फगवाड़ा स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) में 26 सितंबर की रात से शुरू हुए विरोध, तोड़फोड़ और आगजनी के मामले में अब एक ऐसा सवाल सामने आया है, जिसका स्पष्ट जवाब पुलिस जांच के बावजूद अभी तक नहीं मिल पाया है। जिस कथित दुष्कर्म की खबर के बाद बड़ी संख्या में छात्र परिसर में जुटे और स्थिति हिंसक हो गई, सोशल मीडिया पर जिस छात्रा को घटना की कथित पीड़िता बताया जा रहा था, उसका एक वीडियो सामने आया है। इस वीडियो में छात्रा ने अपना रोल नंबर बताते हुए कहा कि वह सुरक्षित है और उसके साथ किसी तरह की अप्रिय घटना नहीं हुई। इसके बाद मामले को लेकर कई नए सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे अहम सवाल यह है कि आखिर जिस छात्रा के साथ कथित दुष्कर्म की बात कही जा रही थी, वह कौन है और शिकायत किसकी ओर से की गई थी?
वीडियो सामने आने के बाद बदला मामले का रुख
मंगलवार को सोशल मीडिया पर सामने आए वीडियो में एक छात्रा खुद को सुरक्षित बताती नजर आई। छात्रा ने वीडियो में अपना रोल नंबर बताया और कहा कि वह ठीक है। उसके मुताबिक, विश्वविद्यालय परिसर में जिस तरह का विरोध और हंगामा चल रहा था, उसे देखकर वह डर गई थी और इसके बाद अपने रिश्तेदारों के साथ घर चली गई। हालांकि, वीडियो में छात्रा ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वह किस विश्वविद्यालय में पढ़ती है और न ही उसने उस कथित घटना के संबंध में कोई विस्तृत जानकारी दी। इसके बावजूद सोशल मीडिया पर पहले जिस छात्रा को कथित पीड़िता के रूप में पेश किया जा रहा था, उसके सुरक्षित होने की बात सामने आने से पूरे घटनाक्रम को लेकर चर्चा तेज हो गई है।
अब जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह पता लगाना है कि सोशल मीडिया पर जिस छात्रा को कथित पीड़िता बताया गया था, क्या वह वास्तव में वही छात्रा थी जिसके संबंध में पुलिस के पास शिकायत या बयान आया था। पुलिस ने अब तक कथित पीड़िता की पहचान सार्वजनिक नहीं की है। विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से भी इस संबंध में कोई ऐसी आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि कथित घटना में शामिल छात्रा कौन है। यही वजह है कि इस मामले में सामने आ रही अलग-अलग जानकारियों को लेकर भ्रम बना हुआ है।
पुलिस के सामने सबसे बड़ा सवाल क्या है?
पूरे घटनाक्रम में सबसे महत्वपूर्ण बिंदु कथित दुष्कर्म की घटना की वास्तविकता और उससे जुड़ी शिकायत है। शुरुआत में विश्वविद्यालय परिसर में ऐसी खबर तेजी से फैली कि एक छात्रा के साथ दुष्कर्म हुआ है। यह जानकारी छात्रों के बीच पहुंची और देखते ही देखते बड़ी संख्या में छात्र विरोध के लिए जमा हो गए। हालात बिगड़ने के बाद परिसर में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं हुईं। इसके अलावा राष्ट्रीय राजमार्ग को जाम करने की स्थिति भी बनी।
शुरुआती चरण में पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन ने दुष्कर्म की खबर को अफवाह बताया था। हालांकि बाद में छात्राओं के बयानों के आधार पर अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज किया गया और जांच के लिए विशेष जांच दल का गठन किया गया। ऐसे में अब पुलिस के सामने यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है कि वह कथित घटना से संबंधित सभी बयानों, शिकायतों और डिजिटल साक्ष्यों को एक साथ रखकर यह निर्धारित करे कि घटना में वास्तव में क्या हुआ था।
यह भी जरूरी है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित किसी वीडियो या पोस्ट को तब तक प्रमाण नहीं माना जाए, जब तक उसकी स्वतंत्र रूप से जांच न हो जाए। इसी कारण पुलिस की जांच में सीसीटीवी रिकॉर्डिंग, मोबाइल वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
वायरल सीसीटीवी फुटेज ने भी बढ़ाया संशय
इसी बीच सोशल मीडिया पर एक कथित सीसीटीवी फुटेज भी वायरल हुआ है। फुटेज में एक महिला के साथ पीले रंग की जैकेट पहने दो लोग दिखाई देते हैं। प्रदर्शन कर रहे कुछ छात्रों की ओर से दावा किया गया कि यह वीडियो विश्वविद्यालय के जी-3 छात्रावास का है। छात्रों का कहना है कि फुटेज में दिखाई देने वाले लोग एक वार्डन के साथ कमरे की तरफ जाते नजर आ रहे हैं और इसी कमरे को कथित घटना से जोड़कर देखा जा रहा है।
हालांकि इस वीडियो को लेकर अभी कई बातें स्पष्ट नहीं हैं। पुलिस या विश्वविद्यालय प्रशासन ने अब तक आधिकारिक तौर पर यह पुष्टि नहीं की है कि वायरल फुटेज वास्तव में एलपीयू के जी-3 छात्रावास का ही है। वीडियो में दिखाई देने वाले लोगों की पहचान भी आधिकारिक रूप से सामने नहीं आई है। इसी तरह यह भी पुष्टि नहीं हुई है कि वीडियो में दिखाया गया कमरा उसी कथित घटना से जुड़ा था, जिसके बाद परिसर में प्रदर्शन शुरू हुआ था।
इसलिए वायरल फुटेज को लेकर किए जा रहे दावों और आधिकारिक जांच के निष्कर्षों को अलग-अलग देखना जरूरी है। पुलिस डिजिटल साक्ष्यों की जांच कर रही है और इसी प्रक्रिया में यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि वायरल वीडियो वास्तविक घटना से संबंधित है या नहीं।
26 सितंबर की रात क्यों बिगड़े हालात?
एलपीयू में विवाद की शुरुआत कथित दुष्कर्म की खबर फैलने के बाद हुई। देखते ही देखते यह मामला छात्रों के बीच चर्चा का विषय बन गया। बड़ी संख्या में छात्र परिसर में एकत्र हुए और विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया। स्थिति धीरे-धीरे तनावपूर्ण होती चली गई। इसके बाद विश्वविद्यालय परिसर में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। कुछ जगहों पर प्रदर्शनकारियों और प्रशासन के बीच तनाव की स्थिति भी बनी।
26 और 27 सितंबर के दौरान हालात इतने बिगड़े कि राष्ट्रीय राजमार्ग को भी जाम किया गया। इस घटनाक्रम का असर विश्वविद्यालय परिसर के साथ-साथ आसपास के क्षेत्र में भी दिखाई दिया। पुलिस को स्थिति संभालने के लिए हस्तक्षेप करना पड़ा। बाद में हिंसा, तोड़फोड़, आगजनी और सड़क जाम करने से जुड़े मामलों में अलग-अलग एफआईआर दर्ज की गईं।
पुलिस अब इन मामलों की जांच कथित दुष्कर्म से जुड़े घटनाक्रम से अलग भी कर रही है, ताकि हिंसा में शामिल लोगों की भूमिका निर्धारित की जा सके। इसके लिए घटनास्थल के वीडियो, सीसीटीवी फुटेज और सोशल मीडिया पर मौजूद सामग्री को जांच का हिस्सा बनाया जा रहा है।
पहले अफवाह बताया, फिर दर्ज हुआ केस
इस पूरे मामले में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम यह भी रहा कि शुरुआत में कथित दुष्कर्म की खबर को पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन ने अफवाह बताया था। लेकिन बाद में छात्राओं से मिले बयानों के आधार पर अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ मामला दर्ज किया गया। इसके साथ ही जांच को आगे बढ़ाने के लिए एसआईटी बनाई गई।
यही वजह है कि अब जांच का दायरा केवल वायरल वीडियो तक सीमित नहीं है। पुलिस को यह पता लगाना होगा कि शुरुआत में दुष्कर्म की सूचना किस माध्यम से फैली, किन लोगों ने इसे आगे प्रसारित किया, किस आधार पर छात्रों ने विरोध शुरू किया और बाद में हिंसा की स्थिति कैसे बनी। साथ ही कथित घटना से जुड़े बयानों और उपलब्ध साक्ष्यों की भी पुष्टि करनी होगी।
छात्रा के वीडियो ने सोशल मीडिया पर बढ़ाई चर्चा
कथित पीड़िता के रूप में जिस छात्रा का नाम या पहचान सोशल मीडिया पर प्रसारित की जा रही थी, उसके सुरक्षित होने का वीडियो सामने आने के बाद इंटरनेट पर कई तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं। लेकिन इस वीडियो के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना भी जल्दबाजी होगी कि कथित दुष्कर्म की घटना हुई ही नहीं। इसी तरह केवल सोशल मीडिया पर वायरल किसी पोस्ट के आधार पर घटना को सही मान लेना भी उचित नहीं होगा।
मामले की सच्चाई पुलिस की जांच और उपलब्ध साक्ष्यों से ही स्पष्ट होगी। कथित पीड़िता की पहचान सार्वजनिक नहीं किए जाने का कारण भी यही है कि जांच पूरी होने से पहले किसी छात्रा की पहचान सामने आने से उसकी निजता और सुरक्षा प्रभावित हो सकती है।
हिंसा की जांच भी अलग से जारी
एलपीयू परिसर में हुई हिंसा को लेकर पुलिस ने अलग एफआईआर दर्ज की हैं। जांच एजेंसियां यह पता लगाने में जुटी हैं कि प्रदर्शन के दौरान किन लोगों ने तोड़फोड़, आगजनी या अन्य हिंसक गतिविधियों में हिस्सा लिया। इसके लिए वीडियो रिकॉर्डिंग और अन्य डिजिटल सामग्री की जांच की जा रही है।
पुलिस के सामने फिलहाल दो स्तरों पर जांच की चुनौती है। पहला, कथित दुष्कर्म की सूचना से जुड़ी वास्तविक घटना और उसकी शिकायत की सच्चाई सामने लाना। दूसरा, इस सूचना के बाद विश्वविद्यालय परिसर में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों की भूमिका निर्धारित करना। दोनों मामलों में उपलब्ध साक्ष्यों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है।
जांच पूरी होने के बाद ही साफ होगी तस्वीर
फिलहाल इस मामले में सबसे बड़ा अनुत्तरित सवाल यही है कि कथित दुष्कर्म की पीड़िता कौन है और घटना के संबंध में वास्तविक शिकायत क्या थी। जिस छात्रा को सोशल मीडिया पर कथित पीड़िता के तौर पर बताया जा रहा था, उसके वीडियो में सुरक्षित होने की बात कहे जाने के बाद यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है।
पुलिस ने मामले में अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ केस दर्ज कर एसआईटी गठित की है और डिजिटल साक्ष्यों की जांच जारी है। वायरल सीसीटीवी फुटेज की वास्तविकता, उसमें दिखाई देने वाले लोगों की पहचान और कथित घटना से उसका संबंध भी जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। फिलहाल उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर घटना के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। पुलिस जांच पूरी होने और आधिकारिक तथ्यों के सामने आने के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि 26 सितंबर को एलपीयू में विवाद की वास्तविक शुरुआत किस घटना से हुई और इसके बाद हिंसा किस तरह भड़की।