ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते सैन्य तनाव ने भारत के लिए नई कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ओर से ईरान के साथ सीजफायर खत्म होने की घोषणा के बाद दोनों देशों के बीच टकराव फिर बढ़ गया है। इसी सिलसिले में अमेरिका ने ईरान के कई ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं। इन हमलों में ईरान का रणनीतिक रूप से बेहद अहम चाबहार पोर्ट भी प्रभावित हुआ है।
चाबहार पोर्ट भारत के लिए सिर्फ एक बंदरगाह नहीं, बल्कि पश्चिम और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने की एक बड़ी रणनीतिक योजना का हिस्सा रहा है। इस पोर्ट के विकास में भारत ने लंबे समय से निवेश किया है। ऐसे में अमेरिकी हमले के बाद भारत की चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि फिलहाल भारत चाबहार पोर्ट का प्रत्यक्ष संचालन नहीं कर रहा है, लेकिन इस घटना ने भविष्य में भारत की भूमिका और निवेश को लेकर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।
चाबहार पोर्ट ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में मकरान तट पर स्थित है। यह स्थान भौगोलिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट से लगभग 170 किलोमीटर की दूरी पर है। भारत के लिए चाबहार का महत्व इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि यह पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराता है।
भारत लंबे समय से इस पोर्ट को अपनी क्षेत्रीय कनेक्टिविटी नीति का अहम हिस्सा मानता रहा है। अगर चाबहार पूरी क्षमता से काम करता है तो भारत को मध्य एशियाई देशों के साथ व्यापार बढ़ाने और ऊर्जा संसाधनों तक पहुंच बनाने में मदद मिल सकती है। लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच तनाव बढ़ने से इस पूरी योजना पर अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।
भारत के बड़े प्रोजेक्ट पर संकट के संकेत
भारत ने चाबहार पोर्ट के विकास के लिए करोड़ों डॉलर का निवेश किया है। खासतौर पर शहीद बेहेश्ती टर्मिनल के विकास और संचालन में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। साल 2024 में भारत और ईरान के बीच चाबहार पोर्ट के संचालन को लेकर 10 साल का समझौता भी हुआ था। इस समझौते को दोनों देशों के बीच आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी के लिहाज से अहम कदम माना गया था।
हालांकि ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण भारत को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा। प्रतिबंधों के जोखिम को देखते हुए भारत ने चाबहार फ्री जोन में अपनी भागीदारी को सीमित किया और कुछ जिम्मेदारियां स्थानीय ईरानी कंपनी को अस्थायी तौर पर सौंप दीं। इसका उद्देश्य यह था कि भारत का निवेश सुरक्षित रहे और भविष्य में परिस्थितियां सामान्य होने पर वह फिर से सक्रिय भूमिका निभा सके।
लेकिन अब अमेरिका की सैन्य कार्रवाई ने इस रणनीति को और मुश्किल बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि हमले से भारत की किसी मौजूदा सक्रिय सुविधा को तुरंत बड़ा नुकसान भले न हुआ हो, लेकिन चाबहार परियोजना के भविष्य पर इसका असर पड़ सकता है।
चाबहार क्यों है भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण?
भारत के लिए चाबहार पोर्ट की अहमियत कई स्तरों पर है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह भारत को पाकिस्तान के रास्ते के बिना अफगानिस्तान और आगे मध्य एशिया तक पहुंचने का विकल्प देता है। भारत और पाकिस्तान के बीच लंबे समय से तनावपूर्ण संबंधों के कारण सीधी जमीनी कनेक्टिविटी हमेशा चुनौती रही है।
इसी वजह से भारत ने ईरान के साथ मिलकर चाबहार को विकसित करने की योजना बनाई थी। यह पोर्ट इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी INSTC का भी महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। इस कॉरिडोर के जरिए भारत को ईरान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप तक व्यापारिक रास्ते मजबूत करने की उम्मीद रही है।
चाबहार सिर्फ व्यापारिक परियोजना नहीं है, बल्कि यह भारत की रणनीतिक पहुंच बढ़ाने का माध्यम भी है। अफगानिस्तान में भारत की विकास परियोजनाओं और मध्य एशियाई देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
अमेरिका-ईरान तनाव ने बढ़ाई मुश्किलें
अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है, लेकिन हालिया सैन्य कार्रवाई ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। चाबहार पोर्ट पर हमले ने यह दिखा दिया है कि क्षेत्र में बढ़ती अस्थिरता किसी भी बड़े अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट को प्रभावित कर सकती है।
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अमेरिका और ईरान दोनों के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखे। अमेरिका भारत का महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है, वहीं ईरान भारत के लिए ऊर्जा, व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क के लिहाज से अहम देश है।
नई परिस्थितियों में भारत को अपनी चाबहार नीति पर फिर से विचार करना पड़ सकता है। अगर ईरान में अस्थिरता लंबे समय तक बनी रहती है तो परियोजना की गति धीमी हो सकती है और निवेश से जुड़े जोखिम बढ़ सकते हैं।
पाकिस्तान को क्यों हो सकती है खुशी?
चाबहार पोर्ट की सफलता पाकिस्तान के लिए चिंता का विषय रही है क्योंकि यह उसके ग्वादर पोर्ट के लिए एक रणनीतिक चुनौती माना जाता है। पाकिस्तान और चीन मिलकर ग्वादर पोर्ट को विकसित कर रहे हैं, जो चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी CPEC का अहम हिस्सा है।
भारत की चाबहार में बढ़ती भूमिका से पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट की रणनीतिक बढ़त को चुनौती मिल सकती थी। अगर चाबहार पूरी तरह सक्रिय होता तो भारत को क्षेत्रीय व्यापार में एक नया रास्ता मिलता और पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति का महत्व कुछ कम हो सकता था।
यही वजह है कि चाबहार में आई रुकावटें पाकिस्तान के लिए राहत की खबर मानी जा रही हैं। अमेरिका के प्रतिबंधों और अब सैन्य कार्रवाई के कारण भारत की योजना प्रभावित होती है तो इसका फायदा अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान और चीन के प्रभाव को मिल सकता है।
भारत के लिए आगे की राह आसान नहीं
भारत के लिए चाबहार परियोजना को पूरी तरह छोड़ना आसान नहीं होगा क्योंकि यह कई वर्षों की रणनीतिक योजना का हिस्सा है। भारत ने इस परियोजना में आर्थिक निवेश के साथ-साथ राजनीतिक पूंजी भी लगाई है।
हालांकि मौजूदा हालात में भारत को कई विकल्पों पर काम करना होगा। इसमें कूटनीतिक स्तर पर अमेरिका और ईरान दोनों के साथ बातचीत बनाए रखना, निवेश की सुरक्षा सुनिश्चित करना और क्षेत्रीय हालात पर लगातार नजर रखना शामिल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि चाबहार की उपयोगिता अभी खत्म नहीं हुई है, लेकिन इसकी सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि ईरान-अमेरिका संबंध किस दिशा में जाते हैं। अगर तनाव कम होता है तो भारत फिर से इस परियोजना को गति दे सकता है, लेकिन लंबे समय तक संघर्ष जारी रहा तो चाबहार का भविष्य अनिश्चित बना रह सकता है।
फिलहाल अमेरिकी हमले ने भारत की चाबहार योजना को सीधा ऑपरेशनल नुकसान भले न पहुंचाया हो, लेकिन रणनीतिक स्तर पर बड़ा झटका जरूर दिया है। यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बड़े आर्थिक प्रोजेक्ट सिर्फ निवेश से नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और कूटनीतिक संतुलन से भी जुड़े होते हैं।