है, जो कुल लागत के लिहाज से ज्यादा फायदेमंद साबित हो सकते हैं।

इस बदलाव के पीछे केवल कच्चे तेल की कीमत नहीं, बल्कि उसे भारत तक पहुंचाने में लगने वाला खर्च भी अहम भूमिका निभा रहा है। रूस से तेल खरीदने पर अधिक माल-भाड़ा देना पड़ रहा है, जबकि मिडिल ईस्ट के कुछ आपूर्तिकर्ताओं की ओर से मिलने वाले प्रस्ताव तुलनात्मक रूप से आकर्षक हैं। ऐसे में BPCL के लिए तेल खरीद का फैसला अब अलग-अलग क्षेत्रों से मिलने वाली कीमतों और परिवहन लागत का आकलन करके करना जरूरी हो गया है।

नवंबर में रूसी तेल की खरीद में आ सकती है कमी

BPCL के एक अधिकारी ने सोमवार को जानकारी दी कि कंपनी नवंबर में रूस से कच्चे तेल की खरीद कम रहने की उम्मीद कर रही है। कंपनी के वित्त प्रमुख वी. रामकृष्ण गुप्ता ने भी तिमाही नतीजों के बाद विश्लेषकों के साथ बातचीत में इस बदलाव के संकेत दिए। उनके मुताबिक, रूस से तेल लाने की बढ़ती माल-ढुलाई लागत ने नवंबर के लिए खरीद की मात्रा को प्रभावित किया है।

कंपनी के सामने अब ऐसा विकल्प मौजूद है, जिसमें मिडिल ईस्ट से कच्चा तेल खरीदना कुल खर्च के लिहाज से अधिक किफायती हो सकता है। यही वजह है कि BPCL अपनी जरूरतों के मुताबिक अलग-अलग क्षेत्रों से होने वाली आपूर्ति का संतुलन बदल रही है।

हालांकि, रूस से खरीद कम होने का अर्थ यह नहीं है कि कंपनी ने रूसी तेल से पूरी तरह दूरी बनाने का फैसला कर लिया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, बदलाव मुख्य रूप से नवंबर की खरीद से जुड़ा है। कंपनी के लिए किसी भी स्रोत से तेल खरीदने का अंतिम निर्णय कीमत, परिवहन खर्च और उपलब्ध सौदों की आर्थिक उपयोगिता पर निर्भर करता है।

आखिर रूस के मुकाबले मिडिल ईस्ट क्यों पड़ रहा भारी?

कच्चे तेल की खरीद में केवल उत्पाद की कीमत देखना पर्याप्त नहीं होता। तेल को उत्पादन केंद्र से रिफाइनरी तक पहुंचाने का खर्च भी कुल लागत का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। यदि किसी देश से मिलने वाला तेल आकर्षक कीमत पर उपलब्ध है, लेकिन उसे लाने के लिए अधिक माल-भाड़ा चुकाना पड़ रहा है, तो उसका वास्तविक आर्थिक लाभ कम हो सकता है।

BPCL के मामले में भी यही स्थिति सामने आ रही है। कंपनी के वित्त प्रमुख ने संकेत दिया कि रूस से तेल लाने की ऊंची फ्रेट लागत के चलते नवंबर के लिए खरीद की मात्रा में कमी आई है। दूसरी तरफ मिडिल ईस्ट से मिलने वाले प्रस्ताव अधिक प्रतिस्पर्धी दिखाई दे रहे हैं।

तेल कंपनियों को खरीद का फैसला करते समय कई पहलुओं पर विचार करना पड़ता है। इनमें कच्चे तेल की मूल कीमत, जहाजों का किराया, परिवहन में लगने वाला समय, उपलब्धता और रिफाइनरी की जरूरतों के अनुरूप तेल की गुणवत्ता शामिल हैं। इन सभी खर्चों को जोड़ने के बाद ही पता चलता है कि किस क्षेत्र से तेल खरीदना ज्यादा लाभकारी होगा।

ऐसे में यदि मिडिल ईस्ट से मिलने वाला तेल कम कुल लागत पर उपलब्ध होता है, तो भारतीय कंपनियों के लिए वहां से आपूर्ति बढ़ाना व्यावसायिक रूप से उचित कदम हो सकता है। BPCL की मौजूदा रणनीति इसी तरह के लागत आकलन को दर्शाती है।

जुलाई-सितंबर तिमाही में 37 फीसदी था रूसी तेल का हिस्सा

BPCL के लिए रूसी कच्चा तेल पिछले कुछ समय से खरीद के महत्वपूर्ण स्रोतों में शामिल रहा है। कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई से सितंबर तक चली तिमाही में उसके कुल कच्चे तेल की खरीद में रूस की हिस्सेदारी लगभग 37 फीसदी थी।

यह आंकड़ा बताता है कि कंपनी की तेल आपूर्ति में रूस की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। हालांकि, किसी एक तिमाही में दर्ज हिस्सेदारी को आने वाले महीनों की खरीद का स्थायी संकेत नहीं माना जा सकता। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों, परिवहन खर्च और आपूर्तिकर्ताओं के प्रस्तावों में बदलाव होने पर कंपनियां अपने खरीद मिश्रण में भी बदलाव करती हैं।

नवंबर में रूसी तेल की खरीद घटने की संभावना के बीच यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कंपनी अन्य क्षेत्रों से कितनी आपूर्ति प्राप्त करती है। फिलहाल BPCL की ओर से मिले संकेत बताते हैं कि मिडिल ईस्ट की भूमिका बढ़ सकती है।

कंपनी ने यह भी जानकारी दी है कि पहली तिमाही की तुलना में मिडिल ईस्ट से होने वाली तेल आपूर्ति में बढ़ोतरी हुई है। उसे उम्मीद है कि अक्टूबर और नवंबर के दौरान इस क्षेत्र से और अधिक कच्चा तेल मिल सकता है। इससे कंपनी को अपनी जरूरतों के हिसाब से अलग-अलग स्रोतों के बीच संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है।

सऊदी अरब पर हमलों से बढ़ी वैश्विक बाजार की चिंता

भारत की तेल खरीद रणनीति में बदलाव ऐसे समय हो रहा है, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। सऊदी अरब पर लगातार हो रहे हमलों के कारण वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। दुनिया के प्रमुख तेल उत्पादक क्षेत्रों में अस्थिरता का असर बाजार की धारणा पर पड़ सकता है और कीमतों में तेजी या गिरावट का दबाव पैदा कर सकता है।

हाल ही में ब्रेंट क्रूड का भाव करीब 115 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर बना हुआ था। इससे पहले पिछले सप्ताह के आखिरी कारोबारी दिनों में इसकी कीमत लगभग छह महीने के उच्चतम स्तर तक पहुंच गई थी। इसके बाद सोमवार को कच्चे तेल के दाम में एक फीसदी से अधिक की गिरावट दर्ज की गई, लेकिन इसके बावजूद भाव ऊंचे स्तर पर रहे।

तेल बाजार में इस तरह के उतार-चढ़ाव का असर उन देशों पर विशेष रूप से पड़ता है, जो अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करते हैं। भारत के लिए कच्चे तेल की खरीद की लागत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका प्रभाव पेट्रोलियम क्षेत्र की कंपनियों के खर्च और व्यापक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में गिरावट आने का अर्थ यह नहीं है कि आपूर्ति से जुड़ी चिंताएं समाप्त हो गई हैं। यदि प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में तनाव बना रहता है, तो बाजार में अनिश्चितता भी जारी रह सकती है।

ब्रेंट क्रूड के भाव पर निवेशकों की नजर

कच्चे तेल की कीमतों में आने वाले दिनों में किस दिशा में बदलाव होगा, यह कई कारकों पर निर्भर करेगा। पश्चिम एशिया में सुरक्षा की स्थिति और वैश्विक आपूर्ति से जुड़ी खबरों के अलावा निवेशक अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आगामी नीतिगत फैसले पर भी नजर रख रहे हैं।

अमेरिका के केंद्रीय बैंक की नीतिगत दिशा का असर आर्थिक गतिविधियों, डॉलर और वैश्विक बाजारों की धारणा पर पड़ सकता है। इन परिस्थितियों का प्रभाव कच्चे तेल जैसे प्रमुख कमोडिटी बाजारों पर भी देखने को मिल सकता है। इसलिए आने वाला सप्ताह तेल कारोबार के लिहाज से उतार-चढ़ाव वाला रहने की आशंका है।

यदि बाजार में आपूर्ति बाधित होने की आशंका बढ़ती है, तो कीमतों पर दबाव ऊपर की ओर जा सकता है। इसके विपरीत, मांग या आर्थिक गतिविधियों को लेकर कमजोर संकेत मिलने पर कीमतों में नरमी आ सकती है। हालांकि, इन संभावनाओं के आधार पर किसी निश्चित मूल्य स्तर का अनुमान लगाना मुश्किल है।

ऐसे माहौल में तेल खरीदने वाली कंपनियों को केवल बाजार भाव पर निर्भर रहने के बजाय आपूर्ति के विभिन्न विकल्पों और उनसे जुड़ी लागत का लगातार आकलन करना पड़ता है।

भारत की तेल कंपनियों के लिए क्या हैं इसके मायने?

BPCL की रणनीति यह संकेत देती है कि भारतीय तेल कंपनियां खरीद के फैसले में कीमत के साथ-साथ परिवहन खर्च को भी प्राथमिकता दे रही हैं। यदि रूस से तेल लाने की लागत बढ़ती है और मिडिल ईस्ट से अपेक्षाकृत बेहतर सौदे मिलते हैं, तो कंपनियां अपनी खरीद का कुछ हिस्सा उस क्षेत्र की ओर स्थानांतरित कर सकती हैं।

इस तरह के बदलाव का उद्देश्य आपूर्ति के स्रोतों को परिस्थितियों के अनुसार समायोजित करना और कुल खरीद लागत को नियंत्रित रखना होता है। हालांकि, किसी क्षेत्र से अधिक तेल खरीदने का फैसला उसकी उपलब्धता, बाजार में प्रतिस्पर्धा और परिवहन व्यवस्था पर भी निर्भर करेगा।

भारत के लिए तेल आपूर्ति के कई स्रोत बनाए रखना महत्वपूर्ण है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में किसी एक क्षेत्र में तनाव आने पर दूसरे विकल्प उपयोगी हो सकते हैं। लेकिन वैकल्पिक स्रोत चुनने से पहले कीमत और लॉजिस्टिक्स का पूरा हिसाब लगाना भी उतना ही जरूरी है।

फिलहाल BPCL के संकेतों से स्पष्ट है कि नवंबर में रूस से होने वाली कच्चे तेल की खरीद कम रह सकती है, जबकि मिडिल ईस्ट से आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद है। इसकी प्रमुख वजह रूसी तेल की ऊंची माल-ढुलाई लागत और मिडिल ईस्ट के अपेक्षाकृत आकर्षक प्रस्ताव हैं।

कंपनी की आगे की खरीद रणनीति इस बात पर निर्भर करेगी कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कैसी रहती हैं, परिवहन खर्च में कितना बदलाव आता है और अलग-अलग आपूर्तिकर्ताओं से किस तरह के सौदे उपलब्ध होते हैं। इस बीच, सऊदी अरब पर हमलों से जुड़ी चिंताओं और ब्रेंट क्रूड के ऊंचे भाव के कारण वैश्विक तेल बाजार पर नजर बनाए रखना जरूरी रहेगा।