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ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना का नया फोकस: 9 एंटी-ड्रोन सिस्टम और 10 लंबी दूरी के सर्विलांस ड्रोन खरीदने की तैयारी

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना ने आधुनिक युद्ध में ड्रोन और उनसे निपटने वाली तकनीक की भूमिका को ध्यान में रखते हुए अपनी सैन्य तैयारियों को विस्तार देना शुरू कर दिया है। सेना की हालिया खरीद योजनाओं से संकेत मिलता है कि अब जोर केवल निगरानी करने या दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि हवाई खतरों की पहचान करने, ड्रोन के जरिए जरूरी सैन्य सूचनाएं जुटाने और विरोधी के मानवरहित विमानों को निष्क्रिय करने की क्षमता विकसित करने पर भी दिया जा रहा है। जुलाई से सितंबर के बीच सामने आए खरीद प्रस्ताव इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा हैं। इनके तहत सेना नौ लो एल्टीट्यूड एरियल थ्रेट रिस्पॉन्स एंड मिटिगेशन सिस्टम खरीदने की प्रक्रिया में है। इसके अलावा, लंबी दूरी तक निगरानी करने वाले दस इंटीग्रेटेड लॉन्ग रेंज सर्विलांस ड्रोन के लिए भी पहले टेंडर जारी किया जा चुका है। इन दोनों योजनाओं को साथ रखकर देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि सेना निगरानी और जवाबी कार्रवाई से जुड़ी क्षमताओं को एक साथ मजबूत करने पर काम कर रही है।

कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन से निपटने की तैयारी

आधुनिक युद्ध के दौरान कम ऊंचाई पर उड़ने वाले छोटे ड्रोन सुरक्षा एजेंसियों और सैन्य ठिकानों के लिए चुनौती बन सकते हैं। ऐसे उपकरणों का इस्तेमाल निगरानी, सैन्य गतिविधियों की जानकारी जुटाने और कुछ परिस्थितियों में हमला करने के लिए किया जा सकता है। पारंपरिक हवाई रक्षा व्यवस्था के सामने छोटे ड्रोन की पहचान करना और समय रहते उनके खिलाफ कार्रवाई करना अलग तरह की चुनौती पैदा करता है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए भारतीय सेना नौ लो एल्टीट्यूड एरियल थ्रेट रिस्पॉन्स एंड मिटिगेशन सिस्टम हासिल करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इस तरह की प्रणाली का उद्देश्य कम ऊंचाई पर पैदा होने वाले हवाई खतरे से निपटने की क्षमता उपलब्ध कराना है। हालांकि, उपलब्ध खरीद संबंधी जानकारी में इन नौ प्रणालियों की तैनाती के संभावित स्थान, उनकी तकनीकी विशेषताओं और प्रत्येक सिस्टम की मारक या निष्क्रिय करने की क्षमता का विस्तृत ब्योरा नहीं दिया गया है। इसलिए इन्हें सेना की काउंटर-ड्रोन तैयारियों का हिस्सा माना जा सकता है, लेकिन इनकी सटीक परिचालन क्षमता के बारे में किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा।

लंबी दूरी से दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखेंगे ड्रोन

सेना की दूसरी प्रमुख योजना दस इंटीग्रेटेड लॉन्ग रेंज सर्विलांस ड्रोन की खरीद से जुड़ी है। इनका प्रमुख उद्देश्य लंबी दूरी से निगरानी करना और संबंधित क्षेत्रों की तस्वीरें या वीडियो जैसी जानकारी उपलब्ध कराना है। सैन्य अभियानों में समय पर मिलने वाली जानकारी बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इससे किसी क्षेत्र में हो रही गतिविधियों को समझने और आगे की कार्रवाई के बारे में निर्णय लेने में मदद मिल सकती है। लंबी दूरी तक उड़ान भरने वाले निगरानी ड्रोन का इस्तेमाल दुर्गम इलाकों में नजर रखने और सैनिकों को जरूरी जानकारी उपलब्ध कराने के लिए किया जा सकता है। ऐसे उपकरणों से उन क्षेत्रों की निगरानी में भी मदद मिल सकती है, जहां लगातार मानवीय निगरानी करना कठिन होता है। हालांकि, इस खरीद प्रस्ताव के तहत आने वाले ड्रोन की उड़ान अवधि, परिचालन दूरी, कैमरा क्षमता और सेंसर संबंधी विशेषताओं का पूरा विवरण सामने नहीं आया है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी का मुख्य संकेत यही है कि सेना अपनी निगरानी व्यवस्था में लंबी दूरी तक काम करने वाले मानवरहित विमानों की भूमिका बढ़ाना चाहती है।

केवल ड्रोन खरीदने तक सीमित नहीं है सेना की योजना

सेना की तैयारियों का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि ड्रोन युद्ध के लिए जरूरी सहायक उपकरणों और तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता पर ध्यान दिया जा रहा है। सामने आई जानकारी के मुताबिक, सेना ने ड्रोन से जुड़े 273 अलग-अलग सामानों और उपकरणों की सूची तैयार की है। इसमें मोटर, इलेक्ट्रॉनिक स्पीड कंट्रोलर, फ्लाइट कंट्रोलर, ग्राउंड कंट्रोल सिस्टम, कैमरा, बैटरी और रिमोटली ऑपरेटेड मल्टी-पेलोड रिलीज मैकेनिज्म जैसे उपकरण शामिल हैं। यह सूची बताती है कि ड्रोन के संचालन के लिए सिर्फ तैयार विमान हासिल करना ही पर्याप्त नहीं है। उनके निर्माण, नियंत्रण, रखरखाव और अलग-अलग अभियानों में इस्तेमाल के लिए कई तरह के तकनीकी हिस्सों की जरूरत होती है। इन उपकरणों की उपलब्धता से संबंधित ड्रोन प्रणाली को संचालित रखने और जरूरत पड़ने पर उसकी मरम्मत करने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, 273 वस्तुओं की सूची जारी होने का अर्थ यह नहीं है कि सभी सामान एक ही समय में खरीदे जा चुके हैं या सेना के पास उनकी पूरी संख्या उपलब्ध हो गई है। खरीद प्रक्रिया और वास्तविक आपूर्ति के बीच अंतर होता है, इसलिए सूची को आवश्यक उपकरणों की पहचान और संभावित खरीद की दिशा में उठाए गए कदम के रूप में समझना चाहिए।

एफपीवी ड्रोन से लेकर पेलोड गिराने की तकनीक तक पर ध्यान

सेना के ड्रोन संबंधी संसाधनों में फर्स्ट पर्सन व्यू यानी एफपीवी ड्रोन और पेलोड रिलीज करने वाले उपकरण भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। एफपीवी ड्रोन को ऑपरेटर कैमरे से मिलने वाले दृश्य के आधार पर नियंत्रित कर सकता है। इस तकनीक का उपयोग विभिन्न प्रशिक्षण गतिविधियों, नजदीकी निगरानी और सैन्य जरूरतों के अनुसार कुछ विशेष अभियानों में किया जा सकता है। दूसरी ओर, मल्टी-पेलोड रिलीज मैकेनिज्म ऐसा उपकरण है, जिसकी मदद से ड्रोन से जुड़ा सामान या निर्धारित पेलोड नियंत्रित तरीके से छोड़ा जा सकता है। यहां पेलोड का मतलब उस अतिरिक्त वस्तु या उपकरण से है, जिसे ड्रोन अपने साथ लेकर उड़ता है। इसका उपयोग अभियान की प्रकृति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। सर्विलांस ड्रोन का मुख्य काम सूचना जुटाना और उसे संबंधित इकाई तक पहुंचाना होता है, जबकि पेलोड छोड़ने की सुविधा किसी अन्य प्रकार की परिचालन जरूरत को पूरा कर सकती है। इन क्षमताओं के लिए उपयुक्त नियंत्रण प्रणाली, कैमरे, बैटरी और दूसरे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जरूरी होते हैं। सेना की सूची में ऐसे संसाधनों का शामिल होना ड्रोन के विभिन्न प्रकारों और उनसे जुड़ी तकनीकी जरूरतों पर ध्यान दिए जाने को दर्शाता है।

सैनिकों को प्रशिक्षण देना भी होगा जरूरी

ड्रोन आधारित युद्ध व्यवस्था को प्रभावी बनाने के लिए आधुनिक उपकरणों की खरीद के साथ प्रशिक्षित ऑपरेटरों की उपलब्धता भी आवश्यक है। ड्रोन उड़ाने, कैमरे से मिलने वाली जानकारी को समझने, उपकरणों की तकनीकी खराबियों की पहचान करने और अभियान के दौरान उचित निर्णय लेने के लिए सैनिकों को प्रशिक्षण देना पड़ता है। इसी तरह, विरोधी ड्रोन की पहचान करने और काउंटर-ड्रोन सिस्टम का इस्तेमाल करने के लिए अलग कौशल की जरूरत होती है। यदि किसी सैन्य इकाई के पास आधुनिक ड्रोन उपलब्ध हों, लेकिन उन्हें चलाने और उनका रखरखाव करने वाले प्रशिक्षित कर्मियों की कमी हो, तो उनकी उपयोगिता प्रभावित हो सकती है। इसलिए ड्रोन संचालन, निगरानी, तकनीकी मरम्मत और हवाई खतरों से निपटने का प्रशिक्षण भी इस पूरी व्यवस्था का अहम हिस्सा है। उपलब्ध खरीद प्रस्तावों में प्रशिक्षण से जुड़ी जरूरतों का उल्लेख व्यापक ड्रोन तैयारियों के संदर्भ में किया गया है, हालांकि प्रशिक्षण कार्यक्रमों की संख्या, अवधि या प्रशिक्षित किए जाने वाले सैनिकों का विस्तृत आंकड़ा सामने नहीं आया है।

चीन और पाकिस्तान की तकनीक के मुकाबले की चुनौती

रक्षा विश्लेषक ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) शरदेंदु के मुताबिक, भारत की ड्रोन युद्ध क्षमता को समझने के लिए चीन और पाकिस्तान की तकनीकी तैयारियों को भी ध्यान में रखना होगा। उनका कहना है कि चीन के पास ड्रोन निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित तकनीक का व्यापक आधार है। वहीं, पाकिस्तान भी चीनी तकनीक और तुर्किये की मदद से अपनी ड्रोन क्षमताओं को आगे बढ़ा रहा है। ऐसे माहौल में भारत के सामने चुनौती केवल आधुनिक ड्रोन खरीदने की नहीं है। उसे सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी मजबूत करने, जरूरी सूचनाओं के आधार पर सटीक जवाबी कार्रवाई करने और विरोधी के ड्रोन से उत्पन्न खतरे को कम करने के लिए एक समन्वित व्यवस्था तैयार करनी होगी। विशेषज्ञ के अनुसार, ड्रोन और काउंटर-ड्रोन क्षमताओं का मूल्यांकन क्षेत्रीय सुरक्षा परिस्थितियों और संभावित विरोधियों की तकनीकी प्रगति को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

स्वदेशी निर्माण और कम समय में मरम्मत पर भी जोर जरूरी

ड्रोन युद्ध में तकनीकी उपकरणों की संख्या के साथ उनकी उपलब्धता, विश्वसनीयता और लगातार इस्तेमाल की क्षमता भी मायने रखती है। किसी अभियान के दौरान उपकरण खराब होने पर यदि उनके जरूरी कलपुर्जे उपलब्ध नहीं हों या मरम्मत में अधिक समय लगे, तो परिचालन क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसी कारण स्वदेशी निर्माण, स्थानीय स्तर पर कलपुर्जों की उपलब्धता और तेजी से मरम्मत की व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बड़ी संख्या में ड्रोन तैयार करने की क्षमता होने से जरूरत के समय उनकी आपूर्ति बढ़ाने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा, कम लागत वाले उपकरणों का विकास और उत्पादन भी अहम है, क्योंकि ड्रोन आधारित सैन्य अभियानों में उपकरणों की संख्या और उन्हें लगातार उपलब्ध बनाए रखना महत्वपूर्ण हो सकता है। भारत के लिए चुनौती ऐसी व्यवस्था तैयार करना है, जिसमें निगरानी ड्रोन, एफपीवी ड्रोन, नियंत्रण प्रणाली, बैटरी और काउंटर-ड्रोन उपकरण एक-दूसरे के साथ प्रभावी तरीके से काम कर सकें।

ड्रोन युद्ध की बदलती जरूरतों के मुताबिक तैयारी

जुलाई से सितंबर के बीच सामने आए भारतीय सेना के खरीद प्रस्तावों में तीन प्रमुख दिशाएं दिखाई देती हैं—लंबी दूरी तक निगरानी, कम ऊंचाई वाले हवाई खतरों से निपटना और ड्रोन के संचालन के लिए जरूरी उपकरणों की उपलब्धता। नौ एंटी-ड्रोन सिस्टम, दस लंबी दूरी के सर्विलांस ड्रोन और 273 तरह के उपकरणों की सूची इसी व्यापक तैयारी के अलग-अलग हिस्से हैं। इन प्रस्तावों से यह संकेत मिलता है कि सेना ड्रोन को आधुनिक सैन्य अभियानों की महत्वपूर्ण जरूरत मानते हुए अपनी क्षमताओं का विस्तार करना चाहती है। हालांकि, खरीद प्रस्ताव जारी होना, अनुबंध पूरा होना, उपकरणों की आपूर्ति और उन्हें परिचालन में शामिल करना अलग-अलग चरण हैं। वास्तविक क्षमता का आकलन इन प्रक्रियाओं के पूरा होने, उपकरणों के प्रदर्शन और सैनिकों के प्रशिक्षण के आधार पर ही किया जा सकेगा। ऑपरेशन सिंदूर के बाद ड्रोन और उनसे निपटने वाली तकनीक पर बढ़ता ध्यान यह दर्शाता है कि भारतीय सेना भविष्य की सुरक्षा चुनौतियों के लिए निगरानी, जवाबी कार्रवाई, स्वदेशी उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता को एक साथ आगे बढ़ाने की जरूरत पर काम कर रही है।