देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर सियासी घमासान लगातार तेज हो रहा है। विपक्षी दल चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए सड़कों से लेकर अदालत तक अपनी आवाज उठा रहे हैं। इसी बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस और राहुल गांधी पर जोरदार हमला बोला है। शाह ने आरोप लगाया कि कांग्रेस SIR की आड़ लेकर घुसपैठियों को बचाने की कोशिश कर रही है, जबकि जनता विपक्ष की राजनीति और उसके इरादों को समझ चुकी है। उन्होंने यह भी दावा किया कि कांग्रेस की चुनावी असफलताओं का सिलसिला SIR शुरू होने से काफी पहले से जारी है और आने वाले लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को जीत मिलने की संभावना नहीं है।
अमित शाह ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि कांग्रेस को अपनी चुनावी हार के लिए चुनाव आयोग या मतदाता सूची के पुनरीक्षण को जिम्मेदार ठहराने के बजाय अपनी राजनीतिक स्थिति पर विचार करना चाहिए। उनके मुताबिक, राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार चुनावी चुनौतियों का सामना कर रही है। शाह ने 2029 के लोकसभा चुनाव का जिक्र करते हुए कहा कि कांग्रेस को एक बार फिर हार का सामना करना पड़ सकता है, जबकि भाजपा के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी NDA भारी बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करेगा। उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा और NDA के प्रति जनता का समर्थन कायम है।
गृह मंत्री की यह टिप्पणी ऐसे समय में सामने आई है, जब SIR को लेकर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के खिलाफ अपना विरोध तेज कर रखा है। कांग्रेस समेत INDIA ब्लॉक के कई नेता मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों, वोट काटे जाने की आशंकाओं और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठा रहे हैं। विपक्ष की मांग है कि इन शिकायतों की निष्पक्ष जांच की जाए और मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो। दूसरी ओर, भाजपा का रुख है कि मतदाता सूची को दुरुस्त करना चुनावी व्यवस्था के लिए जरूरी है और इस प्रक्रिया को राजनीतिक विवाद का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए।
गुजरात से त्रिपुरा तक के चुनावों का हवाला देकर कांग्रेस को घेरा
अमित शाह ने कांग्रेस पर निशाना साधने के लिए अलग-अलग राज्यों के चुनावी नतीजों का उल्लेख किया। उन्होंने गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन को सामने रखते हुए विपक्ष से सवाल किया कि अगर कांग्रेस की हार के पीछे SIR ही जिम्मेदार है, तो दूसरे चुनावों में उसके कमजोर नतीजों की वजह क्या है। शाह ने दावा किया कि गुजरात में भाजपा ने 104 सीटों में से 90 सीटों पर जीत हासिल की। उनके मुताबिक, इन परिणामों से स्पष्ट होता है कि मतदाता भाजपा के पक्ष में अपना समर्थन व्यक्त कर रहे हैं।
शाह ने गुजरात में आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि पार्टी ने सभी 32 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन उसके किसी भी उम्मीदवार की जमानत नहीं बच सकी। कांग्रेस को लेकर उन्होंने दावा किया कि राज्य में पार्टी लंबे समय से चुनावी जीत हासिल करने में नाकाम रही है और उसकी आखिरी बड़ी जीत 1985 में हुई थी। शाह ने इन उदाहरणों के जरिए राहुल गांधी से सवाल किया कि क्या गुजरात के नतीजों को भी मतदाता सूची के पुनरीक्षण से जोड़कर देखा जाएगा।
गृह मंत्री ने त्रिपुरा के ग्राम समिति चुनावों का उल्लेख करते हुए भी कांग्रेस की स्थिति पर सवाल उठाए। उनके मुताबिक, इन चुनावों में NDA को लगभग 77.5 प्रतिशत वोट मिले, जबकि कांग्रेस करीब 4,600 सीटों में से केवल 14 सीटें ही जीत सकी। शाह ने कहा कि इन परिणामों को केवल चुनावी प्रक्रिया पर आरोप लगाकर नहीं समझाया जा सकता। उनके तर्क के अनुसार, किसी राजनीतिक दल की सफलता या असफलता का आकलन उसके जनसमर्थन और चुनावी प्रदर्शन के आधार पर होना चाहिए।
उन्होंने बैलेट पेपर से हुए चुनावों का उदाहरण देते हुए विपक्ष की आलोचना की। शाह का कहना था कि जिन चुनावों में मतपत्रों के जरिए मतदान हुआ, वहां भी भाजपा और NDA को सफलता मिली। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों को चुनावी नतीजों के लिए जिम्मेदार ठहराने का तर्क हर स्थिति में लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि, ये सभी दावे गृह मंत्री की ओर से विपक्ष के आरोपों के जवाब में दिए गए राजनीतिक तर्क हैं।
शाह ने त्रिपुरा में कांग्रेस की पुरानी चुनावी स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि वहां लंबे समय से पार्टी का मुख्यमंत्री नहीं बना है। उन्होंने पश्चिम बंगाल और गुजरात में भी कांग्रेस की कमजोर स्थिति का उल्लेख किया। गृह मंत्री ने राहुल गांधी से सवाल किया कि क्या इन राज्यों में पार्टी की असफलताओं को भी SIR से जोड़ना उचित होगा। इस तरह शाह ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर चल रहे विवाद को कांग्रेस की व्यापक चुनावी रणनीति और उसके जनाधार से जोड़ने की कोशिश की।
बंगाल और तमिलनाडु के उपचुनावों पर भी उठाए सवाल
अमित शाह ने पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में हुए उपचुनावों का हवाला देते हुए कहा कि कांग्रेस को इन चुनावों में भी सफलता नहीं मिली। उन्होंने पश्चिम बंगाल के नाओगांव और नंदीग्राम में भाजपा उम्मीदवारों की जीत का जिक्र किया। शाह के मुताबिक, नाओगांव में भाजपा उम्मीदवार ने लगभग 1.42 लाख वोटों के अंतर से जीत दर्ज की, जबकि नंदीग्राम में पार्टी के उम्मीदवार की जीत का अंतर करीब 1.22 लाख वोट रहा।
राजस्थान के स्थानीय निकाय चुनावों के परिणामों को भी शाह ने कांग्रेस के खिलाफ अपने तर्क में शामिल किया। उन्होंने दावा किया कि भाजपा ने राज्य में लगभग 90 प्रतिशत नगर निगमों, 66 प्रतिशत नगर परिषदों और 65 प्रतिशत नगरपालिकाओं में जीत दर्ज की। गृह मंत्री ने इन आंकड़ों के आधार पर कहा कि कांग्रेस की चुनावी चुनौतियां किसी एक प्रक्रिया या राज्य तक सीमित नहीं हैं। उनके मुताबिक, पार्टी को अपने राजनीतिक प्रदर्शन पर ध्यान देने की जरूरत है।
शाह के बयान का प्रमुख संदेश यही रहा कि भाजपा आगामी चुनावों को लेकर आश्वस्त है और कांग्रेस की ओर से उठाए जा रहे सवालों को वह राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मानती है। दूसरी ओर, विपक्ष SIR को मतदाता अधिकारों और चुनावी निष्पक्षता से जुड़ा मुद्दा बता रहा है। ऐसे में इस विवाद के राजनीतिक बहस के साथ-साथ संस्थागत और कानूनी स्तर पर भी जारी रहने की संभावना है।
SIR विवाद की शुरुआत से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विपक्ष का विरोध
SIR को लेकर चल रहे विवाद ने सितंबर के अंतिम सप्ताह से अक्टूबर के मध्य तक कई मोड़ लिए। विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग के फैसलों और मतदाता सूची तैयार करने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए। इसके बाद विरोध प्रदर्शन, मार्च और इस्तीफे की मांग जैसे कदम सामने आए। इस पूरे घटनाक्रम के बीच भाजपा और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप भी तेज होते गए।
23 सितंबर को द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने दस महीने के दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के फैसलों पर 14 बार आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट सामने आने के बाद चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया को लेकर बहस शुरू हो गई। हालांकि, आयोग ने इन दावों के जवाब में कहा कि फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। इस घटनाक्रम ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर राजनीतिक चर्चा को और बढ़ा दिया।
6 अक्टूबर को राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और विपक्षी सांसदों ने वोट चोरी तथा चुनावी अनियमितताओं के आरोपों को लेकर चुनाव आयोग के कार्यालय की ओर मार्च किया। पुलिस ने मार्च को आगे बढ़ने से रोक दिया। इस दौरान राहुल गांधी, प्रियंका गांधी सहित कई विपक्षी नेताओं को हिरासत में लिया गया, जिन्हें बाद में रिहा कर दिया गया। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने इस कार्रवाई को अपने विरोध की आवाज दबाने की कोशिश बताया, जबकि प्रशासन ने कानून-व्यवस्था के तहत कदम उठाए।
8 अक्टूबर को INDIA ब्लॉक के सांसदों ने राजघाट पर मौन प्रदर्शन किया। इस प्रदर्शन के जरिए विपक्ष ने चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता की मांग उठाई और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग दोहराई। चुनाव आयोग के खिलाफ अन्य शहरों में भी विरोध प्रदर्शन होने की बात सामने आई। विपक्षी दलों का कहना था कि मतदाता सूची से जुड़े सवालों का जवाब दिया जाना चाहिए और शिकायतों की जांच होनी चाहिए।
10 अक्टूबर को CJP की ओर से जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन का आह्वान किया गया। हालांकि, पुलिस ने प्रदर्शन को रोक दिया। इस दौरान करीब 7,000 प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने का दावा किया गया, जिसके बाद कार्रवाई को लेकर विवाद और गहरा गया। प्रदर्शनकारियों की संख्या और पुलिस की कार्रवाई को लेकर सामने आए दावों ने SIR से जुड़ी बहस को एक नया मोड़ दिया।
12 अक्टूबर को राहुल गांधी के नेतृत्व में INDIA ब्लॉक के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकाला। विपक्ष ने SIR प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच कराने और प्रक्रिया पर रोक लगाने की मांग उठाई। इस मामले में विपक्षी नेताओं की ओर से याचिका दायर किए जाने की भी जानकारी सामने आई। इस कदम के बाद विवाद राजनीतिक विरोध से आगे बढ़कर न्यायिक प्रक्रिया के स्तर पर भी पहुंच गया।
2029 के चुनाव को लेकर भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ेगी सियासी जंग
अमित शाह के ताजा बयान ने SIR विवाद को आगामी लोकसभा चुनाव की राजनीति से जोड़ दिया है। भाजपा जहां विपक्ष के आरोपों को कांग्रेस की चुनावी रणनीति का हिस्सा बता रही है, वहीं कांग्रेस और उसके सहयोगी दल मतदाता सूची की निष्पक्षता तथा चुनाव आयोग की जवाबदेही पर सवाल उठा रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच इस मुद्दे पर टकराव आने वाले दिनों में और तेज हो सकता है।
शाह ने 2029 में NDA की जीत और कांग्रेस की संभावित हार का दावा किया है, लेकिन अंतिम फैसला मतदाता ही करेंगे। फिलहाल SIR को लेकर राजनीतिक बयानबाजी, विरोध प्रदर्शन और कानूनी चुनौती तीनों समानांतर चल रहे हैं। अब इस पूरे विवाद की दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि चुनाव आयोग विपक्ष की शिकायतों पर क्या जवाब देता है, न्यायिक प्रक्रिया में क्या सामने आता है और राजनीतिक दल मतदाताओं के सामने अपने तर्क किस तरह रखते हैं।