पंजाब में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत तैयार की गई मतदाता सूची के ड्राफ्ट में राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा का नाम ‘शिफ्टेड’ यानी दूसरी जगह चले जाने वाले मतदाता के तौर पर दर्ज किए जाने के बाद राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। चड्ढा ने इस मामले को महज प्रशासनिक या लिपिकीय गलती मानने से इनकार करते हुए इसे राजनीतिक प्रतिशोध से जोड़ दिया है। उनका कहना है कि मतदाता सूची में उनके नाम के साथ जिस तरह की कार्रवाई की गई, वह गंभीर सवाल खड़े करती है।
राघव चड्ढा के मुताबिक, उनका वोटर रिकॉर्ड मोहाली में दर्ज है, इसके बावजूद SIR की ड्राफ्ट सूची में उन्हें ‘शिफ्टेड’ दिखाकर नाम हटाया गया। उन्होंने दावा किया कि यह कार्रवाई चुनाव आयोग की निर्धारित प्रक्रिया और दिशा-निर्देशों के अनुरूप नहीं है। चड्ढा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर इस पूरे मामले को सार्वजनिक किया और पूछा कि आखिर उन्हें किस आधार पर दूसरी जगह स्थानांतरित हुआ मतदाता माना गया।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि फिलहाल यह अंतिम मतदाता सूची नहीं है। SIR के तहत जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची पर दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की प्रक्रिया चल रही है। इस दौरान मतदाता अपने नाम, पते या अन्य विवरण से जुड़ी गलतियों को ठीक कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसके बाद आवश्यक जांच और सुधार की प्रक्रिया पूरी होने पर अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाएगी। चड्ढा ने भी कहा है कि वह इस प्रक्रिया के तहत उपलब्ध कानूनी और प्रशासनिक उपायों का इस्तेमाल कर रहे हैं।
‘यह सिर्फ गलती नहीं, राजनीतिक बदले का मामला’
राघव चड्ढा ने आरोप लगाया कि उनके नाम को ‘शिफ्टेड’ के तौर पर चिन्हित किया जाना सामान्य गलती नहीं है। उन्होंने इसे राजनीतिक बदले की भावना से की गई कार्रवाई बताया। उनका सवाल है कि जब उनका मतदाता पहचान पत्र मोहाली में पंजीकृत है, तो फिर उन्हें दूसरी जगह चले जाने वाला मतदाता किस आधार पर घोषित किया गया।
चड्ढा का आरोप है कि इस तरह के सत्यापन और मतदाता सूची से संबंधित प्रक्रियाओं में स्थानीय स्तर से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों तक कई स्तर शामिल होते हैं। ऐसे में उन्होंने यह सवाल उठाया कि उनके नाम के सामने ‘शिफ्टेड’ का उल्लेख किस अधिकारी या स्तर पर किया गया और इसके पीछे आधार क्या था।
राज्यसभा सांसद ने पंजाब की आम आदमी पार्टी सरकार पर भी निशाना साधा। उनका कहना है कि राज्य सरकार के अधीन आने वाले प्रशासनिक ढांचे के जरिए राजनीतिक दबाव बनाया जा सकता है। उन्होंने चुनावी प्रक्रिया में शामिल अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं।
बीएलओ से लेकर निर्वाचन अधिकारियों तक का किया जिक्र
चड्ढा ने अपने आरोपों को विस्तार देते हुए कहा कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में जमीनी स्तर पर बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO से लेकर सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (AERO), निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) और जिला निर्वाचन अधिकारी (DEO) तक अधिकारी शामिल होते हैं।
उनका दावा है कि इन अधिकारियों के माध्यम से मतदाताओं से जुड़े रिकॉर्ड का सत्यापन और सूची तैयार करने का काम आगे बढ़ता है। चड्ढा ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया के दौरान अधिकारियों पर किसी भी तरह का दबाव पड़ना चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता के लिए चिंता का विषय हो सकता है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि चुनावी ड्यूटी से जुड़े कई अधिकारी राज्य सरकार के प्रशासनिक ढांचे से आते हैं। इसी आधार पर उन्होंने आरोप लगाया कि अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव बनाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
चड्ढा का तर्क है कि निचले स्तर के कर्मचारी और अधिकारी अपने प्रशासनिक करियर से जुड़े फैसलों के लिए राज्य सरकार की व्यवस्था पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक नेतृत्व अगर किसी अधिकारी पर दबाव डालता है तो वह चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश हो सकती है।
पंजाब के मुख्य निर्वाचन अधिकारी का भी किया उल्लेख
राघव चड्ढा ने अपने बयान में पंजाब के मुख्य निर्वाचन अधिकारी का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि राज्य में चुनावी प्रक्रिया के शीर्ष प्रशासनिक स्तर पर पंजाब कैडर के एक IAS अधिकारी मुख्य निर्वाचन अधिकारी के तौर पर जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।
चड्ढा ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार और प्रशासन के बीच इस तरह की व्यवस्था में अधिकारियों को अपने स्थानांतरण, नियुक्ति और भविष्य की पोस्टिंग को लेकर दबाव महसूस हो सकता है। उनका कहना है कि अधिकारी यह जानते हैं कि सरकार के पास उनके प्रशासनिक करियर से जुड़े कई फैसलों पर प्रभाव होता है।
इसी तर्क के आधार पर चड्ढा ने आरोप लगाया कि यदि राजनीतिक दबाव का इस्तेमाल किया जाए तो अधिकारियों के जरिए किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई कराना संभव हो सकता है। हालांकि, ये राघव चड्ढा द्वारा लगाए गए आरोप हैं और उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों या पंजाब सरकार की ओर से कोई विस्तृत जवाब सामने नहीं आया है।
SIR की प्रक्रिया में अभी सुधार का मौका
इस विवाद के बीच यह बात महत्वपूर्ण है कि SIR के तहत तैयार की गई सूची अभी ड्राफ्ट चरण में है। इसका मतलब है कि किसी व्यक्ति का नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं होना अंतिम रूप से मतदाता सूची से बाहर होना नहीं माना जाता। संबंधित मतदाता दावे और आपत्तियों के जरिए अपने रिकॉर्ड को दुरुस्त कराने की प्रक्रिया में हिस्सा ले सकते हैं।
राघव चड्ढा ने भी इस प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा है कि उन्हें इस बात की जानकारी है कि यह अंतिम सूची नहीं है। उन्होंने बताया कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत वह अपने नाम से जुड़ी आपत्ति और सुधार का रास्ता अपना रहे हैं।
इसके बावजूद उनका कहना है कि मामला केवल नाम वापस जोड़ने तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, असली सवाल यह है कि उनका नाम ‘शिफ्टेड’ के रूप में दर्ज करने का फैसला किस आधार पर लिया गया और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है।
अंतिम सूची अक्टूबर में आने की बात
SIR के तहत जारी ड्राफ्ट सूची के बाद अब दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया पूरी की जानी है। इसके बाद रिकॉर्ड का सत्यापन और आवश्यक सुधार किया जाएगा। चड्ढा के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची अक्टूबर 2026 में प्रकाशित की जानी है।
इस दौरान जिन मतदाताओं को अपने नाम, पते या मतदाता रिकॉर्ड में किसी प्रकार की गड़बड़ी नजर आती है, वे निर्धारित प्रक्रिया के तहत आपत्ति या सुधार के लिए आवेदन कर सकते हैं। इसलिए फिलहाल राघव चड्ढा का नाम ड्राफ्ट सूची से हटना अंतिम स्थिति नहीं है।
फिर भी इस मामले ने पंजाब की राजनीति में नया विवाद पैदा कर दिया है। चड्ढा ने इसे सीधे राजनीतिक प्रतिशोध से जोड़ते हुए राज्य सरकार की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। उनके आरोपों के बाद अब यह मुद्दा केवल मतदाता सूची में नाम की तकनीकी गड़बड़ी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और प्रशासनिक अधिकारियों पर कथित दबाव के सवाल से भी जुड़ गया है।
चड्ढा ने मांगा कार्रवाई का आधार
राघव चड्ढा का मुख्य सवाल यही है कि जब उनका मतदाता पंजीकरण मोहाली में है और वह पंजाब से राज्यसभा सांसद हैं, तो फिर SIR के ड्राफ्ट में उन्हें ‘शिफ्टेड’ क्यों दिखाया गया। उन्होंने इस कार्रवाई के पीछे इस्तेमाल किए गए सत्यापन और रिकॉर्ड की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसकी स्पष्ट जानकारी सामने आनी चाहिए।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यदि यह महज रिकॉर्ड से जुड़ी गलती है तो उसे आसानी से सुधारा जा सकता है, लेकिन यदि किसी व्यक्ति को जानबूझकर ‘शिफ्टेड’ के रूप में चिह्नित किया गया है तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम ने पंजाब में मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक बहस तेज कर दी है। एक तरफ SIR की प्रक्रिया के तहत ड्राफ्ट सूची में सुधार के लिए निर्धारित व्यवस्था मौजूद है, वहीं दूसरी ओर राघव चड्ढा ने इस मामले को राजनीतिक बदले से जोड़कर प्रशासनिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
अब नजर इस बात पर रहेगी कि दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राघव चड्ढा का नाम अंतिम मतदाता सूची में किस स्थिति में दर्ज होता है और उनके द्वारा लगाए गए राजनीतिक दबाव के आरोपों पर पंजाब सरकार तथा संबंधित चुनावी अधिकारियों की ओर से क्या प्रतिक्रिया सामने आती है।