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बैंक ऑफ बड़ौदा डेटा लीक की आशंका से बढ़ी चिंता, डार्क वेब पर 700GB से अधिक दस्तावेज होने का दावा; जांच में जुटा बैंक

देश के प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में शामिल बैंक ऑफ बड़ौदा (BoB) कथित डेटा लीक की घटना को लेकर चर्चा में है। साइबर सुरक्षा से जुड़े विशेषज्ञों और मामले से परिचित सूत्रों के अनुसार, बैंक से जुड़े बड़ी मात्रा में संवेदनशील दस्तावेज और ग्राहकों की जानकारी डार्क वेब पर उपलब्ध होने का दावा किया गया है। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, लीक हुए डेटा का आकार 700GB से अधिक बताया जा रहा है। हालांकि, अब तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कितने ग्राहकों की जानकारी इससे प्रभावित हुई है और बैंक ने भी इस संबंध में विस्तृत आधिकारिक जानकारी सार्वजनिक नहीं की है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए बैंक ने कथित डेटा लीक की जांच के लिए फोरेंसिक ऑडिट शुरू कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएं केवल किसी एक संस्था के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र के लिए साइबर सुरक्षा को लेकर चेतावनी का संकेत हैं।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों ने दी जानकारी

साइबर सुरक्षा क्षेत्र से जुड़े शोधकर्ताओं के अनुसार, डार्क वेब पर ऐसा डेटा सामने आया है, जिसे बैंक ऑफ बड़ौदा से संबंधित बताया जा रहा है। दावा किया गया है कि इसमें ग्राहकों की व्यक्तिगत जानकारी, पहचान संबंधी दस्तावेज, ऋण से जुड़े रिकॉर्ड और बैंक के आंतरिक दस्तावेज शामिल हो सकते हैं।

कैशलेस कंज्यूमर के संस्थापक और साइबर सुरक्षा शोधकर्ता श्रीकांत एल ने उपलब्ध मेटाडेटा के विश्लेषण के आधार पर कहा कि डार्क वेब पर मौजूद डेटा काफी बड़े आकार का है। हालांकि, स्वतंत्र रूप से इन दावों की पुष्टि अभी नहीं हो सकी है और जांच पूरी होने के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो पाएगी।

बैंक ने शुरू कराया फोरेंसिक ऑडिट

मामले से जुड़े सूत्रों के अनुसार, बैंक ने संभावित साइबर हमले की प्रकृति और दायरे का पता लगाने के लिए डिजिटल फोरेंसिक जांच शुरू कर दी है। इस जांच का उद्देश्य यह समझना है कि यदि डेटा लीक हुआ है, तो वह किस माध्यम से हुआ, हमलावरों ने किन प्रणालियों तक पहुंच बनाई और सुरक्षा व्यवस्था में कहां कमजोरी रही।

फोरेंसिक विशेषज्ञ सर्वर लॉग, ईमेल सिस्टम, नेटवर्क गतिविधियों और एक्सेस रिकॉर्ड की जांच कर रहे हैं। यदि किसी प्रकार की सेंधमारी की पुष्टि होती है, तो उसके आधार पर आगे की सुरक्षा रणनीति तैयार की जाएगी।

ईमेल सिस्टम बना शुरुआती जांच का केंद्र

प्रारंभिक जांच में यह संभावना सामने आई है कि साइबर हमलावरों ने बैंक के किसी ईमेल सिस्टम या उससे जुड़े अकाउंट के जरिए नेटवर्क में प्रवेश किया हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि कई बड़े साइबर हमलों की शुरुआत फिशिंग ईमेल या किसी कर्मचारी के ईमेल अकाउंट के समझौता होने से होती है।

यदि किसी अधिकृत ईमेल खाते तक हैकर्स की पहुंच बन जाती है, तो वे कई बार आंतरिक नेटवर्क में प्रवेश कर संवेदनशील फाइलों तक पहुंच हासिल कर लेते हैं। हालांकि, इस मामले में अभी तक किसी आधिकारिक एजेंसी ने इस कारण की पुष्टि नहीं की है।

कितने ग्राहक प्रभावित, अभी स्पष्ट नहीं

डेटा लीक की खबर सामने आने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि इससे कितने ग्राहकों की जानकारी प्रभावित हुई है। फिलहाल इसकी कोई आधिकारिक संख्या जारी नहीं की गई है। जांच पूरी होने तक यह कहना संभव नहीं है कि कथित तौर पर उपलब्ध डेटा कितना पुराना है, कितना वास्तविक है और उसमें कितनी ग्राहक जानकारी शामिल है।

विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार डार्क वेब पर पुराने डेटा को भी नए डेटा के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसलिए केवल ऑनलाइन दावों के आधार पर निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।

नियामक संस्थाओं की प्रतिक्रिया का इंतजार

इस पूरे घटनाक्रम पर अभी तक भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), भारतीय कंप्यूटर आपातकालीन प्रतिक्रिया दल (CERT-In) और बैंक ऑफ बड़ौदा की ओर से विस्तृत सार्वजनिक बयान सामने नहीं आया है। साइबर सुरक्षा से जुड़े मामलों में आमतौर पर संस्थाएं पहले तकनीकी जांच पूरी करती हैं, उसके बाद आधिकारिक जानकारी साझा करती हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच में डेटा लीक की पुष्टि होती है, तो संबंधित नियामक संस्थाएं आवश्यक दिशा-निर्देश जारी कर सकती हैं और सुरक्षा मानकों की समीक्षा भी की जा सकती है।

डार्क वेब पर डेटा बिक्री के दावे

साइबर अपराधी अक्सर चोरी किए गए डेटा को डार्क वेब के जरिए बेचने या साझा करने की कोशिश करते हैं। रिपोर्टों के अनुसार, इस मामले में भी कथित डेटा को बड़े डेटा कैशे के रूप में प्रचारित किया गया है। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि उस डेटा की प्रामाणिकता कितनी है और उसमें मौजूद जानकारी वास्तव में बैंक के सर्वर से प्राप्त हुई है या नहीं।

साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, डार्क वेब पर किसी डेटा के उपलब्ध होने का दावा और उसके वास्तविक होने में अंतर हो सकता है। इसलिए अंतिम निष्कर्ष केवल तकनीकी जांच के बाद ही निकाला जा सकता है।

बैंकिंग सेक्टर के लिए बड़ा संकेत

डिजिटल बैंकिंग के विस्तार के साथ साइबर हमलों का खतरा भी लगातार बढ़ा है। आज अधिकांश बैंकिंग सेवाएं मोबाइल ऐप, इंटरनेट बैंकिंग और डिजिटल भुगतान प्लेटफॉर्म के माध्यम से संचालित होती हैं। ऐसे में बैंकों के पास करोड़ों ग्राहकों का संवेदनशील डेटा सुरक्षित रहता है।

यदि किसी बैंक की सुरक्षा प्रणाली में सेंध लगती है, तो इसका असर केवल उस संस्था तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ग्राहकों के विश्वास और पूरे वित्तीय तंत्र पर भी पड़ सकता है। इसी कारण बैंक नियमित रूप से साइबर सुरक्षा ऑडिट, मल्टी-फैक्टर ऑथेंटिकेशन और नेटवर्क मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करते रहते हैं।

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

हाल के वर्षों में भारत और दुनिया भर में कई बड़ी कंपनियां साइबर हमलों का सामना कर चुकी हैं। इससे पहले तकनीकी और विनिर्माण क्षेत्र की कुछ कंपनियों के संवेदनशील दस्तावेज भी कथित रूप से डार्क वेब पर सामने आए थे। इसी तरह कुछ महत्वपूर्ण औद्योगिक और ऊर्जा प्रतिष्ठानों से जुड़े डेटा को लेकर भी साइबर सुरक्षा एजेंसियां जांच कर चुकी हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जितना बड़ा होगा, साइबर अपराधियों की दिलचस्पी भी उतनी ही अधिक होगी। इसलिए केवल फायरवॉल या एंटीवायरस पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि कर्मचारियों को साइबर जागरूकता का प्रशिक्षण देना भी उतना ही जरूरी है।

ग्राहकों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए?

भले ही जांच अभी जारी हो, लेकिन साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ ग्राहकों को अतिरिक्त सतर्क रहने की सलाह दे रहे हैं। यदि आपका बैंक खाता बैंक ऑफ बड़ौदा में है, तो कुछ एहतियाती कदम उठाना समझदारी होगी।

सबसे पहले इंटरनेट बैंकिंग और मोबाइल बैंकिंग का पासवर्ड मजबूत और नया रखें। यदि लंबे समय से पासवर्ड नहीं बदला है, तो उसे तुरंत अपडेट करें। एटीएम PIN भी समय-समय पर बदलना बेहतर माना जाता है।

किसी भी अनजान कॉल, ईमेल या संदेश में बैंकिंग जानकारी, OTP, CVV, PIN या पासवर्ड साझा न करें। याद रखें कि कोई भी बैंक ग्राहक से फोन या ईमेल पर ऐसी गोपनीय जानकारी नहीं मांगता।

अपने बैंक खाते के SMS और ईमेल अलर्ट सक्रिय रखें ताकि किसी भी संदिग्ध लेनदेन की जानकारी तुरंत मिल सके। यदि खाते में कोई अनधिकृत ट्रांजैक्शन दिखाई दे, तो तुरंत बैंक की हेल्पलाइन पर शिकायत दर्ज कराएं और आवश्यकता पड़ने पर संबंधित कार्ड या इंटरनेट बैंकिंग सेवा अस्थायी रूप से ब्लॉक करा दें।

डार्क वेब और फोरेंसिक ऑडिट क्या हैं?

डार्क वेब इंटरनेट का वह हिस्सा है, जिसे सामान्य सर्च इंजन के माध्यम से नहीं देखा जा सकता। इसे एक्सेस करने के लिए विशेष प्रकार के ब्राउजर और नेटवर्क की आवश्यकता होती है। इसी कारण इसका उपयोग कई वैध शोध कार्यों के साथ-साथ अवैध गतिविधियों, चोरी किए गए डेटा की खरीद-बिक्री और साइबर अपराध से जुड़े मामलों में भी किया जाता है।

वहीं, फोरेंसिक ऑडिट एक तकनीकी जांच प्रक्रिया है, जिसमें डिजिटल सिस्टम, सर्वर, नेटवर्क लॉग और अन्य रिकॉर्ड का विश्लेषण कर यह पता लगाया जाता है कि साइबर हमला कैसे हुआ, किस प्रकार की जानकारी प्रभावित हुई और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए किन सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है।

फिलहाल बैंक ऑफ बड़ौदा से जुड़े कथित डेटा लीक मामले की जांच जारी है। जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि डार्क वेब पर उपलब्ध बताए जा रहे डेटा की प्रामाणिकता क्या है, कितनी जानकारी वास्तव में प्रभावित हुई है और इस घटना का ग्राहकों पर कितना असर पड़ा है। तब तक साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ ग्राहकों को सतर्क रहने, अपने बैंकिंग खातों की नियमित निगरानी करने और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत सूचना बैंक को देने की सलाह दे रहे हैं।