पंजाब में सरकारी कर्मचारियों और सरकार के बीच विभिन्न मांगों को लेकर टकराव बढ़ता नजर आ रहा है। बकाया महंगाई भत्ता (डीए), पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) की बहाली और अन्य लंबित मांगों को लेकर कर्मचारी संगठनों ने मंगलवार को राज्यभर में कामकाज बंद रखने का फैसला किया है। कर्मचारी एक दिन की पेन डाउन स्ट्राइक के साथ सांकेतिक भूख हड़ताल भी करेंगे। इस दौरान प्रदेश के अलग-अलग जिलों में सरकारी दफ्तरों से लेकर निदेशालयों और सचिवालय स्तर तक प्रदर्शन किए जाने की तैयारी है।
कर्मचारी संगठनों की इस कार्रवाई के चलते मंगलवार को कई सरकारी विभागों का सामान्य कामकाज प्रभावित होने की संभावना है। कर्मचारी नेताओं का कहना है कि यह आंदोलन किसी एक संगठन तक सीमित नहीं है, बल्कि अलग-अलग कर्मचारी जत्थेबंदियों के साझा मंच के तहत चलाया जा रहा है। उनका दावा है कि राज्य के लाखों कर्मचारी और पेंशनर अपनी मांगों को लेकर एकजुट हैं।
वहीं, पंजाब सरकार की ओर से कर्मचारियों के एक बड़े वर्ग को डीए में बढ़ोतरी देने की तैयारी को आंदोलन के बीच महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सरकार ने 17 जुलाई 2020 के बाद भर्ती हुए करीब 85 हजार कर्मचारियों के महंगाई भत्ते को 42 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत करने का प्रस्ताव तैयार किया है। ये वे कर्मचारी हैं, जिन पर केंद्रीय वेतनमान लागू है। इस फैसले से सरकारी खजाने पर लगभग 900 करोड़ रुपये सालाना का अतिरिक्त वित्तीय भार पड़ने का अनुमान है।
इस प्रस्ताव को कैबिनेट सब-कमेटी की ओर से तैयार किया गया है। हालांकि इसे अंतिम रूप देने के लिए मुख्यमंत्री स्तर से मंजूरी मिलना बाकी है। सरकार की ओर से इसे कर्मचारियों की मांगों की दिशा में उठाया गया कदम बताया जा रहा है, लेकिन कर्मचारी संगठन इससे संतुष्ट नहीं हैं।
कर्मचारी नेताओं का आरोप है कि सरकार की ओर से केवल एक वर्ग को डीए का लाभ देने की योजना बनाकर आंदोलन को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। पीएसएस ऑफिसर्स एसोसिएशन के प्रदेश प्रधान मंजीत सिंह रंधावा ने कहा कि कर्मचारियों का मौजूदा संघर्ष व्यापक है और इसमें करीब सवा तीन लाख कर्मचारी तथा लगभग चार लाख पेंशनर शामिल हैं। उनके मुताबिक किसी एक श्रेणी के कर्मचारियों के लिए अलग फैसला लेने से आंदोलन खत्म नहीं होने वाला।
रंधावा ने सरकार के 85 हजार कर्मचारियों से जुड़े डीए प्रस्ताव पर भी सवाल उठाया। उनका कहना है कि इस श्रेणी में बड़ी संख्या ऐसे कर्मचारियों की है, जिन्हें नौकरी में आए अभी तीन वर्ष भी पूरे नहीं हुए हैं। सेवा शर्तों के अनुसार शुरुआती अवधि में कर्मचारियों को कुछ भत्तों का लाभ नहीं मिलने की व्यवस्था है और इस दौरान उन्हें मुख्य रूप से बेसिक वेतन दिया जाता है। ऐसे में सरकार का डीए बढ़ाने का प्रस्ताव व्यवहारिक रूप से सभी संबंधित कर्मचारियों को तत्काल लाभ नहीं पहुंचाएगा।
कर्मचारी नेताओं ने इसे सरकार की ओर से कर्मचारियों को अलग-अलग हिस्सों में बांटने का प्रयास करार दिया है। उनका कहना है कि यदि सरकार वास्तव में कर्मचारियों की समस्याओं का समाधान करना चाहती है तो उसे सभी लंबित मांगों पर एक साथ बातचीत करनी चाहिए। डीए के बकाये, पुरानी पेंशन की बहाली और अन्य वित्तीय मुद्दों पर स्पष्ट निर्णय लिया जाना चाहिए।
आंदोलन के बीच कर्मचारी नेताओं के तबादलों को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया है। कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि सामान्य राज्य प्रशासनिक विभाग की ओर से कर्मचारी नेताओं के ट्रांसफर किए जा रहे हैं। नेताओं का कहना है कि तबादलों के जरिए आंदोलन को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है, लेकिन इससे कर्मचारियों की एकजुटता पर कोई असर नहीं पड़ेगा।
कर्मचारी नेता कुलवंत सिंह ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी मांगों को सरकार के सामने रखना और अधिकारों के लिए संघर्ष करना कर्मचारियों का अधिकार है। उनका कहना है कि कर्मचारी नेताओं का तबादला करने से आंदोलन की दिशा नहीं बदलेगी। संगठन अपनी मांगों को लेकर आगे भी आवाज उठाते रहेंगे।
मंगलवार की पेन डाउन स्ट्राइक को कर्मचारी संगठनों ने आंदोलन का अगला चरण बताया है। इसके बाद संयुक्त एक्शन कमेटी की बैठक होगी, जिसमें भविष्य की रणनीति पर निर्णय लिया जाएगा। संगठनों की ओर से संकेत दिए गए हैं कि यदि सरकार की ओर से मांगों पर ठोस पहल नहीं की गई तो आंदोलन को और व्यापक किया जा सकता है। अगले चरण में विधायकों और मंत्रियों के आवास का घेराव करने की योजना पर भी विचार किया जा रहा है।
हालांकि सरकार ने कर्मचारी संगठनों के इस आंदोलन को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। पंजाब के उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री अमन अरोड़ा ने सोमवार को प्रस्तावित हड़ताल को अवैध बताया। उन्होंने कर्मचारी संगठनों से अपील की कि वे आंदोलन के बजाय बातचीत के रास्ते से अपनी समस्याओं का समाधान निकालें। मंत्री ने कहा कि सरकार कर्मचारियों के हितों को लेकर गंभीर है, लेकिन उसे प्रदेश की पूरी आबादी के हितों को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
अमन अरोड़ा के अनुसार पंजाब सरकार के लिए करीब तीन करोड़ लोगों को जरूरी सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध कराना प्राथमिक जिम्मेदारी है। यदि किसी हड़ताल के कारण आवश्यक सेवाएं बाधित होती हैं और आम लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है, तो सरकार कानून के मुताबिक कार्रवाई कर सकती है। उन्होंने कर्मचारी संगठनों से अपील की कि वे राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल होने से बचें और सरकार के साथ संवाद कायम रखें।
मंत्री ने यह भी कहा कि 17 जुलाई 2020 के बाद भर्ती किए गए लगभग 85 हजार कर्मचारियों की डीए से जुड़ी मांग पर सरकार ने पहले ही निर्णय ले लिया है। इन कर्मचारियों का डीए 42 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत किए जाने की व्यवस्था प्रस्तावित है। सरकार के मुताबिक यह कदम संबंधित कर्मचारियों को राहत देने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
इसके अलावा सरकार ने यह संकेत भी दिया है कि बाकी कर्मचारियों के मामले में भी वह केंद्रीय कर्मचारियों के अनुरूप वास्तविक वेतन सुनिश्चित करने पर विचार कर सकती है। हालांकि इसके लिए कानूनी प्रावधानों और राज्य की वित्तीय क्षमता को ध्यान में रखना जरूरी होगा। सरकार का कहना है कि किसी भी निर्णय को आर्थिक और कानूनी सीमाओं के भीतर ही लागू किया जा सकता है।
डीए और उससे जुड़े बकाये का मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है। अमन अरोड़ा ने कहा कि सरकार अपना पक्ष सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रख चुकी है और अदालत की ओर से आने वाले फैसले का पालन किया जाएगा। सरकार के मुताबिक डीए तथा अन्य बकाये से जुड़े व्यापक मामले में न्यायिक प्रक्रिया का भी महत्वपूर्ण स्थान है, इसलिए अंतिम स्थिति अदालत के निर्णय के बाद ही स्पष्ट होगी।
मंत्री ने पंजाब की आर्थिक स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि राज्य के राजस्व पर कर्मचारियों और पेंशनरों से संबंधित खर्च का काफी दबाव है। उनके अनुसार पंजाब अपनी कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग 51 प्रतिशत हिस्सा वेतन और पेंशन पर खर्च करता है, जबकि अखिल भारतीय औसत करीब 38 प्रतिशत है। उन्होंने दावा किया कि बड़े राज्यों में पंजाब का यह अनुपात सबसे अधिक है।
सरकार के सामने ब्याज और अन्य प्रतिबद्ध देनदारियों का भी दबाव है। अमन अरोड़ा के अनुसार ब्याज सहित राज्य की प्रतिबद्ध देनदारियां राजस्व प्राप्तियों के करीब 82 प्रतिशत तक पहुंचती हैं। ऐसे वित्तीय हालात में कर्मचारियों और पेंशनरों की सभी मांगों को एक साथ पूरा करना सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।
सरकार का कहना है कि कर्मचारियों और पेंशनरों के जो बकाये स्वीकृत हो चुके हैं, उन्हें चुकाने के लिए एक व्यवस्थित व्यवस्था बनाई गई है। सरकार वित्तीय संसाधनों और कानूनी स्थिति को ध्यान में रखते हुए बकाया भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कह रही है।
दूसरी ओर, कर्मचारी संगठनों का कहना है कि वित्तीय कठिनाइयों का हवाला देकर लंबे समय से लंबित मांगों को टाला नहीं जा सकता। संगठनों के मुताबिक कर्मचारी अपने अधिकारों और पहले से चली आ रही मांगों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनका दावा है कि मंगलवार की कार्रवाई केवल शुरुआत है और यदि सरकार ने जल्द समाधान की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाया तो आंदोलन का दायरा बढ़ सकता है।
फिलहाल मंगलवार का दिन पंजाब के सरकारी कर्मचारियों के आंदोलन के लिहाज से अहम माना जा रहा है। पेन डाउन स्ट्राइक, सांकेतिक भूख हड़ताल और विभिन्न सरकारी कार्यालयों में प्रदर्शन के बाद संयुक्त एक्शन कमेटी आगे की रणनीति तय करेगी। ऐसे में आने वाले दिनों में सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच बातचीत होती है या आंदोलन और तेज होता है, इस पर सभी की नजर रहेगी।