अमेरिका के मिडटर्म चुनाव में भारतीय मूल के उम्मीदवारों ने अपनी राजनीतिक ताकत का शानदार प्रदर्शन किया है। अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के चुनाव में भारतीय मूल के पांच नेताओं ने जीत हासिल कर अपनी जगह पक्की कर ली है। खास बात यह है कि जीतने वाले सभी पांचों उम्मीदवार डेमोक्रेटिक पार्टी से जुड़े हैं। वहीं, भारतीय मूल के एक अन्य उम्मीदवार अमीश शाह भी अपने प्रतिद्वंद्वी से आगे चल रहे हैं। इस चुनावी नतीजे को अमेरिकी राजनीति में भारतीय समुदाय की बढ़ती भागीदारी और प्रभाव के तौर पर देखा जा रहा है।
इस बार चुनाव में भारतीय मूल के नेताओं ने अलग-अलग राज्यों में अपनी मजबूत पकड़ दिखाई। कैलिफोर्निया से लेकर वॉशिंगटन और वर्जीनिया तक भारतीय-अमेरिकी उम्मीदवारों को मतदाताओं का समर्थन मिला। कुछ नेताओं ने लगातार कई बार जीत दर्ज करके अपना राजनीतिक आधार मजबूत किया, जबकि कुछ ने पहली बार चुनाव जीतकर अमेरिकी संसद में प्रवेश किया है।
दूसरी ओर, रिपब्लिकन पार्टी के भारतीय मूल के नेता विवेक रामास्वामी को ओहायो के गवर्नर चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। उनके समर्थन में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी प्रचार किया था, लेकिन इसका फायदा उन्हें चुनावी नतीजों में नहीं मिल सका। डेमोक्रेटिक उम्मीदवार एमी एक्टन ने उन्हें बड़े अंतर से पराजित कर दिया।
पांच भारतीय-अमेरिकी नेताओं ने हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बनाई जगह
अमेरिका के प्रतिनिधि सभा चुनाव में इस बार रो खन्ना, एमी बेरा, प्रमिला जयपाल, सुहास सुब्रमण्यम और पिया दांडिया ने जीत हासिल की है। इन सभी नेताओं ने डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था। 2024 के चुनाव में भारतीय मूल के छह उम्मीदवार इस सदन के लिए निर्वाचित हुए थे। इस बार भी भारतीय समुदाय के नेताओं ने कई सीटों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।
1. एमी बेरा ने आठवीं बार हासिल की जीत
कैलिफोर्निया के तीसरे संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ने वाले एमी बेरा ने एक बार फिर मतदाताओं का भरोसा जीत लिया है। उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार रॉब टकर को 23 हजार से अधिक मतों के अंतर से शिकस्त दी। इस जीत के साथ बेरा लगातार आठवीं बार अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के सदस्य चुने गए हैं।
एमी बेरा का राजनीतिक सफर काफी पुराना है। राजनीति में आने से पहले वह डॉक्टर के रूप में काम करते थे। साल 2013 में उन्होंने पहली बार हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में प्रवेश किया था। इसके बाद से वह लगातार अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे हैं। आठवीं बार जीत हासिल करना उनके राजनीतिक अनुभव और क्षेत्र में मजबूत जनाधार को दर्शाता है।
2. रो खन्ना ने छठी बार चुनाव जीतकर बनाया रिकॉर्ड
कैलिफोर्निया के 17वें संसदीय क्षेत्र में भी डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार रो खन्ना ने शानदार प्रदर्शन किया। उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार रितेश टंडन को 42 हजार से ज्यादा वोटों से हराकर लगातार छठी बार जीत दर्ज की।
रितेश टंडन और रो खन्ना के बीच यह पहला चुनावी मुकाबला नहीं था। इससे पहले भी टंडन 2020 और 2022 के चुनावों में खन्ना के खिलाफ अपनी किस्मत आजमा चुके हैं, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली थी। इस बार भी मतदाताओं ने रो खन्ना के पक्ष में फैसला सुनाया। लगातार छठी जीत के साथ उन्होंने अमेरिकी राजनीति में अपनी मजबूत स्थिति बरकरार रखी है।
3. प्रमिला जयपाल ने भारी अंतर से विरोधी को हराया
भारतीय मूल की प्रमुख अमेरिकी नेताओं में शामिल प्रमिला जयपाल ने वॉशिंगटन के सातवें संसदीय क्षेत्र से लगातार छठी बार जीत हासिल की है। उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार नीरव शेठ को एक लाख 52 हजार से अधिक वोटों के बड़े अंतर से पराजित किया।
प्रमिला जयपाल वर्ष 2017 से इस संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। उनकी एक खास पहचान यह भी है कि वह अमेरिकी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में पहुंचने वाली भारतीय मूल की पहली महिला हैं। उनका जन्म भारत के चेन्नई में हुआ था। बाद में वह अमेरिका चली गईं और वहां राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई।
इस बार की जीत के साथ उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि अमेरिकी राजनीति में भारतीय मूल की महिलाओं की भागीदारी लगातार मजबूत हो रही है।
4. सुहास सुब्रमण्यम दूसरी बार बने सांसद
वर्जीनिया के 10वें संसदीय क्षेत्र से डेमोक्रेटिक उम्मीदवार सुहास सुब्रमण्यम ने भी अपनी सीट पर जीत दर्ज की है। उन्होंने रिपब्लिकन उम्मीदवार डेव बेकविथ को पीछे छोड़ते हुए दूसरी बार प्रतिनिधि सभा में जगह बनाई। सुहास को कुल वोटों में 61.5 प्रतिशत से अधिक समर्थन मिला, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी को 36.4 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए।
सुहास का जन्म टेक्सास के ह्यूस्टन शहर में भारतीय माता-पिता के घर हुआ था। पेशे से वह वकील हैं और अमेरिकी प्रशासन में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा चुके हैं। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में उन्होंने व्हाइट हाउस में टेक्नोलॉजी पॉलिसी एडवाइजर के रूप में काम किया था।
चुनाव में जीत के बाद उन्होंने लोगों को राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने का संदेश दिया। सुहास ने कहा कि लोगों को अपनी आवाज उठानी चाहिए। उन्होंने अपने उदाहरण का जिक्र करते हुए कहा कि जब वह चुनाव लड़कर जीत सकते हैं तो दूसरे लोग भी ऐसा कर सकते हैं।
5. पिया दांडिया ने पहली बार संसद में मारी एंट्री
इस चुनाव में भारतीय मूल की पिया दांडिया ने भी खास उपलब्धि हासिल की है। फ्लोरिडा के 22वें संसदीय क्षेत्र से उन्होंने पहली बार हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स का चुनाव जीता है। उनका मुकाबला रिपब्लिकन उम्मीदवार केसी अस्कर से था।
मतगणना में पिया को 51.9 प्रतिशत वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी के खाते में 48.1 प्रतिशत मत आए। इस तरह मामूली अंतर से मिली जीत ने उन्हें अमेरिकी संसद तक पहुंचा दिया।
39 वर्षीय पिया का जन्म फ्लोरिडा के पाम बीच काउंटी में हुआ और उनका पालन-पोषण भी इसी इलाके में हुआ। उनके माता-पिता भारत से अमेरिका जाकर बसे थे। राजनीति में आने से पहले पिया शिक्षिका के रूप में काम कर चुकी हैं। पहली बार चुनाव जीतकर उन्होंने उन पांच भारतीय मूल के नेताओं की सूची में जगह बनाई है, जो इस बार प्रतिनिधि सभा के लिए चुने गए हैं।
ट्रम्प और जेडी वेंस का समर्थन भी विवेक रामास्वामी को नहीं दिला सका जीत
भारतीय मूल के रिपब्लिकन नेता विवेक रामास्वामी के लिए ओहायो का गवर्नर चुनाव निराशाजनक साबित हुआ। उन्होंने इस पद के लिए अपनी दावेदारी पेश की थी, लेकिन डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार एमी एक्टन ने उन्हें दो लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से हरा दिया।
रामास्वामी के चुनाव प्रचार में रिपब्लिकन पार्टी के बड़े नेताओं ने भी पूरी ताकत लगाई थी। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने उनके समर्थन में प्रचार किया और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस भी उनके लिए मतदाताओं से वोट मांगने पहुंचे थे। इसके बावजूद रामास्वामी चुनावी मुकाबला जीतने में सफल नहीं हो सके।
विवेक रामास्वामी इससे पहले भी अमेरिकी राजनीति में चर्चा में रहे हैं। वर्ष 2024 में उन्होंने रिपब्लिकन पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद का चुनाव लड़ने के लिए अपनी उम्मीदवारी पेश की थी। हालांकि, बाद में उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया और डोनाल्ड ट्रम्प का समर्थन किया था। इस बार गवर्नर बनने की उनकी कोशिश सफल नहीं हो पाई।
राज्य स्तर पर भी भारतीय मूल के नेताओं का शानदार प्रदर्शन
सिर्फ अमेरिकी संसद तक ही भारतीय मूल के उम्मीदवारों की सफलता सीमित नहीं रही। अलग-अलग राज्यों में हुए चुनावों में भी कई भारतीय-अमेरिकी नेताओं ने जीत दर्ज की है। मैरीलैंड से लेकर टेक्सास और जॉर्जिया तक भारतीय समुदाय के उम्मीदवारों को मतदाताओं का समर्थन मिला।
मैरीलैंड में अरुणा मिलर ने दोबारा लेफ्टिनेंट गवर्नर का चुनाव जीत लिया है। उन्होंने डेमोक्रेटिक गवर्नर वेस मूर के साथ मिलकर रिपब्लिकन उम्मीदवार डैन कॉक्स को हराया। अरुणा का जन्म भारत के हैदराबाद में हुआ था। उनकी जीत से राज्य की राजनीति में भारतीय मूल के प्रतिनिधित्व को और मजबूती मिली है।
राज्य विधानसभाओं के चुनाव में भी कई भारतीय मूल के नेताओं ने सफलता हासिल की। टेक्सास से पूजा सेठी, पेंसिल्वेनिया से अरविंद वेंकट और जॉर्जिया से ज्योत सिंह ने जीत दर्ज की। इसके अलावा इलिनॉय में राम विल्लीवलम और नबीला सैयद राज्य सीनेट के लिए फिर से निर्वाचित हुए हैं।
जॉर्जिया के चुनाव में ज्योत सिंह की जीत को विशेष उपलब्धि माना जा रहा है। वह राज्य की जनरल असेंबली में पहुंचने वाले पहले भारतीय मूल के अमेरिकी और पहले सिख अमेरिकी बने हैं। उनकी सफलता से अमेरिकी राजनीति में सिख समुदाय की मौजूदगी भी मजबूत हुई है।
लॉस एंजिलिस मेयर चुनाव में नित्या रमन भी आगे
भारतीय मूल की एक अन्य नेता नित्या रमन भी चुनावी चर्चा में बनी हुई हैं। लॉस एंजिलिस के मेयर पद के लिए हो रहे चुनाव में शुरुआती रुझानों के मुताबिक वह मौजूदा मेयर करेन बैस से आगे चल रही हैं।
नित्या रमन पेशे से शहरी योजनाकार हैं और शहर की सिटी काउंसिल की सदस्य भी हैं। स्थानीय राजनीति में उनकी सक्रियता और अनुभव के कारण उन्हें इस चुनाव में महत्वपूर्ण उम्मीदवार माना जा रहा है। हालांकि, मेयर चुनाव का अंतिम नतीजा सामने आने के बाद ही उनकी स्थिति स्पष्ट होगी।
कई भारतीय मूल के उम्मीदवारों को मिली हार
जहां एक तरफ भारतीय-अमेरिकी नेताओं ने कई चुनावों में जीत का परचम लहराया, वहीं कुछ उम्मीदवारों को निराशा भी हाथ लगी। न्यूयॉर्क में रिपब्लिकन उम्मीदवार सरिता कोमतिरड्डी अटॉर्नी जनरल का चुनाव हार गईं। इसी तरह नॉर्थ कैरोलाइना में महेश गनोरकर को भी हार का सामना करना पड़ा।
ओहायो में निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने वाले संदीप दीक्षित और मिशिगन में निर्दलीय प्रत्याशी अनिल कुमार भी जीत हासिल नहीं कर सके।
अमेरिकी राजनीति में भारतीय समुदाय की बढ़ती भूमिका
मिडटर्म चुनाव के नतीजे बताते हैं कि भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक अब राजनीति में केवल मतदाता या समर्थक की भूमिका तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे चुनाव लड़कर महत्वपूर्ण पदों तक पहुंच रहे हैं। प्रतिनिधि सभा, राज्य विधानसभाओं, सीनेट और गवर्नर पदों के चुनाव में उनकी सक्रियता लगातार दिखाई दे रही है।
इस बार पांच भारतीय मूल के नेताओं का अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में पहुंचना, अरुणा मिलर की दोबारा जीत और ज्योत सिंह की ऐतिहासिक उपलब्धि इस बदलाव के अहम उदाहरण हैं। वहीं, विवेक रामास्वामी की हार यह भी दिखाती है कि बड़े नेताओं का समर्थन मिलने के बावजूद चुनाव में अंतिम फैसला मतदाता ही करते हैं।
कुल मिलाकर, अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में भारतीय मूल के नेताओं का प्रदर्शन काफी चर्चा में रहा है। कई पुराने नेताओं ने अपनी सीट बरकरार रखी, तो नए चेहरों ने भी संसद में पहुंचकर अपनी राजनीतिक पारी की शुरुआत की है। आने वाले समय में अमेरिकी राजनीति में भारतीय मूल के प्रतिनिधियों की भूमिका और प्रभाव किस तरह बढ़ता है, इस पर सबकी नजर रहेगी।