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इजराइल चुनाव में नेतन्याहू को बड़ा झटका, फिर भी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर लौटने की उम्मीद; जानिए कैसे पलट सकता है सत्ता का खेल

इजराइल की राजनीति में एक बार फिर सत्ता को लेकर दिलचस्प मुकाबला देखने को मिल रहा है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड को 2026 के आम चुनाव में बड़ा झटका लगा है। पार्टी महज 27 सीटें जीत सकी, जो पिछले आठ चुनावों में उसका सबसे कमजोर प्रदर्शन माना जा रहा है। इसके बावजूद नेतन्याहू के लिए प्रधानमंत्री पद का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। चुनाव में किसी भी राजनीतिक खेमे को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण अब सरकार गठन का फैसला छोटे दलों और दूसरे राजनीतिक सहयोगियों के रुख पर निर्भर करेगा।

इजराइल की संसद को नेसेट कहा जाता है, जिसमें कुल 120 सदस्य होते हैं। किसी भी पार्टी या गठबंधन को सरकार बनाने के लिए कम से कम 61 सांसदों का समर्थन हासिल करना जरूरी है। चुनावी नतीजों के मुताबिक, नेतन्याहू के नेतृत्व वाले गठबंधन को 53 सीटें मिली हैं। यानी बहुमत के आंकड़े तक पहुंचने के लिए उसे आठ और सांसदों की जरूरत है। दूसरी तरफ विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिली हैं। उसे भी सरकार बनाने के लिए अतिरिक्त सहयोगियों की आवश्यकता होगी।

ऐसे में चुनावी मुकाबला अब सीटें जीतने से आगे बढ़कर गठबंधन तैयार करने की राजनीति में पहुंच गया है। नेतन्याहू की पार्टी का प्रदर्शन भले ही कमजोर रहा हो, लेकिन विपक्ष के अंदर मौजूद मतभेद उनके लिए राजनीतिक अवसर पैदा कर सकते हैं।

आठ चुनावों में लिकुड का सबसे खराब प्रदर्शन

बेंजामिन नेतन्याहू इजराइल की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते हैं। लंबे समय से देश की सत्ता में उनकी मौजूदगी रही है और उनकी पार्टी लिकुड ने कई चुनावों में मजबूत प्रदर्शन किया है। हालांकि, 2026 के चुनाव के नतीजे उनके राजनीतिक दबदबे में गिरावट की तरफ इशारा कर रहे हैं।

लिकुड को इस बार केवल 27 सीटों पर जीत मिली है। इससे पहले 2009 के चुनाव में भी पार्टी को इतनी ही सीटें हासिल हुई थीं। पिछले आठ चुनावों के दौरान पार्टी का यह सबसे कमजोर प्रदर्शन है। वर्ष 2022 के चुनाव की तुलना में भी लिकुड को पांच सीटों का नुकसान उठाना पड़ा है।

हालांकि, किसी पार्टी की कम सीटें जीतने का मतलब यह नहीं होता कि उसका नेता सरकार बनाने की दौड़ से बाहर हो गया है। इजराइल की चुनावी व्यवस्था में अलग-अलग दलों के बीच गठबंधन की अहम भूमिका होती है। यहां सरकार बनाने के लिए सबसे बड़ी पार्टी होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि 61 सांसदों का समर्थन जुटाना जरूरी होता है।

यही वजह है कि नेतन्याहू के पास अभी भी प्रधानमंत्री बने रहने के विकल्प मौजूद हैं।

सरकार बनाने के लिए नेतन्याहू अपना सकते हैं तीन रणनीतियां

चुनावी नतीजों के बाद नेतन्याहू के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने मौजूदा गठबंधन को मजबूत करने की है। इसके लिए उनके पास कई राजनीतिक विकल्प हो सकते हैं।

पहला विकल्प: विपक्षी खेमे में सेंध लगाना

नेतन्याहू की पहली कोशिश विपक्षी दलों के कुछ सांसदों और सहयोगियों को अपने पक्ष में करने की हो सकती है। विपक्षी खेमे में कुल 48 सीटें हैं। यदि वहां मौजूद कुछ दल या सांसद अपना रुख बदलते हैं, तो नेतन्याहू के लिए बहुमत का आंकड़ा हासिल करना आसान हो सकता है।

हालांकि, यह रणनीति अपनाना उनके लिए आसान नहीं होगा। विपक्षी नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान नेतन्याहू को प्रधानमंत्री पद से हटाने को अपना प्रमुख लक्ष्य बताया था। ऐसे में चुनाव के तुरंत बाद उनके साथ सरकार बनाने का फैसला राजनीतिक रूप से नुकसानदायक साबित हो सकता है। इसके अलावा मतदाताओं के बीच भी ऐसे कदम को लेकर नाराजगी पैदा होने की आशंका रहेगी।

दूसरा विकल्प: राष्ट्रीय एकता सरकार का गठन

नेतन्याहू के पास दूसरी संभावना राष्ट्रीय एकता सरकार बनाने की है। इसके तहत वह विपक्ष के प्रमुख नेताओं, खासकर गादी आइजनकोट और उनके सहयोगियों के साथ बातचीत कर सकते हैं।

इस तरह की सरकार में अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाली पार्टियां एक साथ काम करती हैं। इसका उद्देश्य किसी एक दल की ताकत के बजाय साझा राजनीतिक सहमति के आधार पर सरकार चलाना होता है।

ऐसी व्यवस्था नेतन्याहू को प्रधानमंत्री पद पर बने रहने का मौका दे सकती है। लेकिन इसमें सबसे बड़ी रुकावट आइजनकोट का रुख है। वह पहले ही नेतन्याहू के नेतृत्व पर सवाल उठा चुके हैं। इसलिए उनके लिए उसी नेता के साथ सत्ता साझा करना मुश्किल फैसला हो सकता है, जिसे चुनाव में हटाने की बात कही गई थी।

तीसरा विकल्प: अल्पमत सरकार बनाना

अगर नेतन्याहू को 61 सांसदों का सीधा समर्थन नहीं मिलता, तो वह अल्पमत सरकार बनाने का रास्ता भी तलाश सकते हैं। ऐसी सरकार में सत्तारूढ़ गठबंधन के पास सदन में पूर्ण बहुमत नहीं होता, लेकिन दूसरे दल कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार का समर्थन कर सकते हैं या उसके खिलाफ मतदान करने से बच सकते हैं।

हालांकि, अल्पमत सरकार का संचालन काफी मुश्किल होता है। बजट पारित कराने, विश्वास मत जीतने और महत्वपूर्ण विधेयकों को मंजूरी दिलाने के लिए लगातार दूसरे दलों की मदद लेनी पड़ती है। इसलिए इस तरह की सरकार बनाना एक विकल्प जरूर है, लेकिन उसे लंबे समय तक स्थिर बनाए रखना बड़ी चुनौती होगी।

विपक्ष के सामने भी आसान नहीं है सत्ता तक पहुंचना

चुनाव में नेतन्याहू को नुकसान हुआ है, लेकिन विपक्ष भी अपनी जीत को सत्ता में बदलने की स्थिति में अभी नहीं पहुंचा है। गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी खेमे को 48 सीटें मिली हैं। बहुमत के लिए उसे 13 अतिरिक्त सांसदों का समर्थन चाहिए।

विपक्ष के सामने सबसे बड़ी समस्या अलग-अलग विचारधाराओं वाले सहयोगियों को एक मंच पर लाने की है। चुनाव से पहले नेतन्याहू को हटाने के मुद्दे पर कई दल एक साथ दिखाई दिए थे, लेकिन सरकार बनाने के समय उनकी प्राथमिकताएं अलग हो सकती हैं।

आइजनकोट ने ऐसी सरकार की वकालत की है जो यहूदी पहचान को प्राथमिकता दे और देश के सभी नागरिकों के लिए सैन्य सेवा को अनिवार्य बनाने का समर्थन करे। इस राजनीतिक सोच के कारण अरब दलों और अति-रूढ़िवादी यहूदी पार्टियों के साथ समझौता करना कठिन हो सकता है।

यानी विपक्ष के पास भी सीटों की संख्या बढ़ाने का रास्ता तो है, लेकिन उसके लिए अपने सहयोगियों के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर सहमति बनाना जरूरी होगा।

अरब पार्टियों की भूमिका से तय हो सकता है सरकार का भविष्य

इस पूरे चुनावी गणित में इजराइल की अरब पार्टियां काफी महत्वपूर्ण हो गई हैं। चुनाव में अरब राजनीतिक दलों को कुल 19 सीटें मिलने का अनुमान है। इनमें जॉइंट लिस्ट और यूनाइटेड अरब लिस्ट यानी राअम प्रमुख हैं।

इन पार्टियों का समर्थन विपक्ष को बहुमत के करीब पहुंचा सकता है। यदि विपक्षी दलों को अरब पार्टियों का पूरा सहयोग मिलता है, तो उनके लिए 61 सीटों का आंकड़ा पार करना संभव हो सकता है। लेकिन इस रास्ते में राजनीतिक और वैचारिक मतभेद सबसे बड़ी बाधा हैं।

विपक्ष के कुछ सहयोगी अरब दलों के साथ औपचारिक गठबंधन बनाने के पक्ष में नहीं रहे हैं। दूसरी तरफ अरब पार्टियों ने नेतन्याहू को सत्ता से बाहर करने के लिए अन्य राजनीतिक दलों के साथ काम करने की इच्छा दिखाई है।

इसलिए आने वाले दिनों में इन पार्टियों की भूमिका बेहद अहम होगी। यदि विपक्ष अपने सभी सहयोगियों को एकजुट करने में सफल रहता है, तो नेतन्याहू के लिए सरकार बनाना मुश्किल हो सकता है। लेकिन अगर विपक्ष के भीतर सहमति नहीं बनती, तो इसका सीधा फायदा मौजूदा प्रधानमंत्री को मिल सकता है।

नई सरकार बनने तक पद पर बने रह सकते हैं नेतन्याहू

चुनाव में स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के बावजूद नेतन्याहू को तुरंत प्रधानमंत्री पद छोड़ने की जरूरत नहीं होगी। इजराइल की व्यवस्था के अनुसार, नई सरकार के गठन तक मौजूदा प्रधानमंत्री कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में जिम्मेदारियां निभा सकते हैं।

चुनाव के बाद राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाएगी। वह अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों से बातचीत करेंगे और यह समझने की कोशिश करेंगे कि किस नेता के पास बहुमत जुटाने की सबसे ज्यादा संभावना है।

इसके बाद राष्ट्रपति किसी एक नेता को सरकार बनाने का अवसर देंगे। उस नेता को शुरुआत में 28 दिनों का समय मिलेगा। यदि तय अवधि में सरकार बनाने की प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तो राष्ट्रपति 14 दिन का अतिरिक्त समय भी दे सकते हैं। इस तरह अधिकतम 42 दिनों तक सरकार बनाने की कोशिश की जा सकती है।

इस दौरान राजनीतिक दलों के बीच मंत्रिमंडल में हिस्सेदारी, महत्वपूर्ण मंत्रालयों और सरकार की नीतियों को लेकर बातचीत होती है। यदि कोई भी नेता बहुमत जुटाने में कामयाब नहीं होता, तो देश में दोबारा चुनाव कराने की स्थिति भी बन सकती है।

सुरक्षा और युद्ध के मुद्दों ने नेतन्याहू की मुश्किलें बढ़ाईं

नेतन्याहू के लिए 2026 का चुनाव सिर्फ सत्ता में बने रहने की लड़ाई नहीं था, बल्कि उनके नेतृत्व और राजनीतिक भविष्य की परीक्षा भी था। उन्होंने लंबे समय तक अपनी राजनीति को राष्ट्रीय सुरक्षा, मजबूत नेतृत्व और इजराइल की रक्षा के मुद्दों के इर्द-गिर्द आगे बढ़ाया है।

लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद उनकी सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठे। इस हमले ने इजराइल की सुरक्षा प्रणाली की कमजोरियों को उजागर किया। इसके बाद गाजा में लंबे समय तक सैन्य कार्रवाई जारी रही। वहीं, ईरान के साथ बढ़ते टकराव ने भी देश की सुरक्षा और विदेश नीति को चर्चा के केंद्र में ला दिया।

विपक्ष ने इन परिस्थितियों को आधार बनाकर नेतन्याहू के नेतृत्व पर सवाल उठाए। इसके अलावा सेना में अनिवार्य भर्ती को लेकर विवाद और न्यायपालिका की शक्तियों में बदलाव की सरकारी कोशिशें भी चुनावी चर्चा के प्रमुख विषय बने रहे।

इन मुद्दों का मतदाताओं पर कितना असर पड़ा, इसका आकलन करना आसान नहीं है। हालांकि, लिकुड की सीटों में आई गिरावट बताती है कि पार्टी को इस बार पहले जैसा जनसमर्थन नहीं मिला।

क्या फिर इजराइल की सत्ता संभालेंगे नेतन्याहू?

फिलहाल इजराइल में सत्ता की तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है। लिकुड को कम सीटें मिलने के बावजूद नेतन्याहू का गठबंधन विपक्ष से आगे है। दूसरी तरफ विपक्ष के पास भी सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या नहीं है।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि छोटे दल किसका समर्थन करेंगे और क्या विपक्ष अपने वैचारिक मतभेदों को दूर कर पाएगा। अरब पार्टियों की भूमिका भी इस फैसले में निर्णायक साबित हो सकती है।

अगर विपक्षी दल एकजुट होकर 61 सांसदों का समर्थन हासिल कर लेते हैं, तो नेतन्याहू की सत्ता से विदाई हो सकती है। इसके उलट, यदि विपक्ष के सहयोगियों के बीच सहमति नहीं बनती और नेतन्याहू अतिरिक्त समर्थन जुटा लेते हैं, तो कमजोर चुनावी प्रदर्शन के बावजूद उनकी प्रधानमंत्री पद पर वापसी संभव है।

फिलहाल इतना तय है कि इजराइल में अगली सरकार का फैसला केवल लिकुड की 27 सीटों से नहीं होगा। असली मुकाबला अब गठबंधन की राजनीति, छोटे दलों के समर्थन और राष्ट्रपति के सामने बहुमत साबित करने की क्षमता का है।