फ्रांस में सरकार के खिलाफ हो रहे प्रदर्शनों और भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर हुई गतिविधियों के बीच संभावित संबंधों को लेकर एक नई रिपोर्ट में कई दावे किए गए हैं। अमेरिकी समाचार चैनल फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट में कहा गया है कि नौ देशों में सक्रिय 101 संगठनों का एक ऐसा नेटवर्क मौजूद है, जो अलग-अलग स्थानों पर होने वाले आंदोलनों के बीच संपर्क, समन्वय और संदेशों के प्रसार में भूमिका निभाता है। हालांकि, इन दावों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि किसी संगठन का दूसरे समूहों के साथ संवाद करना अपने आप में किसी साझा संचालन या एकीकृत योजना का प्रमाण नहीं है।
रिपोर्ट में फ्रांस और भारत में विरोध प्रदर्शनों से जुड़े संदेशों के आदान-प्रदान का उल्लेख किया गया है। इसके केंद्र में फ्रांस स्थित इंडियन अलायंस पेरिस (IAP) का नाम सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, यह संगठन दोनों देशों में विरोध गतिविधियों से संबंधित संदेश साझा करता है। इस दावे के आधार पर रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय संगठनों, छात्र समूहों और वामपंथी विचारधारा से जुड़े नेटवर्क के बीच संबंधों की चर्चा की गई है।
नौ देशों में फैले नेटवर्क में छात्र और युवा संगठन भी शामिल
फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट ‘ग्लोबल केऑस इंक ग्रोज टू 101 ग्रुप्स’ में जिन 101 संगठनों का उल्लेख किया गया है, उनमें से 33 का नेतृत्व छात्रों या युवाओं के हाथ में होने का दावा किया गया है। अन्य समूहों का नेतृत्व मुख्य रूप से वयस्कों द्वारा किए जाने की बात कही गई है। रिपोर्ट में इन संगठनों की गतिविधियों को केवल एक देश तक सीमित नहीं बताया गया, बल्कि कई देशों में फैले सामाजिक और राजनीतिक आंदोलनों के साथ जोड़कर देखा गया है।
रिपोर्ट में इस पूरे ढांचे को ‘रेड-ग्रीन प्रोटेस्ट इकोसिस्टम’ नाम दिया गया है। इसमें ‘रेड’ शब्द का इस्तेमाल कम्युनिस्ट और समाजवादी विचारधारा वाले समूहों के लिए, जबकि ‘ग्रीन’ का संबंध इस्लामी संगठनों से बताया गया है। इसके अलावा फ्रांस में सक्रिय कुछ ऐसे समूहों का भी उल्लेख है, जो एंटीफा नाम का उपयोग करते हैं।
इन संगठनों के वैचारिक आधार, उनकी सदस्यता और उनके काम करने के तरीकों में अंतर हो सकता है। इसलिए रिपोर्ट में शामिल सभी समूहों को एक जैसा मानना उचित नहीं होगा। नेटवर्क का आकार और अलग-अलग संगठनों के बीच संपर्क का दावा अपनी जगह है, लेकिन इन संबंधों की प्रकृति और वास्तविक प्रभाव को समझने के लिए स्वतंत्र पुष्टि तथा प्रत्येक संगठन की भूमिका से जुड़े ठोस प्रमाण आवश्यक हैं।
इंडियन अलायंस पेरिस और पीपल्स फोरम का भी जिक्र
रिपोर्ट में इंडियन अलायंस पेरिस के साथ अमेरिका के न्यूयॉर्क स्थित पीपल्स फोरम की साझेदारी का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में इसे उन संगठनों के व्यापक संपर्कों के संदर्भ में रखा गया है, जो सामाजिक आंदोलनों, राजनीतिक अभियानों और विरोध प्रदर्शनों से जुड़े विषयों पर काम करते हैं।
इसी सिलसिले में सोशल मीडिया हैंडल डिसइन्फोलैब की एक पोस्ट का हवाला दिया गया है। पोस्ट में IAP के सचिव जॉय बनर्जी के बारे में दावा किया गया कि वह फ्रांस की ट्रेड यूनियन CGT के पूर्व प्रतिनिधि रह चुके हैं और उनके फ्रांसीसी कम्युनिस्ट पार्टी से संबंध हैं। ये विवरण रिपोर्ट में किए गए दावों और सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर सामने आए हैं। इन दावों को स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य मानने से पहले संबंधित व्यक्तियों और संगठनों के आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच जरूरी है।
रिपोर्ट का मुख्य जोर इस बात पर है कि विभिन्न देशों में सक्रिय संगठनों के बीच संपर्क केवल स्थानीय गतिविधियों तक सीमित नहीं हो सकता। ऐसे संपर्कों के माध्यम से अभियान संबंधी जानकारी, कार्यक्रमों के विवरण और राजनीतिक संदेश एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंच सकते हैं। हालांकि, संदेश साझा करने, किसी कार्यक्रम का समर्थन करने और किसी आंदोलन को सीधे संचालित करने के बीच स्पष्ट अंतर होता है। उपलब्ध विवरणों से इन सभी भूमिकाओं को एक ही श्रेणी में रखना उचित नहीं होगा।
प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल की ब्रीफिंग में चार देशों के आंदोलनों का उल्लेख
रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय संगठन प्रोग्रेसिव इंटरनेशनल का नाम भी शामिल किया गया है। इस संगठन ने 16 अक्टूबर को अपनी वेबसाइट पर एक ब्रीफिंग प्रकाशित की थी, जिसमें फ्रांस, स्पेन, भारत और अल्बानिया में चल रहे आंदोलनों का एक साथ जिक्र किया गया।
ब्रीफिंग में यह सवाल उठाया गया कि क्या अलग-अलग देशों में चल रहे ये आंदोलन उन परिस्थितियों को बदलने के लिए संगठित ताकत बन सकते हैं, जिनके विरोध में वे शुरू हुए हैं। संगठन ने इन आंदोलनों को समर्थन देने और उनके बीच संपर्क बढ़ाने की बात भी कही थी।
फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट ने इस ब्रीफिंग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आंदोलनों के बीच वैचारिक और संगठनात्मक संबंधों की चर्चा के संदर्भ में पेश किया है। इसमें यह संकेत दिया गया है कि अलग-अलग देशों के संगठनों के बीच संवाद, साझा संदेश और एक-दूसरे के अभियानों का समर्थन व्यापक नेटवर्क की गतिविधियों का हिस्सा हो सकता है।
फिर भी, चार देशों में आंदोलनों का एक ही ब्रीफिंग में उल्लेख होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि उन सभी आंदोलनों का संचालन किसी एक केंद्र से हो रहा है। किसी संगठन द्वारा अंतरराष्ट्रीय एकजुटता की अपील करना और अलग-अलग देशों के आंदोलनों का नेतृत्व करना दो अलग बातें हैं। इस अंतर को ध्यान में रखना रिपोर्ट के दावों को सही संदर्भ में समझने के लिए महत्वपूर्ण है।
नेविल रॉय सिंघम से जुड़े संगठनों की फंडिंग पर भी चर्चा
रिपोर्ट में तीन संगठनों—ब्रेकथ्रू न्यूज, कोडपिंक और पार्टी फॉर सोशलिज्म एंड लिबरेशन—का उल्लेख किया गया है। इसमें दावा किया गया है कि इन संगठनों को शंघाई में रहने वाले अमेरिकी मूल के कारोबारी नेविल रॉय सिंघम से आर्थिक सहायता या अन्य प्रकार का समर्थन मिलता है।
14 अक्टूबर को ब्रेकथ्रू न्यूज पर प्रकाशित एक इंटरव्यू में सिंघम की पत्नी और कोडपिंक की सह-संस्थापक जोडी इवांस ने फ्रांस, स्पेन और भारत में जारी प्रदर्शनों का जिक्र किया था। इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि इन गतिविधियों को देखकर लोगों को खुद से यह सवाल करना चाहिए कि वे भी विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने के लिए सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहे हैं।
रिपोर्ट में इस बयान को अलग-अलग देशों में चल रहे आंदोलनों के बीच वैचारिक संपर्क के उदाहरण के तौर पर पेश किया गया है। हालांकि, किसी इंटरव्यू में प्रदर्शनों का समर्थन करना, उनमें भाग लेने की अपील करना और उनके आयोजन के लिए वित्तीय मदद देना अलग-अलग बातें हैं। आर्थिक सहायता से जुड़े दावों की पुष्टि के लिए वित्तीय दस्तावेजों, आधिकारिक बयानों या अन्य विश्वसनीय प्रमाणों की आवश्यकता होती है।
फ्रांस में 24 अक्टूबर को 212 स्थानों पर प्रदर्शन की योजना का दावा
रिपोर्ट का एक बड़ा हिस्सा फ्रांस में प्रस्तावित विरोध कार्यक्रमों पर केंद्रित है। इसके मुताबिक, 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के बाद 24 अक्टूबर को ‘एक्ट II’ नाम से दूसरे चरण की गतिविधियां आयोजित करने की तैयारी की गई थी। रिपोर्ट में एक डिजिटल मैप का हवाला देते हुए दावा किया गया है कि देश में 212 अलग-अलग स्थानों पर प्रदर्शन की योजना बनाई गई थी।
इसके बाद 31 अक्टूबर को ‘एक्ट III’ के नाम से अगले चरण और नवंबर में भी विरोध गतिविधियां आयोजित करने की तैयारी का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, कार्यक्रमों से संबंधित जानकारियां एक वेबसाइट और टेलीग्राम के जरिए साझा की जा रही थीं। इनमें कार्यक्रमों का विवरण, पोस्टर और प्रदर्शनकारियों तक पहुंचाए जाने वाले संदेश शामिल बताए गए हैं।
फ्रांस में प्रदर्शनकारियों की मांगों में राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के इस्तीफे की मांग भी शामिल होने का दावा किया गया है। रिपोर्ट ने इन गतिविधियों को देश के भीतर चल रहे विरोध अभियानों के व्यापक संदर्भ में रखा है।
हालांकि, 212 स्थानों पर कार्यक्रम प्रस्तावित होने का दावा और वास्तव में इतने स्थानों पर प्रदर्शन आयोजित होना अलग-अलग बातें हैं। इसकी पुष्टि के लिए स्थानीय प्रशासन की जानकारी, आयोजनकर्ताओं के आधिकारिक अपडेट और स्वतंत्र समाचार रिपोर्टों को देखना जरूरी होगा। इसी तरह, किसी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पोस्टर या कार्यक्रमों की जानकारी उपलब्ध होने से सभी आयोजकों के बीच साझा नियंत्रण साबित नहीं होता।
नवंबर में अंतरराष्ट्रीय युवा हड़ताल की तैयारी
रिपोर्ट में 20 नवंबर को प्रस्तावित ‘इंटरनेशनल यूथ स्ट्राइक’ का भी जिक्र किया गया है। इसके तहत यूरोप के विभिन्न हिस्सों में युवाओं से प्रदर्शन, हड़ताल, सभाएं और नाकेबंदी जैसी गतिविधियों में हिस्सा लेने की अपील किए जाने की बात कही गई है।
इस पहल से जुड़े घोषणापत्र में पूंजीवाद, युद्ध, सैन्य खर्च और आर्थिक कटौती की नीतियों की आलोचना की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन के सोशलिस्ट स्टूडेंट्स समेत कई देशों के संगठनों ने इस अभियान से जुड़ने की बात कही है। इसे युवाओं के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक मुद्दों पर समन्वय बढ़ाने की कोशिश के रूप में पेश किया गया है।
युवा संगठनों की ऐसी पहलें अलग-अलग देशों में स्थानीय मुद्दों के साथ-साथ साझा आर्थिक और सामाजिक मांगों को भी सामने ला सकती हैं। लेकिन किसी अंतरराष्ट्रीय अभियान में भागीदारी की घोषणा से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसमें शामिल सभी संगठन एक ही राजनीतिक उद्देश्य या संचालन व्यवस्था के तहत काम कर रहे हैं।
रिपोर्ट के दावों की पुष्टि क्यों महत्वपूर्ण है?
फ्रांस के प्रदर्शनों और भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग से जुड़े आंदोलनों के बीच कथित संपर्क का मुद्दा राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय बहस का विषय बन सकता है। रिपोर्ट में संगठनों की साझेदारी, सोशल मीडिया संदेशों, अंतरराष्ट्रीय ब्रीफिंग और प्रस्तावित प्रदर्शनों को एक साथ रखकर व्यापक नेटवर्क की तस्वीर पेश की गई है।
लेकिन इन जानकारियों का आकलन करते समय तीन पहलुओं में अंतर करना जरूरी है—संगठनों के बीच वैचारिक समानता, उनके बीच सूचना का आदान-प्रदान और किसी आंदोलन के आयोजन या संचालन में प्रत्यक्ष भूमिका। ये तीनों बातें एक-दूसरे से जुड़ सकती हैं, लेकिन इनके लिए अलग-अलग प्रकार के प्रमाण चाहिए।
भारत में मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों और फ्रांस में सरकार के खिलाफ गतिविधियों के बीच सीधा संगठनात्मक संबंध स्थापित करने के लिए भी ठोस सबूत आवश्यक हैं। केवल एक रिपोर्ट में नामों, संगठनों या साझा संदेशों का उल्लेख होना अपने आप में निर्णायक प्रमाण नहीं है।
फिलहाल, फॉक्स न्यूज की रिपोर्ट में बताए गए 101 संगठनों, उनकी अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों और वित्तीय सहायता से जुड़े दावों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इनकी स्वतंत्र पुष्टि, संबंधित संगठनों के जवाब और आधिकारिक दस्तावेज सामने आने पर ही कथित नेटवर्क की वास्तविक संरचना तथा उसकी भूमिका के बारे में अधिक स्पष्ट निष्कर्ष निकाला जा सकेगा।