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पंजाब चुनाव में बकाया DA पर घमासान, कर्मचारियों को साधने में जुटीं पार्टियां; मान सरकार के सामने बड़ी चुनौती

पंजाब की राजनीति में विधानसभा चुनाव से पहले कई मुद्दे तेजी से आकार ले रहे हैं। नशे और अपराध के अलावा भ्रष्टाचार, कानून-व्यवस्था और विकास के सवाल तो पहले से ही राजनीतिक बहस का हिस्सा हैं, लेकिन सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों का वर्षों से लंबित महंगाई भत्ता यानी DA अब एक ऐसा मुद्दा बनता दिखाई दे रहा है, जिसे कोई भी राजनीतिक दल नजरअंदाज करने की स्थिति में नहीं है। अलग-अलग पार्टियां कर्मचारियों के बीच अपनी पैठ मजबूत करने के लिए इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा रही हैं।

बकाया DA को लेकर पंजाब सरकार और कर्मचारी संगठनों के बीच लंबे समय से खींचतान चल रही है। एक तरफ सरकार आर्थिक स्थिति का हवाला देकर चरणबद्ध भुगतान की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ कर्मचारी और विपक्षी दल तत्काल भुगतान की मांग पर अड़े हुए हैं। ऐसे में चुनाव नजदीक आने के साथ यह विवाद और ज्यादा राजनीतिक रंग ले सकता है।

लाखों कर्मचारी-पेंशनर सीधे प्रभावित

DA विवाद का दायरा छोटा नहीं है। पंजाब में लगभग 3.25 लाख सरकारी कर्मचारी हैं, जबकि करीब 4 लाख पेंशनर हैं। यानी कर्मचारियों और पेंशनरों का यह पूरा वर्ग मिलाकर करीब सवा सात लाख लोगों का बनता है। इनके परिवारों को जोड़ दिया जाए तो राजनीतिक प्रभाव और भी बड़ा हो जाता है।

यही वजह है कि राजनीतिक दल इस वर्ग को चुनावी दृष्टि से महत्वपूर्ण मान रहे हैं। कर्मचारी वर्ग का एक बड़ा हिस्सा संगठित है और अपनी मांगों को लेकर लगातार सरकार पर दबाव बनाता रहा है। यदि चुनाव से पहले बकाया DA का समाधान नहीं निकलता, तो विपक्ष के पास सरकार को घेरने के लिए एक मजबूत मुद्दा तैयार रहेगा।

राजनीतिक मामलों के जानकार हरबंस सिंह का मानना है कि कर्मचारियों और पेंशनरों से जुड़ा यह मामला सीधे तौर पर एक बड़े मतदाता वर्ग को प्रभावित करता है। उनके अनुसार, फिलहाल विपक्षी दल कर्मचारी आंदोलनों में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। ऐसे में यदि सरकार समय रहते बकाये का समाधान नहीं करती तो आगामी चुनाव में हर पार्टी इसे अपने घोषणा पत्र और चुनाव प्रचार का हिस्सा बना सकती है।

2016 से चला आ रहा भुगतान का विवाद

सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों के DA का एक बड़ा हिस्सा वर्ष 2016 से लंबित बताया जाता है। छठे वेतन आयोग से संबंधित बकाये की कुल देनदारी करीब 14,191 करोड़ रुपये आंकी गई थी। इस भारी भरकम राशि को एक साथ चुकाना सरकार के लिए आसान नहीं था। इसी को देखते हुए पंजाब सरकार ने फरवरी 2025 में पांच वित्तीय वर्षों में भुगतान करने के लिए एक लिक्विडेशन प्लान तैयार किया।

सरकार का कहना है कि इस योजना के तहत अब तक करीब 4,500 करोड़ रुपये कर्मचारियों को दिए जा चुके हैं। इसके बाद भी लगभग 9,691 करोड़ रुपये की राशि का भुगतान किया जाना बाकी है। यही लंबित रकम अब राजनीतिक बहस का केंद्र बनती जा रही है।

विपक्ष का आरोप है कि कर्मचारियों को उनका हक मिलने में लगातार देरी हो रही है। वहीं सरकार का तर्क है कि इतनी बड़ी वित्तीय देनदारी को एक साथ पूरा करना राज्य की आर्थिक स्थिति को देखते हुए संभव नहीं है। सरकार चरणबद्ध तरीके से भुगतान करने की नीति पर आगे बढ़ने की बात कह रही है।

हाईकोर्ट के आदेश के बाद मामला और गंभीर

DA विवाद में इस साल एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ भी आया। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने 3 अगस्त को सरकार के लिक्विडेशन प्लान को खारिज कर दिया। अदालत ने लंबित बकाये का भुगतान 15 दिनों के भीतर करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही देरी होने की स्थिति में 6 प्रतिशत ब्याज देने और गैर-जरूरी सरकारी खर्चों पर रोक लगाने की बात भी कही गई।

अदालत के इस आदेश के बाद सरकार के सामने आर्थिक और कानूनी दोनों स्तर पर चुनौती खड़ी हो गई। सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश को लागू करने के बजाय इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का रास्ता चुना। पंजाब सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन यानी SLP दाखिल की गई है।

सरकार का कहना है कि हाईकोर्ट के निर्देश के मुताबिक इतनी बड़ी रकम कम समय में जारी करना वित्तीय दृष्टि से कठिन है और इसके साथ कानूनी पहलू भी जुड़े हुए हैं। अब आगे की तस्वीर सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से काफी हद तक साफ होगी।

2021 के बाद की DA किस्तों पर भी विवाद

पुराना बकाया ही एकमात्र समस्या नहीं है। 1 जुलाई 2021 के बाद जारी होने वाली DA और DR यानी महंगाई राहत की किस्तों को लेकर भी कर्मचारियों और सरकार के बीच मतभेद बने हुए हैं। इसका मतलब है कि कर्मचारियों की आर्थिक मांगों का दायरा केवल पुराने बकाये तक सीमित नहीं है, बल्कि बाद की किस्तों का मुद्दा भी लगातार जुड़ता गया है।

कर्मचारी संगठन चाहते हैं कि पुराने बकाये के साथ नई देय किस्तों का भी स्पष्ट समाधान निकाला जाए। दूसरी तरफ सरकार अपनी वित्तीय क्षमता के हिसाब से फैसले लेने की बात करती रही है। यही अंतर अब राजनीतिक पार्टियों को सरकार पर निशाना साधने का मौका दे रहा है।

मान सरकार की रणनीति क्या है?

आम आदमी पार्टी की सरकार के लिए यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि चुनाव से पहले वह कर्मचारियों के बीच नाराजगी कम करना चाहेगी। वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा का कहना है कि कर्मचारियों को केंद्र सरकार के बराबर DA का लाभ दिलाना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।

सरकार ने जुलाई 2020 के बाद भर्ती हुए कर्मचारियों का DA 42 प्रतिशत से बढ़ाकर 60 प्रतिशत करने का फैसला किया है। सरकार इसे कर्मचारियों के हित में उठाया गया बड़ा कदम बता रही है। इसके अलावा राज्य सरकार का कहना है कि वह केंद्रीय कर्मचारियों के समान वेतन और DA से जुड़े लाभ देने की दिशा में भी काम कर रही है।

चीमा के अनुसार, कर्मचारियों से संबंधित मामलों को एक साथ हल करने के बजाय सरकार चरणबद्ध तरीके से फैसले ले रही है। सरकार ने बातचीत के जरिए बाकी मांगों पर भी समाधान निकालने का भरोसा दिया है।

हालांकि विपक्ष इस रणनीति को पर्याप्त नहीं मान रहा है। उसका कहना है कि चुनिंदा वर्ग के लिए DA बढ़ाने से वर्षों से लंबित बकाये का सवाल खत्म नहीं होता।

कांग्रेस ने सरकार पर साधा निशाना

पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने सरकार के रुख को कर्मचारियों के प्रति नकारात्मक बताया है। उनका कहना है कि कर्मचारियों का बकाया DA तत्काल जारी किया जाना चाहिए।

वड़िंग के मुताबिक कर्मचारियों की मांग जायज है और हाईकोर्ट भी सरकार को भुगतान का निर्देश दे चुका है। उनका आरोप है कि सरकार भुगतान करने के बजाय मामले को सुप्रीम कोर्ट ले जाकर कर्मचारियों को लंबी कानूनी प्रक्रिया में फंसा रही है।

कांग्रेस इस मुद्दे को सरकार के खिलाफ कर्मचारी विरोधी रवैये के तौर पर पेश करने की तैयारी में दिखाई दे रही है। यदि चुनाव तक भुगतान का विवाद कायम रहता है, तो कांग्रेस के लिए यह कर्मचारियों के बीच सरकार की नीतियों पर सवाल उठाने का प्रमुख आधार बन सकता है।

भाजपा ने भी सरकार को घेरा

पंजाब भाजपा अध्यक्ष केवल सिंह ढिल्लों ने भी DA को लेकर सरकार पर निशाना साधा है। उनका आरोप है कि सरकार कर्मचारियों को अलग-अलग वर्गों में बांटने की कोशिश कर रही है।

ढिल्लों का कहना है कि सरकार पहले वेतन असमानता से जुड़े मामले में कानूनी लड़ाई हार चुकी है और अब DA के मुद्दे पर भी कर्मचारियों के बीच अंतर पैदा किया जा रहा है। भाजपा का तर्क है कि कुछ कर्मचारियों के लिए 60 प्रतिशत DA की घोषणा करना अदालत के निर्देशों को लागू करने या पुराने DA और DR के बकाये का भुगतान करने का विकल्प नहीं हो सकता।

भाजपा इस मुद्दे को कर्मचारी हितों से जोड़कर सरकार को घेर रही है और आने वाले चुनाव में इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनाने की कोशिश कर सकती है।

अकाली दल ने भी किया बड़ा वादा

शिरोमणि अकाली दल भी इस मामले में पीछे नहीं है। पार्टी अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल ने सरकार से कर्मचारियों और पेंशनरों का लंबित DA तुरंत जारी करने की मांग की है।

बादल का कहना है कि सरकार कर्मचारियों के जायज बकाये को रोककर उनके साथ अन्याय कर रही है। उनके मुताबिक हाईकोर्ट के स्पष्ट आदेश के बाद भी भुगतान में देरी करना उचित नहीं है। उन्होंने सरकार के सुप्रीम कोर्ट जाने के कदम पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि इससे मामला और लंबा खिंच सकता है।

अकाली दल ने सत्ता में लौटने की स्थिति में लंबित DA जारी करने के साथ पुरानी पेंशन योजना बहाल करने का भी वादा किया है। इस तरह पार्टी कर्मचारी वर्ग के बीच अपने पुराने समर्थन आधार को मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

चुनावी गणित में क्यों अहम है DA?

पंजाब में सरकारी कर्मचारियों और पेंशनरों की संख्या को देखते हुए DA का मुद्दा किसी एक संगठन या विभाग तक सीमित नहीं है। करीब सवा सात लाख कर्मचारी-पेंशनर सीधे तौर पर इससे प्रभावित हैं। इनके परिवारों को जोड़ने पर यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है।

यही कारण है कि चुनावी साल में DA केवल आर्थिक मांग नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक प्रभाव वाला विषय बन जाता है। कर्मचारी संगठनों का समर्थन हासिल करना किसी भी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि सरकार चुनाव से पहले भुगतान को लेकर कोई ठोस समाधान निकाल लेती है तो वह इसे अपनी उपलब्धि के तौर पर पेश कर सकती है। लेकिन यदि विवाद जस का तस रहता है तो विपक्ष इसे सरकार की विफलता के रूप में प्रचारित कर सकता है।

सरकार के सामने दोहरी चुनौती

मान सरकार के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह वित्तीय दबाव और कर्मचारियों की नाराजगी के बीच संतुलन कैसे बनाती है। एक ओर हजारों करोड़ रुपये के बकाये का भुगतान करना है, वहीं दूसरी ओर राज्य के बजट पर इसका सीधा असर पड़ेगा।

इसके अलावा हाईकोर्ट के आदेश और सुप्रीम कोर्ट में लंबित कानूनी प्रक्रिया भी मामले को संवेदनशील बनाती है। सरकार के लिए केवल राजनीतिक घोषणा करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि कर्मचारियों को भुगतान की स्पष्ट समयसीमा और भरोसेमंद रोडमैप देना भी जरूरी होगा।

आगे क्या होगा?

आने वाले महीनों में DA का मुद्दा पंजाब की चुनावी राजनीति में और गर्म होने की संभावना है। कांग्रेस, भाजपा और अकाली दल पहले ही सरकार पर दबाव बना रहे हैं। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी सरकार कर्मचारियों को केंद्र के बराबर DA और वेतन संबंधी लाभ देने की दिशा में कदम उठाने का दावा कर रही है।

अब असली सवाल यह है कि क्या सरकार चुनाव से पहले पुराने बकाये का कोई बड़ा हिस्सा जारी कर कर्मचारियों की नाराजगी दूर कर पाएगी, या फिर अदालत की प्रक्रिया के कारण मामला आगे खिंचेगा। यदि भुगतान को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं होती है तो विरोधी दल इसे अपने चुनावी अभियान का केंद्रीय मुद्दा बना सकते हैं।

पंजाब में चुनावी मुद्दों की फेहरिस्त लंबी है, लेकिन DA ऐसा विषय है जिसका सीधा असर लाखों परिवारों की जेब और भविष्य से जुड़ा है। इसलिए आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार इस आर्थिक विवाद को प्रशासनिक स्तर पर सुलझाती है या फिर यह मुद्दा चुनावी मंच पर राजनीतिक टकराव का बड़ा हथियार बन जाता है।