पंजाब की पहचान लंबे समय से कृषि प्रधान राज्य के रूप में रही है, लेकिन बदलते फसल पैटर्न और खेती की बढ़ती लागत ने कई पारंपरिक फसलों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। गन्ने की खेती भी अब इसी संकट से गुजर रही है। राज्य में पिछले कुछ वर्षों के दौरान गन्ने के उत्पादन में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिला है और ताजा आंकड़े चिंता बढ़ाने वाले हैं। गन्ना विकास निदेशालय की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025-26 में पंजाब में गन्ने का उत्पादन घटकर 69.1 लाख टन रह गया। छह साल के आंकड़ों को देखें तो कुल मिलाकर उत्पादन में करीब 7.74 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई है।
गन्ने की खेती में यह गिरावट ऐसे समय में सामने आई है, जब सरकार फसल विविधीकरण को बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है। पंजाब में धान और गेहूं के पारंपरिक फसल चक्र से बाहर निकलकर किसानों को दूसरी फसलों की ओर लाने की कोशिश लंबे समय से की जा रही है। गन्ना इस दिशा में एक अहम फसल माना जाता है। हालांकि, किसानों की घटती रुचि और खेती से जुड़ी व्यावहारिक परेशानियों के कारण इस क्षेत्र में सरकार को अपेक्षित सफलता नहीं मिल पा रही है।
छह साल के आंकड़ों में लगातार उतार-चढ़ाव
गन्ने के उत्पादन के आंकड़ों पर नजर डालें तो पंजाब में पिछले कुछ वर्षों के दौरान स्थिति स्थिर नहीं रही। वर्ष 2020-21 में राज्य में करीब 74.9 लाख टन गन्ने का उत्पादन हुआ था। इसके अगले साल यानी 2021-22 में यह आंकड़ा घटकर 71.3 लाख टन रह गया। इसके बाद 2022-23 और 2023-24 में उत्पादन में सुधार हुआ और यह करीब 75.1 लाख टन तक पहुंच गया।
हालांकि, यह बढ़ोतरी लंबे समय तक कायम नहीं रह सकी। वर्ष 2024-25 में गन्ने का उत्पादन फिर घटकर 72.8 लाख टन रह गया। इसके बाद 2025-26 में इसमें और गिरावट आई और उत्पादन 69.1 लाख टन तक पहुंच गया। उपलब्ध आंकड़ों में यह हाल के वर्षों का सबसे निचला स्तर है।
उत्पादन में कमी केवल किसानों की आय से जुड़ा मुद्दा नहीं है। इसका सीधा असर चीनी मिलों की गतिविधियों और बाजार में चीनी की उपलब्धता पर भी पड़ सकता है। यदि गन्ने का रकबा और उत्पादन लगातार कम होता रहा तो आने वाले समय में चीनी उद्योग के लिए कच्चे माल की उपलब्धता प्रभावित होने की आशंका बढ़ सकती है।
किसानों का गन्ने से मोहभंग क्यों?
कृषि विशेषज्ञों के मुताबिक गन्ने की खेती से किसानों के पीछे हटने के कई कारण हैं। सबसे बड़ी समस्या फसल के भुगतान में होने वाली देरी को माना जा रहा है। किसान लंबे समय तक अपनी फसल के पैसे का इंतजार करता है तो उसके लिए अगली फसल की तैयारी और घरेलू खर्च संभालना मुश्किल हो जाता है।
पंजाब विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और कृषि विशेषज्ञ विनोद कुमार चौधरी के अनुसार, गन्ना किसानों के लिए समय पर भुगतान बेहद महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक भुगतान में देरी के साथ-साथ खेतों में काम करने वाले मजदूरों की कमी और खेती की बढ़ती लागत ने भी किसानों की परेशानी बढ़ाई है।
गन्ने की कटाई में बड़ी संख्या में मजदूरों की जरूरत होती है। मजदूरी महंगी होने और समय पर श्रमिक उपलब्ध नहीं होने की वजह से किसानों की लागत बढ़ती जा रही है। इसके मुकाबले धान और गेहूं जैसी फसलों में किसानों को अपेक्षाकृत स्थापित व्यवस्था मिलती है। ऐसे में कई किसान गन्ने के बजाय उन्हीं फसलों की ओर लौट रहे हैं।
घटते भूजल के बीच फसल चयन भी अहम
पंजाब में भूजल स्तर का गिरना पहले से ही गंभीर चिंता का विषय है। ऐसे में फसल विविधीकरण को सिर्फ किसानों की आय बढ़ाने के नजरिए से नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण से जोड़कर भी देखा जा रहा है। यदि किसान पारंपरिक धान-गेहूं चक्र से बाहर नहीं निकलते और गन्ने जैसी वैकल्पिक फसलों का रकबा भी कम होता जाता है, तो सरकार की फसल विविधीकरण नीति के सामने चुनौती और बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को किसी फसल की ओर आकर्षित करने के लिए सिर्फ घोषणाएं पर्याप्त नहीं हैं। उन्हें बाजार, भुगतान, लागत और फसल की बिक्री से जुड़ी ठोस व्यवस्था भी उपलब्ध करानी होगी। गन्ना किसानों के लिए समय पर भुगतान की गारंटी इस दिशा में सबसे महत्वपूर्ण कदमों में से एक हो सकती है।
सरकार की ओर से कई योजनाओं पर जोर
कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री गुरमीत सिंह खुड्डियां के मुताबिक पंजाब सरकार गन्ना किसानों को बेहतर मूल्य देने की नीति पर काम कर रही है और आगे भी किसानों के हितों को प्राथमिकता दी जाएगी। सरकार की ओर से गन्ने की खेती को प्रोत्साहित करने के लिए कई स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं।
इनमें उन्नत किस्म के बीज उपलब्ध कराना, सब्सिडी के माध्यम से कृषि मशीनरी मुहैया करवाना, उर्वरक और कृषि रसायनों की उपलब्धता, खरपतवार एवं कीट नियंत्रण संबंधी सहायता, मिट्टी की जांच और किसानों के लिए जागरूकता शिविर शामिल हैं। इसके अलावा किसानों को नई तकनीकों और बेहतर कृषि पद्धतियों की जानकारी देने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी आयोजित किए जा रहे हैं।
सरकार का उद्देश्य किसानों को आधुनिक तकनीक से जोड़कर उत्पादन बढ़ाना और खेती को अधिक लाभकारी बनाना है। हालांकि, इन प्रयासों का असर जमीन पर कितना दिखाई देता है, यह आने वाले वर्षों के उत्पादन और गन्ने के रकबे से स्पष्ट होगा।
चीनी की कीमतों में तेजी ने बढ़ाई परेशानी
एक तरफ गन्ने का उत्पादन घट रहा है तो दूसरी ओर बाजार में चीनी की कीमतों को लेकर भी उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ी है। कारोबारियों के मुताबिक हाल के दिनों में चीनी के दाम में तेजी देखने को मिली है। इससे घरेलू बजट पर सीधा असर पड़ रहा है।
स्थानीय दुकानदारों का कहना है कि चीनी के दाम में लगातार बदलाव हो रहा है। कुछ कारोबारियों के मुताबिक करीब एक महीने पहले जिस चीनी की कीमत लगभग 45 रुपये प्रति किलो के आसपास थी, उसकी कीमत अब बढ़कर करीब 70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। हालांकि बाजार में अलग-अलग गुणवत्ता और क्षेत्र के हिसाब से कीमतों में अंतर हो सकता है।
दुकानदार महेश का कहना है कि चीनी की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से आम परिवारों का रसोई बजट प्रभावित हो रहा है। उनका मानना है कि कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार को प्रभावी कदम उठाने चाहिए, ताकि उपभोक्ताओं को राहत मिल सके।
जमाखोरी पर सरकार की निगरानी बढ़ी
चीनी के दाम बढ़ने के बीच पंजाब सरकार ने जमाखोरी और कालाबाजारी पर भी नजर कड़ी कर दी है। सरकार की ओर से चीनी के स्टॉक और बाजार में उसकी उपलब्धता की निगरानी बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं।
नए प्रावधानों के तहत किसी कारोबारी को एक स्थान पर 4,000 क्विंटल से अधिक चीनी का स्टॉक रखने की अनुमति नहीं होगी। इसके साथ ही खरीदी गई चीनी को 30 दिन से ज्यादा समय तक रखने पर भी रोक रहेगी। यह व्यवस्था 30 नवंबर 2026 तक लागू रहने की बात कही गई है।
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री लालचंद कटारूचक ने अधिकारियों को चीनी की उपलब्धता, स्टॉक और बाजार में आपूर्ति की नियमित निगरानी करने के निर्देश दिए हैं। सरकार का कहना है कि आम लोगों को पर्याप्त मात्रा में चीनी उपलब्ध कराना उसकी प्राथमिकता है।
एथेनॉल बनाम चीनी उत्पादन का मुद्दा
चीनी उद्योग में एथेनॉल उत्पादन को लेकर भी बहस तेज हुई है। शूगरफेड के अध्यक्ष नवदीप जीदा के अनुसार सरकारी चीनी मिलें उपभोक्ताओं के हितों को ध्यान में रखते हुए चीनी उत्पादन को प्राथमिकता दे रही हैं। उनका आरोप है कि निजी मिलों में आर्थिक लाभ को देखते हुए एथेनॉल उत्पादन पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, जिससे बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।
उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार की ओर से पंजाब को एथेनॉल प्लांट स्थापित करने से संबंधित योजना भी दी गई थी। इसमें परियोजना की लागत का 90 प्रतिशत केंद्र और 10 प्रतिशत राज्य सरकार द्वारा वहन किए जाने का प्रस्ताव बताया गया। हालांकि, पंजाब सरकार ने लोगों के हित को ध्यान में रखते हुए चीनी उत्पादन को प्राथमिकता देने का फैसला किया और इस योजना को आगे नहीं बढ़ाया।
आगे क्या है रास्ता?
पंजाब में गन्ने की खेती को दोबारा मजबूत करने के लिए सिर्फ उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। किसानों को समय पर भुगतान, मजदूरों की उपलब्धता, मशीनरी की सुविधा और बेहतर बाजार व्यवस्था उपलब्ध करानी होगी। साथ ही उन्हें यह भरोसा भी दिलाना होगा कि गन्ने की खेती दूसरी प्रमुख फसलों के मुकाबले आर्थिक रूप से व्यवहार्य है।
यदि गन्ने का रकबा और उत्पादन इसी तरह कम होता रहा तो इसका असर सिर्फ किसानों तक सीमित नहीं रहेगा। चीनी मिलों, उद्योग और आम उपभोक्ताओं पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। दूसरी तरफ चीनी की कीमतों में तेजी और जमाखोरी की आशंका बाजार के लिए अतिरिक्त चुनौती बन सकती है।
ऐसे में पंजाब के सामने दोहरी चुनौती है, एक ओर किसानों को गन्ने की खेती के लिए प्रोत्साहित करना और दूसरी ओर बाजार में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता तथा उचित कीमत सुनिश्चित करना। आने वाले समय में सरकार की नीतियां और किसानों को मिलने वाली सुविधाएं तय करेंगी कि पंजाब गन्ने की खेती में आई गिरावट को रोक पाता है या नहीं।