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एनटीए की चूकों पर राहुल गांधी का वार, ‘छात्रों की गूंज’ से सरकार पर बढ़ा दबाव

राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर उठते सवालों ने एक बार फिर केंद्र सरकार और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) को विपक्ष के निशाने पर ला दिया है। परीक्षा आयोजित कराने वाली संस्था की कार्यप्रणाली में सामने आ रही लगातार खामियों को लेकर कांग्रेस नेता और लोकसभा में नेता विपक्ष राहुल गांधी सरकार पर हमलावर हैं। उनका कहना है कि परीक्षाओं में होने वाली गलतियों का सीधा असर उन विद्यार्थियों पर पड़ रहा है, जो महीनों और वर्षों तक मेहनत करके अपने भविष्य की तैयारी करते हैं।

यूजीसी-नेट जून 2026 की परीक्षा में अंग्रेजी, कॉमर्स और समाजशास्त्र से जुड़े प्रश्नपत्रों को लेकर सामने आई गड़बड़ियों के बाद एनटीए ने इन विषयों की परीक्षा दोबारा कराने का फैसला किया है। कांग्रेस ने इसी निर्णय को आधार बनाकर परीक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए हैं। पार्टी का आरोप है कि बार-बार सामने आने वाली तकनीकी, तथ्यात्मक और प्रबंधन संबंधी खामियों के कारण छात्रों को अनावश्यक परेशानी उठानी पड़ रही है।

राहुल गांधी ने इस पूरे मामले को अपने ‘छात्रों की गूंज’ अभियान से भी जोड़ दिया है। इस अभियान के जरिए वह अलग-अलग शहरों में विद्यार्थियों से संवाद कर शिक्षा व्यवस्था, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं से जुड़े मुद्दों को उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि परीक्षा में गलती किसी एजेंसी या व्यवस्था की हो सकती है, लेकिन उसका आर्थिक और मानसिक बोझ आखिरकार अभ्यर्थियों को ही उठाना पड़ता है।

यूजीसी-नेट दोबारा कराने के फैसले पर राहुल का सरकार पर हमला

यूजीसी-नेट के तीन विषयों की परीक्षा दोबारा कराने के फैसले के बाद राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार को सीधे निशाने पर लिया। उनका कहना है कि देश में ऐसी परीक्षा प्रणाली तैयार हो गई है, जो एक परीक्षा को भी बिना विवाद और गड़बड़ी के संपन्न नहीं करा पा रही है।

राहुल गांधी के मुताबिक, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले विद्यार्थी सिर्फ परीक्षा केंद्र तक पहुंचकर पेपर नहीं देते, बल्कि उसके पीछे उनकी लंबी तैयारी जुड़ी होती है। अभ्यर्थी महीनों तक पढ़ाई करते हैं, कोचिंग और अध्ययन सामग्री पर पैसा खर्च करते हैं, आवेदन शुल्क देते हैं और कई बार परीक्षा देने के लिए अपने शहर से दूसरे शहर तक यात्रा करते हैं।

ऐसे में यदि परीक्षा में किसी प्रकार की गलती सामने आती है और उसे दोबारा आयोजित करना पड़ता है, तो विद्यार्थियों को अपनी पूरी तैयारी फिर से उसी प्रक्रिया में लगानी पड़ती है। राहुल गांधी ने इसी परेशानी को रेखांकित करते हुए कहा कि व्यवस्था की गलती की कीमत छात्रों को चुकानी पड़ रही है।

उनका कहना है कि परीक्षा की तारीख बदलना या दोबारा पेपर कराना सिर्फ कैलेंडर में बदलाव नहीं है। इसके साथ अभ्यर्थियों का समय, पैसा, यात्रा और मानसिक दबाव भी जुड़ा होता है। इसी वजह से वह परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल: क्या परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र लीक हुए थे?

राहुल गांधी ने एनटीए के सामने एक और अहम सवाल रखा है। उनका कहना है कि एजेंसी को सिर्फ प्रश्नपत्रों में गलतियों की जानकारी सामने आने के बाद परीक्षा दोबारा कराने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि इन प्रश्नपत्रों की स्थिति परीक्षा से पहले क्या थी।

कांग्रेस नेता ने सवाल उठाया कि क्या परीक्षा से पहले प्रश्नपत्र लीक होने की कोई संभावना थी या नहीं। उनके अनुसार, जब किसी परीक्षा के प्रश्नपत्र को लेकर गंभीर सवाल खड़े हों तो केवल दोबारा परीक्षा कराने से मामला खत्म नहीं होना चाहिए। पूरी प्रक्रिया की जांच और जिम्मेदारी तय करना भी जरूरी है।

राहुल गांधी ने अपने सोशल मीडिया संदेश में यह भी कहा कि देश की शिक्षा व्यवस्था छात्रों के लिए अवसर उपलब्ध कराने के बजाय उनके सामने लगातार नई परेशानियां खड़ी कर रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा व्यवस्था विद्यार्थियों से पैसा और समय तो ले रही है, लेकिन उन्हें भरोसेमंद परीक्षा प्रणाली उपलब्ध नहीं करा पा रही।

‘छात्रों की गूंज’ अभियान में परीक्षा व्यवस्था बड़ा मुद्दा

राहुल गांधी पिछले कुछ समय से छात्रों से सीधे संवाद को राजनीतिक और सामाजिक अभियान का हिस्सा बना रहे हैं। ‘छात्रों की गूंज’ के तहत उन्होंने कोटा, देहरादून और प्रयागराज जैसे शहरों में विद्यार्थियों से बातचीत का उल्लेख किया है।

इन कार्यक्रमों में प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े छात्रों की परेशानियों, परीक्षा प्रक्रिया की विश्वसनीयता और शिक्षा व्यवस्था से संबंधित मुद्दों को प्रमुखता दी जा रही है। राहुल गांधी का कहना है कि छात्रों की समस्याओं को केवल परीक्षा परिणाम या रोजगार के आंकड़ों तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। उनके मुताबिक, परीक्षा व्यवस्था में भरोसा होना भी उतना ही जरूरी है।

इस अभियान का अगला आयोजन पुणे में 22 अगस्त को होने की बात कही गई है। इस कार्यक्रम में राहुल गांधी छात्राओं से सीधे संवाद करेंगे। कांग्रेस इस पहल के जरिए शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मुद्दों को युवाओं के बीच और व्यापक रूप से उठाने की कोशिश कर रही है।

जयराम रमेश ने पूछा- गलती सामने आने में दो महीने क्यों लगे?

कांग्रेस के संचार महासचिव जयराम रमेश ने भी यूजीसी-नेट के प्रश्नपत्रों में मिली खामियों को लेकर एनटीए की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि जून 2026 में आयोजित परीक्षा के करीब दो महीने बाद एजेंसी ने प्रश्नपत्रों में तथ्यात्मक, टाइपिंग और अनुवाद से जुड़ी गलतियों को स्वीकार किया।

कांग्रेस का सवाल है कि यदि प्रश्नपत्र में इतनी गंभीर त्रुटियां मौजूद थीं, तो उन्हें परीक्षा से पहले क्यों नहीं पकड़ा गया। प्रश्नपत्र तैयार करने से लेकर उसे जांचने और अंतिम रूप से मंजूरी देने तक कई स्तरों पर प्रक्रिया होती है। ऐसे में पार्टी यह जानना चाहती है कि इन सभी चरणों में गलतियां कैसे नजरअंदाज हो गईं।

जयराम रमेश ने यह भी सवाल उठाया कि केवल परीक्षा दोबारा कराने का निर्णय ही पर्याप्त नहीं है। असली जवाबदेही यह तय करने की है कि गलत प्रश्नपत्र तैयार किस स्तर पर हुआ, उसकी समीक्षा किसने की और अंतिम मंजूरी देने से पहले उसमें मौजूद त्रुटियों की जांच क्यों नहीं हुई।

कांग्रेस के मुताबिक, यदि परीक्षा आयोजित होने के बाद विद्यार्थियों को गलतियों का पता चलता है, तो इससे पूरी प्रक्रिया पर उनका भरोसा प्रभावित होता है। खासकर उन छात्रों के लिए यह स्थिति अधिक मुश्किल होती है, जो किसी एक परीक्षा को अपने करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव मानकर तैयारी करते हैं।

विपक्ष के लिए सरकार को घेरने का नया आधार

एनटीए को लेकर उठ रहे सवालों ने विपक्ष को केंद्र सरकार पर हमला करने का एक और मुद्दा दे दिया है। कांग्रेस पहले भी प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और कथित अनियमितताओं को लेकर सरकार की जवाबदेही पर सवाल उठाती रही है। अब यूजीसी-नेट के प्रश्नपत्रों में मिली खामियों को भी उसी व्यापक बहस का हिस्सा बनाया जा रहा है।

राहुल गांधी का कहना है कि केवल किसी एक मंत्री या अधिकारी को जिम्मेदार ठहराने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्होंने एनटीए के नेतृत्व की जवाबदेही पर भी सवाल उठाया है। उनके अनुसार, परीक्षा आयोजित कराने वाली संस्था की कार्यप्रणाली में सुधार और जिम्मेदारी तय किए बिना विद्यार्थियों की समस्याएं खत्म नहीं होंगी।

कांग्रेस का यह भी कहना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता और विश्वसनीयता बनाए रखना सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। लाखों युवा इन परीक्षाओं को अपने भविष्य से जोड़कर देखते हैं। ऐसे में किसी भी प्रकार की लापरवाही उनके लिए केवल एक प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि करियर से जुड़ा गंभीर संकट बन सकती है।

युवा कांग्रेस ने भी साधा निशाना

इस मुद्दे पर युवा कांग्रेस भी सक्रिय दिखाई दे रही है। संगठन के अध्यक्ष उदय भानु चिब ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के जरिए परीक्षा व्यवस्था को लेकर सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने अपने बयान में ‘पेपर लीक नक्सल’ जैसे शब्द का इस्तेमाल करते हुए कहा कि देश को ऐसी व्यवस्था से बचाने की जरूरत है, जो लगातार परीक्षा संबंधी विवादों को जन्म दे रही है।

कांग्रेस के नेताओं का तर्क है कि शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं का मुद्दा अब सिर्फ विद्यार्थियों तक सीमित नहीं रहा। यह युवाओं के रोजगार, करियर और सरकारी संस्थाओं पर उनके भरोसे से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए पार्टी इसे लगातार राजनीतिक बहस के केंद्र में रखने की तैयारी में है।

दूसरी ओर, यूजीसी-नेट के तीन विषयों की परीक्षा दोबारा कराने के फैसले से प्रभावित अभ्यर्थियों के सामने अब फिर से तैयारी और परीक्षा केंद्र तक पहुंचने की चुनौती होगी। कांग्रेस इसी परेशानी को सरकार की परीक्षा नीति और एनटीए की कार्यप्रणाली से जोड़कर सवाल उठा रही है।

फिलहाल यूजीसी-नेट की गड़बड़ियों ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि देश में बड़े स्तर पर होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और त्रुटिरहित बनाने के लिए क्या कदम उठाए जाने चाहिए। राहुल गांधी इसे अपने ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के जरिए लगातार उठा रहे हैं, जबकि कांग्रेस के अन्य नेता भी एनटीए और केंद्र सरकार से जवाब मांग रहे हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर छात्र संवाद कार्यक्रमों तक विपक्ष के प्रमुख मुद्दों में शामिल रह सकता है।