Skip to main content

The Scoopp

 

अमेरिकी चुनाव से पहले खाड़ी में फिर भड़की जंग की चिंगारी! ईरान के केश्म द्वीप पर धमाके

अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव एक बार फिर सैन्य टकराव की वजह से चर्चा में आ गया है। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव से ठीक पहले ईरान के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण केश्म द्वीप पर कई जोरदार धमाकों की खबर सामने आई है। सोमवार को द्वीप पर कम से कम पांच विस्फोट सुने गए। इसके अलावा ईरान के तटीय शहर बंदर लेंगेह में भी धमाकों की सूचना मिली। इन घटनाओं के बाद पूरे क्षेत्र में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है।

अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया कि केश्म द्वीप पर हमला अमेरिकी सेना ने किया था। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने इन कार्रवाइयों को सीमित और रक्षात्मक बताया है। उनका कहना है कि इसका उद्देश्य ईरानी सैन्य गतिविधियों से अमेरिकी ठिकानों और समुद्री जहाजों को संभावित खतरे से बचाना था। हालांकि, अमेरिकी सेंट्रल कमांड की ओर से तत्काल कोई विस्तृत आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई।

दूसरी तरफ ईरान के सरकारी मीडिया ने धमाकों की पुष्टि तो की, लेकिन इनके पीछे अमेरिका या इजराइल की भूमिका को लेकर आधिकारिक पुष्टि नहीं की। इसी बीच ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने दावा किया कि उसकी सेना ने होर्मुज स्ट्रेट के दक्षिणी हिस्से में दो अमेरिकी MQM-170 ड्रोन को इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम की मदद से गिराया है। इस दावे की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है।

केश्म द्वीप पर ही क्यों केंद्रित है अमेरिका की नजर?

ईरान का केश्म द्वीप फारस की खाड़ी और होर्मुज स्ट्रेट के पास स्थित है। करीब 1,445 वर्ग किलोमीटर में फैला यह देश का सबसे बड़ा द्वीप है। पहले इसे पर्यटन, व्यापार और फ्री ट्रेड जोन के रूप में पहचान मिली थी, लेकिन मौजूदा संघर्ष में इसकी सैन्य उपयोगिता काफी बढ़ गई है।

इस द्वीप की भौगोलिक स्थिति इसे ईरान की समुद्री सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है। यहां से होर्मुज स्ट्रेट के आसपास होने वाली जहाजों की आवाजाही पर नजर रखी जा सकती है। यही वजह है कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने पर केश्म द्वीप बार-बार सुर्खियों में आ जाता है।

1. जमीन के नीचे सैन्य ठिकानों का नेटवर्क: रिपोर्टों के अनुसार, केश्म द्वीप पर सुरंगों और प्राकृतिक नमक की गुफाओं का इस्तेमाल सैन्य गतिविधियों के लिए किया जाता है। माना जाता है कि ईरान ने यहां मिसाइल प्रणालियों और तेज गति से चलने वाली सैन्य नौकाओं को सुरक्षित रखने के लिए भूमिगत सुविधाएं विकसित की हैं। ऐसे ठिकानों को निशाना बनाना किसी भी सैन्य अभियान के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

2. होर्मुज स्ट्रेट पर नजर रखने की क्षमता: केश्म द्वीप की सबसे बड़ी रणनीतिक अहमियत इसकी लोकेशन है। यह दुनिया के सबसे व्यस्त ऊर्जा समुद्री मार्गों में शामिल होर्मुज स्ट्रेट के प्रवेश क्षेत्र के करीब है। यहां मौजूद सैन्य ठिकानों और निगरानी प्रणालियों के जरिए ईरान समुद्र में जहाजों की गतिविधियों पर नजर रख सकता है। किसी बड़े संघर्ष की स्थिति में इस क्षेत्र से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है।

3. तेल और गैस के कारोबार पर प्रभाव: होर्मुज स्ट्रेट से दुनिया के कई देशों तक कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की बड़ी मात्रा पहुंचती है। इस रास्ते पर किसी भी तरह की रुकावट का असर अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ सकता है। अमेरिका का आरोप रहा है कि ईरान इस समुद्री मार्ग को दबाव बनाने के साधन के तौर पर इस्तेमाल करता है। ऐसे में केश्म द्वीप का सैन्य महत्व और बढ़ जाता है।

ट्रम्प ने हमले से किया इनकार, बातचीत की जताई उम्मीद

केश्म द्वीप पर धमाकों की खबरों के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बयान भी चर्चा में हैं। सोमवार को पत्रकारों से बातचीत के दौरान उनसे पूछा गया कि क्या अमेरिका मिडटर्म चुनाव के बाद ईरान पर दोबारा बड़ा हमला करने की योजना बना रहा है। इस पर ट्रम्प ने सीधे जवाब देते हुए कहा कि ऐसा नहीं है।

ट्रम्प ने यह भी संकेत दिया कि तेहरान के साथ समझौते की संभावनाएं बनी हुई हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर दावा किया कि ईरान के साथ बड़े युद्ध का खतरा कम होने की उम्मीद के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है। उनके मुताबिक, तेल की कीमतों में करीब 10 डॉलर प्रति बैरल की कमी दर्ज की गई।

दिए गए आंकड़ों के अनुसार, 31 अक्टूबर को कच्चे तेल का भाव 118 डॉलर प्रति बैरल था, जो 1 नवंबर को घटकर करीब 108 डॉलर प्रति बैरल रह गया। हालांकि, तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के पीछे केवल युद्ध की स्थिति ही नहीं, बल्कि वैश्विक मांग, आपूर्ति और बाजार की दूसरी परिस्थितियां भी जिम्मेदार होती हैं।

ट्रम्प के बयानों और केश्म द्वीप पर सामने आई सैन्य कार्रवाई के बीच विरोधाभास को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। रॉयटर्स के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने हमले को सीमित कार्रवाई बताया है और इसे बड़े सैन्य अभियान की वापसी नहीं माना है।

फरवरी से अब तक कैसे बढ़ता गया अमेरिका-ईरान संघर्ष?

ईरान और अमेरिका के बीच मौजूदा सैन्य टकराव की शुरुआत 28 फरवरी 2026 को हुई थी। शुरुआत में यह संघर्ष परमाणु कार्यक्रम और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाने तक सीमित दिखाई दिया, लेकिन जल्द ही इसका दायरा इजराइल और खाड़ी देशों तक फैल गया। इसके बाद समुद्री व्यापार, तेल की आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति भी इस युद्ध से प्रभावित होने लगी।

युद्ध के प्रमुख घटनाक्रम इस प्रकार रहे:

28 फरवरी 2026: अमेरिका और इजराइल ने शुरू किया सैन्य अभियान

अमेरिका ने ‘ऑपरेशन एपिक फ्यूरी’ और इजराइल ने ‘ऑपरेशन रोरिंग लायन’ के नाम से ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू की। दोनों देशों की सेनाओं ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े ठिकानों, मिसाइल केंद्रों, सैन्य अड्डों और कमांड सेंटरों को निशाना बनाया।

इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों की मौत हुई। इसके बाद ईरान में नेतृत्व और सत्ता व्यवस्था को लेकर बड़ा संकट पैदा हो गया। अमेरिका और इजराइल ने अपनी कार्रवाई का उद्देश्य ईरान की परमाणु और सैन्य क्षमताओं को कमजोर करना बताया।

मार्च 2026: ईरान ने मिसाइलों और ड्रोन से किया जवाबी हमला

अमेरिका और इजराइल के हमलों के बाद ईरान ने भी सैन्य जवाबी कार्रवाई तेज कर दी। उसने बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोन के जरिए इजराइल के अलावा पश्चिम एशिया में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया।

बहरीन में अमेरिकी नौसेना के पांचवें बेड़े के मुख्यालय सहित कई सैन्य प्रतिष्ठानों पर हमलों की खबरें आईं। सऊदी अरब, कतर, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत जैसे देशों में भी हमलों का असर देखने को मिला। इस तरह संघर्ष दो देशों के बीच सीमित न रहकर पूरे खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा के लिए चुनौती बन गया।

मार्च-अप्रैल 2026: होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही पर संकट

युद्ध के दौरान ईरान ने होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही को रोकने और सीमित करने की कार्रवाई की। इस समुद्री मार्ग पर संकट गहराने से अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस बाजार में अनिश्चितता बढ़ गई।

इसके जवाब में अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों और उनसे जुड़े समुद्री आवागमन पर नौसैनिक नाकाबंदी लागू की। कई व्यापारिक जहाजों को अपने पुराने रास्ते बदलने पड़े। इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि दुनिया के कई देशों में ईंधन की उपलब्धता और कीमतों को लेकर चिंता बढ़ गई। भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों के लिए भी यह स्थिति महत्वपूर्ण बन गई।

8 अप्रैल 2026: पाकिस्तान की मध्यस्थता से युद्धविराम

लगातार सैन्य कार्रवाई और आर्थिक नुकसान के बीच दोनों देशों को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश शुरू हुई। पाकिस्तान ने अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाई। इसी प्रक्रिया के तहत 8 अप्रैल को दोनों पक्षों के बीच दो सप्ताह के युद्धविराम पर सहमति बनी।

इसके बाद 11 और 12 अप्रैल को इस्लामाबाद में दोनों देशों के प्रतिनिधियों के बीच बातचीत हुई। हालांकि, ईरान के परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर सहमति नहीं बन सकी। बातचीत के बावजूद दोनों देशों के बीच अविश्वास बना रहा।

जून 2026: समझौते के लिए 60 दिनों का मिला रास्ता

जून में पाकिस्तान की मध्यस्थता से अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौता ज्ञापन (MoU) तैयार हुआ। इसका उद्देश्य अगले 60 दिनों के भीतर स्थायी समाधान की दिशा में बातचीत आगे बढ़ाना था। इस समझौते से उम्मीद जगी थी कि दोनों देश सैन्य टकराव समाप्त कर सकते हैं।

हालांकि, परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज स्ट्रेट में समुद्री सुरक्षा को लेकर मतभेद बने रहे। समझौते को लागू करने की प्रक्रिया भी बाधित हुई। अगस्त तक यह व्यवस्था प्रभावी नहीं रह सकी और क्षेत्र में फिर से सैन्य गतिविधियां बढ़ने लगीं।

अगस्त-अक्टूबर 2026: फिर बढ़ा तनाव, हमले और नाकाबंदी जारी

युद्धविराम और समझौते की कोशिशें सफल नहीं होने के बाद अमेरिका और ईरान के बीच सीमित सैन्य कार्रवाई का दौर जारी रहा। दोनों पक्षों के बीच समुद्री सुरक्षा, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर टकराव बना रहा।

अमेरिका ने ईरान पर दबाव बनाए रखने के लिए सैन्य और आर्थिक कदम जारी रखे। दूसरी तरफ ईरान ने भी होर्मुज स्ट्रेट और खाड़ी क्षेत्र में अपनी गतिविधियों के जरिए जवाब दिया। इस दौरान अलग-अलग देशों ने दोनों पक्षों के बीच बातचीत बहाल कराने की कोशिश की।

अमेरिका पर 47 अरब डॉलर से ज्यादा का आर्थिक बोझ

ईरान के साथ लंबे समय से जारी संघर्ष का असर अमेरिकी अर्थव्यवस्था और रक्षा बजट पर भी दिखाई देने लगा है। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अनुमान के मुताबिक, 16 अक्टूबर 2026 तक इस युद्ध में अमेरिका का सैन्य खर्च करीब 47.1 अरब डॉलर पहुंच चुका था। इसमें इस्तेमाल किए गए हथियारों और सैन्य उपकरणों को बदलने का खर्च भी शामिल है।

एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इस रकम में लगभग 29 अरब डॉलर गोला-बारूद और मिसाइलों पर खर्च हुए हैं। सैन्य अभियानों पर करीब 11.9 अरब डॉलर और उपकरणों के नुकसान पर लगभग 6 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है।

युद्ध में ईरान, लेबनान और खाड़ी क्षेत्र में हजारों लोगों की जान जाने और बड़ी संख्या में लोगों के घायल होने की खबरें सामने आई हैं। कई इलाकों में लोगों को अपने घर छोड़ने पड़े हैं। इसके अलावा तेल कारोबार, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचा है।

दोहा में बातचीत बेनतीजा, आगे क्या होगा?

अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के लिए कतर समेत कई देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं। होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा सामान्य रूप से खोलना और अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाना बातचीत के प्रमुख मुद्दों में शामिल हैं।

2 नवंबर को दोहा में हुई बातचीत भी किसी ठोस समझौते तक नहीं पहुंच सकी। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच मध्यस्थों के जरिए संपर्क जारी रहने की जानकारी सामने आई है। ईरान के विदेश मंत्रालय ने भी बातचीत के लिए संदेशों के आदान-प्रदान की पुष्टि की है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या अमेरिकी चुनाव के बाद दोनों देश किसी स्थायी समझौते की दिशा में आगे बढ़ेंगे या सैन्य टकराव का नया दौर शुरू होगा। केश्म द्वीप पर हुई ताजा कार्रवाई ने इस आशंका को फिर बढ़ा दिया है।

फिलहाल अमेरिका की ओर से इसे सीमित और रक्षात्मक कार्रवाई बताया जा रहा है, जबकि ईरान ने अमेरिकी ड्रोन गिराने का दावा किया है। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों देशों के आधिकारिक बयान और होर्मुज स्ट्रेट की स्थिति पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी। तेल की कीमतों से लेकर वैश्विक व्यापार तक, इस संघर्ष का असर कई देशों की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।