Skip to main content

The Scoopp

 

पंजाब सरकार का सुप्रीम कोर्ट में बड़ा कदम, DA-DR भुगतान पर हाईकोर्ट के आदेश को दी चुनौती; बताया कितना बढ़ेगा खजाने पर बोझ

पंजाब के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों से जुड़े महंगाई भत्ते (DA) और महंगाई राहत (DR) के मामले में राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पंजाब सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 3 अगस्त को दिए गए फैसले को चुनौती देते हुए विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल की है। सरकार ने शीर्ष अदालत से अपील की है कि हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई जाए और राज्य को पहले से तय भुगतान व्यवस्था के अनुसार बकाया राशि चुकाने की अनुमति दी जाए।

इस मामले में पंजाब सरकार का मुख्य तर्क यह है कि राज्य कर्मचारियों को केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बराबर आर्थिक लाभ देने के लिए केवल DA की प्रतिशत दर को आधार बनाना सही तरीका नहीं है। सरकार का कहना है कि वास्तविक तुलना कर्मचारी की कुल आय यानी उसके हाथ में आने वाले वेतन के आधार पर होनी चाहिए।

राज्य ने सुप्रीम कोर्ट में यह भी स्पष्ट किया है कि वह कर्मचारियों को समान श्रेणी के केंद्रीय कर्मचारियों के बराबर टेक-होम वेतन सुनिश्चित करने के लिए जरूरी सीमा तक DA बढ़ाने के लिए तैयार है। लेकिन केंद्र सरकार की ओर से लागू DA प्रतिशत को बिना किसी अलग गणना के सीधे पंजाब में लागू करने का राज्य ने विरोध किया है।

सरकार ने क्यों उठाया DA प्रतिशत पर सवाल?

पंजाब सरकार ने अपनी याचिका में बताया है कि राज्य और केंद्र के कर्मचारियों के वेतन ढांचे में अंतर है। कुछ पदों पर पंजाब सरकार के कर्मचारियों का मूल वेतन केंद्रीय कर्मचारियों के मुकाबले पहले से ही अधिक है। ऐसी स्थिति में केवल DA प्रतिशत को समान कर देने से दोनों वर्गों के कर्मचारियों के वास्तविक वेतन में बराबरी जरूरी नहीं है।

सरकार का तर्क है कि अगर किसी कर्मचारी का बेसिक पे पहले से अधिक है और उस पर DA की गणना होती है, तो कम प्रतिशत DA मिलने के बावजूद उसकी कुल परिलब्धियां दूसरे कर्मचारी से अधिक हो सकती हैं। इसलिए राज्य के अनुसार तुलना केवल प्रतिशत के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक कुल भुगतान के आधार पर की जानी चाहिए।

इसी दलील को मजबूत करने के लिए पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने सात प्रतिनिधि श्रेणियों से जुड़े आंकड़े भी पेश किए हैं। सरकार का दावा है कि इन सात में से पांच श्रेणियों में 42 प्रतिशत DA मिलने के बावजूद पंजाब के कर्मचारियों की कुल परिलब्धियां संबंधित केंद्रीय कर्मचारियों से अधिक हैं।

बकाया DA-DR देने से सरकार ने इनकार नहीं किया

पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह भी कहा है कि उसने कर्मचारियों और पेंशनभोगियों की बकाया राशि देने से कभी इनकार नहीं किया। राज्य के मुताबिक, भुगतान को लेकर सरकार ने एक व्यवस्थित योजना बनाई है और उसके तहत रकम चरणबद्ध तरीके से जारी की जा रही है।

सरकार ने बताया कि 13 फरवरी 2025 को एक लिक्विडेशन प्लान को मंजूरी दी गई थी। इसी योजना के आधार पर DA और DR से संबंधित बकाया राशि का भुगतान चरणबद्ध तरीके से किया जा रहा है।

राज्य सरकार का कहना है कि अचानक पूरी बकाया राशि का भुगतान करने से सरकारी वित्त पर भारी दबाव पड़ सकता है। इसलिए उपलब्ध संसाधनों और राज्य की वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए भुगतान की प्रक्रिया को चरणों में आगे बढ़ाया जा रहा है।

केंद्रीय दर लागू करने पर हर साल 6,500 करोड़ का अतिरिक्त खर्च

पंजाब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपने वित्तीय दबाव का भी उल्लेख किया है। राज्य का अनुमान है कि यदि केंद्रीय कर्मचारियों के बराबर DA की दर को सीधे पंजाब में लागू किया जाता है तो सरकारी खजाने पर हर साल करीब 6,500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।

सरकार का कहना है कि राज्य पहले से ही वेतन और पेंशन से जुड़े बड़े खर्च का सामना कर रहा है। पंजाब की राजस्व प्राप्तियों का करीब 51 प्रतिशत हिस्सा वेतन और पेंशन पर खर्च हो जाता है। ऐसे में DA में एकमुश्त या बड़े स्तर पर वृद्धि करने से राज्य की वित्तीय स्थिति पर और दबाव पड़ सकता है।

यही वजह है कि सरकार चाहती है कि कर्मचारियों के हितों और राज्य की आर्थिक क्षमता के बीच संतुलन बनाकर फैसला किया जाए।

सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की?

पंजाब सरकार ने अपनी विशेष अनुमति याचिका में सुप्रीम कोर्ट से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के 3 अगस्त के आदेश पर रोक लगाने की मांग की है। राज्य चाहता है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट इस मामले पर अंतिम फैसला नहीं करता, तब तक सरकार को अपनी मौजूदा भुगतान योजना के अनुसार बकाया DA और DR जारी रखने की अनुमति दी जाए।

सरकार ने अदालत के सामने यह भी कहा है कि वह कर्मचारियों के साथ किसी तरह की असमानता नहीं चाहती। उसका उद्देश्य यह है कि समान श्रेणी के केंद्रीय कर्मचारियों की तुलना में पंजाब के कर्मचारियों को वास्तविक रूप से कम टेक-होम वेतन न मिले।

हालांकि, राज्य ने इस बात पर जोर दिया है कि समानता हासिल करने के लिए केवल DA की दर को केंद्र के बराबर करना जरूरी नहीं है। इसके बजाय बेसिक वेतन, भत्तों और कुल परिलब्धियों को ध्यान में रखकर वास्तविक स्थिति का आकलन किया जाना चाहिए।

कर्मचारियों और पेंशनर्स के लिए क्यों अहम है मामला?

DA और DR का मुद्दा पंजाब के लाखों सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए महत्वपूर्ण है। महंगाई भत्ता कर्मचारियों के वेतन में महंगाई के असर को कम करने के लिए दिया जाता है, जबकि पेंशनभोगियों को इसी तरह का लाभ महंगाई राहत के रूप में मिलता है।

जब DA या DR की राशि बकाया रहती है तो कर्मचारियों और पेंशनर्स को न केवल वर्तमान भुगतान का इंतजार करना पड़ता है, बल्कि पिछली अवधि की बकाया रकम पर भी नजर रहती है। ऐसे में हाईकोर्ट के आदेश और अब सरकार की सुप्रीम कोर्ट में दाखिल याचिका से इस पूरे विवाद का अगला चरण तय होगा।

राज्य सरकार की ओर से यह मामला सुप्रीम कोर्ट ले जाने का मतलब है कि अब DA-DR भुगतान से जुड़े हाईकोर्ट के आदेश की शीर्ष अदालत में भी समीक्षा होगी। अंतिम राहत या व्यवस्था अदालत के अगले निर्देशों पर निर्भर करेगी।

पंजाब का वित्तीय दबाव बना सरकार की बड़ी दलील

राज्य सरकार ने अपनी याचिका में वित्तीय स्थिति को महत्वपूर्ण आधार बनाया है। सरकार के मुताबिक पंजाब में राजस्व का बड़ा हिस्सा पहले से ही कर्मचारियों और पेंशन पर खर्च हो रहा है। ऐसे में केंद्रीय DA दर को सीधे अपनाने से अतिरिक्त वित्तीय जिम्मेदारी पैदा होगी।

सरकार ने करीब 6,500 करोड़ रुपये सालाना के संभावित अतिरिक्त खर्च का उल्लेख करते हुए कहा है कि इस तरह की वृद्धि का असर राज्य के बजट पर पड़ेगा। सरकार का कहना है कि कर्मचारियों को उनके अधिकारों से वंचित करने का उसका कोई उद्देश्य नहीं है, लेकिन भुगतान की व्यवस्था राज्य की आर्थिक क्षमता के अनुरूप होनी चाहिए।

याचिका में इसी वजह से मौजूदा लिक्विडेशन प्लान को जारी रखने की अनुमति मांगी गई है। सरकार के मुताबिक इस योजना के जरिए बकाया रकम को चरणबद्ध तरीके से चुकाया जा सकता है और इससे राज्य के वित्त पर अचानक बड़ा दबाव भी नहीं पड़ेगा।

सात श्रेणियों के आंकड़ों से अपनी बात साबित करने की कोशिश

पंजाब सरकार ने अपने पक्ष में सिर्फ वित्तीय तर्क ही नहीं दिया है, बल्कि कर्मचारियों की विभिन्न श्रेणियों से जुड़े आंकड़े भी अदालत के सामने रखे हैं। राज्य ने सात प्रतिनिधि श्रेणियों की तुलना के जरिए यह बताने की कोशिश की है कि DA प्रतिशत अपने आप में वेतन समानता का सही पैमाना नहीं हो सकता।

सरकार के मुताबिक इन सात श्रेणियों में पांच ऐसी हैं, जहां 42 प्रतिशत DA मिलने के बावजूद पंजाब के कर्मचारियों की कुल परिलब्धियां संबंधित केंद्रीय कर्मचारियों की तुलना में ज्यादा हैं।

इस आधार पर राज्य का कहना है कि अगर केवल DA प्रतिशत को बराबर करने का आदेश दिया जाता है तो इससे उन कर्मचारियों को भी अतिरिक्त लाभ मिल सकता है जिनका मूल वेतन पहले से अधिक है। इसलिए सरकार टेक-होम वेतन के आधार पर समानता की व्यवस्था चाहती है।

अब सुप्रीम कोर्ट के रुख पर नजर

DA और DR के बकाया भुगतान को लेकर पंजाब सरकार और कर्मचारियों के बीच लंबे समय से अहम मुद्दा बना हुआ है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद राज्य सरकार ने अब सुप्रीम कोर्ट में अपनी स्थिति स्पष्ट की है।

सरकार ने एक तरफ कर्मचारियों के हितों की रक्षा करने और समान श्रेणी के केंद्रीय कर्मचारियों के मुकाबले उचित टेक-होम वेतन सुनिश्चित करने की बात कही है, वहीं दूसरी तरफ केंद्रीय DA प्रतिशत को सीधे लागू करने से जुड़े वित्तीय असर का हवाला दिया है।

अब सुप्रीम कोर्ट में यह तय होना है कि हाईकोर्ट के आदेश पर अंतरिम रोक दी जाती है या नहीं और राज्य की चरणबद्ध भुगतान योजना को आगे जारी रखने की अनुमति मिलती है या नहीं। इस मामले में अदालत का अगला रुख पंजाब के सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।