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The Scoopp

 

पंजाब में बिजली संकट गहराया: कम बारिश से बढ़ी खपत, कई यूनिट बंद; उद्योगों पर 10 घंटे तक कट

पंजाब में सितंबर के दौरान बिजली की बढ़ती खपत और उत्पादन में आई कमी ने राज्य के पावर सेक्टर पर दबाव बढ़ा दिया है। कम मानसूनी बारिश के कारण खेती के लिए ट्यूबवेलों पर निर्भरता बढ़ी है, वहीं उमस और गर्मी की वजह से घरेलू बिजली की जरूरत भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई है। दूसरी तरफ थर्मल प्लांटों की कुछ यूनिटें तकनीकी कारणों से बंद हैं और कई संयंत्रों में कोयले का स्टॉक भी चिंता का विषय बन गया है।

इस स्थिति का असर बिजली आपूर्ति पर साफ दिखाई दे रहा है। उद्योगों को कई घंटे तक बिजली कटौती का सामना करना पड़ रहा है, जबकि ग्रामीण और कृषि क्षेत्रों में भी सप्लाई सीमित की जा रही है। बिजली की उपलब्धता और मांग के बीच बढ़ता अंतर पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड यानी पावरकाम के लिए बड़ी चुनौती बन गया है।

रिकॉर्ड स्तर पर पहुंची बिजली की जरूरत

सितंबर में पंजाब की बिजली खपत लगातार ऊंची बनी हुई है। छह सितंबर को छोड़ दें तो महीने के लगभग हर दिन मांग 16 हजार मेगावाट से ऊपर दर्ज की गई। एक सितंबर को बिजली की मांग 16,116 मेगावाट थी। दो सितंबर को यह बढ़कर 16,530 मेगावाट पहुंच गई। तीन सितंबर को 16,485, चार को 16,182 और पांच सितंबर को 16,254 मेगावाट मांग रही।

इसके बाद सात सितंबर को मांग 16,219 मेगावाट रही। आठ और नौ सितंबर को यह आंकड़ा 16,505 मेगावाट तक पहुंच गया। 10 सितंबर को 16,432, 11 सितंबर को 16,619 और 12 सितंबर को 16,519 मेगावाट बिजली की जरूरत रही।

12 सितंबर को करीब 16,519 मेगावाट की मांग के सामने पावरकाम को सभी स्रोतों से लगभग 4,503 मेगावाट बिजली ही उपलब्ध हो सकी। उत्पादन में करीब 2,173 मेगावाट की कमी रही। ऐसे में मांग पूरी करने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में कटौती का सहारा लेना पड़ा।

बारिश कम होने से बिजली की खपत पर दोहरा असर

इस साल मानसून पंजाब के लिए कमजोर साबित हुआ है। राज्य में अब तक सामान्य बारिश की तुलना में करीब 40 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज हुई है। सामान्य तौर पर 402.9 मिलीमीटर बारिश के मुकाबले इस बार करीब 243.5 मिलीमीटर बारिश ही हुई।

सितंबर की स्थिति और भी खराब है। इस महीने अब तक सामान्य 34.5 मिलीमीटर बारिश होनी चाहिए थी, लेकिन सिर्फ 12.9 मिलीमीटर बारिश हुई। यानी सितंबर में वर्षा करीब 63 प्रतिशत कम है। जुलाई में भी बारिश सामान्य से 26 प्रतिशत कम थी, जबकि अगस्त में 35 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी।

कम बारिश का सीधा असर खेती पर पड़ा है। खेतों में नमी की कमी के कारण किसान सिंचाई के लिए ट्यूबवेलों पर ज्यादा निर्भर हैं। इससे कृषि क्षेत्र की बिजली मांग बढ़ गई है। दूसरी तरफ उमस भरे मौसम के कारण घरों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में पंखे, कूलर और एयर कंडीशनर का इस्तेमाल बढ़ने से घरेलू मांग भी कम नहीं हो रही।

कई जिलों में बारिश की भारी कमी

राज्य के अधिकांश हिस्सों में मानसून की स्थिति कमजोर रही है। अमृतसर में बारिश सामान्य से करीब 92 प्रतिशत कम बताई गई है। बरनाला में 89 प्रतिशत, बठिंडा में 81 प्रतिशत, फरीदकोट में 97 प्रतिशत और फतेहगढ़ साहिब में 74 प्रतिशत की कमी दर्ज हुई।

फिरोजपुर में सामान्य से करीब 96 प्रतिशत, जालंधर में 84 प्रतिशत, लुधियाना में 82 प्रतिशत, मुक्तसर में 83 प्रतिशत और पटियाला में 70 प्रतिशत कम बारिश हुई। मोहाली में 72 प्रतिशत, एसबीएस नगर में 64 और संगरूर में 62 प्रतिशत की कमी रही। मोगा, फाजिल्का, मानसा, तरनतारन और कपूरथला में सितंबर के दौरान बारिश नहीं हुई।

बांधों में पानी घटा, हाइडल उत्पादन पर असर

कम बारिश का दूसरा बड़ा असर पंजाब के जलविद्युत उत्पादन पर पड़ा है। प्रमुख बांधों में पिछले साल की तुलना में पानी का स्तर काफी नीचे चला गया है। भाखड़ा बांध में पिछले साल इसी समय जलस्तर 1,676.89 फुट था, जो अब घटकर 1,643.98 फुट रह गया है। यानी करीब 32.91 फुट की कमी आई है। यहां पानी की आवक भी 46,708 क्यूसिक से घटकर करीब 30,199 क्यूसिक रह गई।

पौंग बांध में भी जलस्तर करीब 17.91 फुट कम होकर 1,372.24 फुट रह गया है। पानी की आवक 34,737 क्यूसिक से गिरकर 10,751 क्यूसिक तक पहुंच गई। रणजीत सागर बांध में जलस्तर 13.05 मीटर नीचे आया है और यह करीब 511.48 मीटर रह गया है। यहां पानी की आवक 18,411 से घटकर सिर्फ 5,181 क्यूसिक रह गई।

पानी की कमी के कारण रणजीत सागर की 300 मेगावाट क्षमता वाली दो यूनिट और यूबीडीसी की 45 मेगावाट क्षमता वाली तीन यूनिट बंद हैं। इससे थर्मल उत्पादन की कमी के साथ हाइडल बिजली का सहारा भी सीमित हो गया है।

थर्मल प्लांटों की यूनिटें भी प्रभावित

पंजाब के बिजली उत्पादन में थर्मल प्लांटों की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन इस समय कई यूनिट पूरी क्षमता से काम नहीं कर रही हैं। राजपुरा थर्मल की 700 मेगावाट क्षमता वाली यूनिट नंबर एक तकनीकी खराबी के कारण बंद है। तलवंडी साबो की 660 मेगावाट क्षमता वाली यूनिट नंबर दो भी उत्पादन से बाहर है।

रोपड़ थर्मल की कुल क्षमता करीब 840 मेगावाट है, लेकिन वहां से लगभग 488 मेगावाट बिजली ही मिल रही है। इसी तरह 920 मेगावाट क्षमता वाले लहरा मुहब्बत प्लांट से लगभग 804 मेगावाट उत्पादन हो रहा है।

पावरकाम अधिकारियों के मुताबिक रोपड़ और लहरा मुहब्बत थर्मल प्लांटों में सर्दियों के दौरान होने वाला वार्षिक रखरखाव नहीं हो सका था। अब तकनीकी दिक्कतों के चलते इन संयंत्रों की उत्पादन क्षमता प्रभावित हो रही है।

चार थर्मल प्लांटों में सीमित कोयला स्टॉक

बिजली संकट के बीच कोयले की उपलब्धता भी चिंता बढ़ा रही है। पंजाब के पांच थर्मल प्लांटों में से चार के पास सीमित दिनों का कोयला बचा है। तलवंडी साबो में लगभग चार दिन, राजपुरा में सात दिन, लहरा मुहब्बत में 11 दिन और गोइंदवाल में करीब 16 दिन का स्टॉक बताया गया है।

केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण के मानकों के अनुसार 1,000 किलोमीटर से अधिक दूरी वाली कोयला खदानों पर निर्भर थर्मल प्लांटों के लिए करीब 30 दिनों का स्टॉक होना चाहिए। पंजाब को कोयला उपलब्ध कराने वाली खदानें लगभग 1,300 से 1,900 किलोमीटर दूर हैं। मानसून से पहले भी ऐसे संयंत्रों में करीब 21 दिनों के स्टॉक की जरूरत मानी जाती है।

ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे कोयला उत्पादक राज्यों में भारी बारिश से खनन और परिवहन प्रभावित होने की वजह से सप्लाई पर असर पड़ा है।

उद्योगों को 10 घंटे तक झेलनी पड़ रही कटौती

उत्पादन और मांग के बीच अंतर का सबसे ज्यादा असर औद्योगिक क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है। कई औद्योगिक इलाकों में बिजली कटौती 10 घंटे तक पहुंच रही है। जिला मुख्यालयों में करीब चार घंटे और ग्रामीण इलाकों में लगभग एक घंटे तक कट लगाए जा रहे हैं।

कृषि क्षेत्र को भी पर्याप्त बिजली नहीं मिल पा रही। खेती के लिए उपलब्ध सप्लाई करीब तीन से साढ़े चार घंटे तक सीमित होने की बात सामने आई है। इससे किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। किसान संगठनों ने बिजली आपूर्ति के मुद्दे पर आंदोलन की चेतावनी दी है, जबकि विपक्षी दल भी सरकार से जवाब मांग रहे हैं।

पावरकाम पर हजारों करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ

बिजली संकट के साथ पावरकाम की आर्थिक स्थिति भी दबाव में है। पंजाब सरकार और उसके विभिन्न विभागों पर पावरकाम का करीब 9,650 करोड़ रुपये बकाया बताया गया है। इसमें लगभग 7,550 करोड़ रुपये बिजली सब्सिडी और करीब 2,100 करोड़ रुपये सरकारी विभागों के बिजली बिल शामिल हैं।

सब्सिडी की रकम में करीब 4,000 करोड़ रुपये पिछले दो वित्तीय वर्षों का ब्याज समेत बकाया है। इसके अलावा 2026-27 के मौजूदा वित्तीय वर्ष की करीब 3,550 करोड़ रुपये की सब्सिडी भी बाकी बताई जा रही है।

जलापूर्ति एवं स्वच्छता विभाग पर करीब 1,000 करोड़, स्थानीय निकाय विभाग पर 850 करोड़, ग्रामीण विकास एवं पंचायत विभाग पर 380 करोड़ और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग पर करीब 125 करोड़ रुपये बकाया हैं। सरकारी विभागों और जरूरी सेवाओं के कनेक्शन काटना व्यावहारिक रूप से आसान नहीं होने के कारण यह राशि पावरकाम की वित्तीय स्थिति पर दबाव डाल रही है।

10 हजार करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी

वित्तीय दबाव के बीच पावरकाम बाजार से करीब 10 हजार करोड़ रुपये जुटाने की तैयारी कर रहा है। बिजली खरीद, कोयले के भुगतान, संयंत्रों की मरम्मत, स्पेयर पार्ट्स, वेतन और दूसरे खर्चों के लिए धन की जरूरत है।

इसके लिए गैर-परिवर्तनीय डिबेंचर और बॉन्ड जारी करने की योजना बनाई जा रही है। मर्चेंट बैंकरों से ऑनलाइन बोलियां भी मांगी गई हैं। पावरकाम पर पहले से करीब 18 हजार करोड़ रुपये की देनदारियां होने की बात सामने आई है। विशेषज्ञों का मानना है कि नए कर्ज के साथ ब्याज का अतिरिक्त भार भविष्य में बिजली उपभोक्ताओं और राज्य के वित्त पर पड़ सकता है।

इंजीनियर्स एसोसिएशन ने जताया 7,800 करोड़ के घाटे का अनुमान

पीएसईबी इंजीनियर्स एसोसिएशन ने भी मौजूदा स्थिति पर चिंता जताई है। एसोसिएशन के महासचिव इंजीनियर अजयपाल सिंह अटवाल के मुताबिक बिजली दरों में कमी के बाद सालाना सब्सिडी बिल करीब 20,500 करोड़ रुपये से घटकर 15,200 करोड़ रुपये के आसपास रह गया है, लेकिन सब्सिडी का भुगतान समय पर नहीं हो रहा।

उनका दावा है कि हालिया एआरआर में खर्च का अनुमान वास्तविक जरूरत से कम रखा गया, जिसके कारण बिजली दरें भी कम तय हुईं। इसके चलते मौजूदा वित्तीय वर्ष में पावरकाम को करीब 7,800 करोड़ रुपये के संभावित राजस्व घाटे का सामना करना पड़ सकता है।

एसोसिएशन ने भविष्य की जरूरतों को देखते हुए रोपड़ में 800-800 मेगावाट की तीन सुपर क्रिटिकल थर्मल यूनिट लगाने और बठिंडा में 250 मेगावाट क्षमता का सोलर प्लांट स्थापित करने की मांग की है। संगठन का कहना है कि बिजली उत्पादन बढ़ाने की जरूरत को लेकर सरकार को पहले भी अवगत कराया गया था, लेकिन अभी तक अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए।

पावरकाम को जल्द राहत की उम्मीद

पावरकाम के डायरेक्टर जनरेशन पीएस बराड़ के अनुसार कम बारिश ने कृषि से लेकर घरेलू क्षेत्र तक बिजली की मांग बढ़ाई है। कोयले की आपूर्ति में तेजी लाने के लिए केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण को पत्र भेजा गया है। कोयला उत्पादक राज्यों में बारिश के कारण खनन और परिवहन प्रभावित हुआ है।

पावरकाम का कहना है कि जिन यूनिटों में तकनीकी खराबी आई है, उनकी जरूरी मरम्मत कर उन्हें जल्द दोबारा उत्पादन में लाने का प्रयास किया जा रहा है। बंद यूनिटों के चालू होने और कोयले की सप्लाई सुधरने के बाद राज्य में बिजली की कमी काफी हद तक कम होने की उम्मीद है।