भारत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंधों के बीच अब धीरे-धीरे संवाद का दायरा बढ़ रहा है, लेकिन नई दिल्ली ने साफ कर दिया है कि केवल बातचीत से रिश्ते सामान्य नहीं होंगे। भारत ने बीजिंग के सामने यह स्पष्ट किया है कि यदि द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाना है तो व्यापारिक असंतुलन को कम करना, भारतीय कंपनियों को चीनी बाजार में निष्पक्ष अवसर देना और सीमा क्षेत्रों में स्थायी शांति सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। इसी क्रम में फिलीपींस की राजधानी मनीला में आयोजित क्षेत्रीय बैठक के दौरान भारत के विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर और चीन के विदेश मंत्री वांग यी के बीच महत्वपूर्ण द्विपक्षीय वार्ता हुई।
बैठक के बाद विदेश मंत्री जयशंकर ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर जानकारी साझा करते हुए बताया कि दोनों देशों के बीच कई अहम विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई। उन्होंने कहा कि भारत ने विशेष रूप से व्यापार संतुलन, निष्पक्ष बाजार पहुंच और भविष्य की वैश्विक सप्लाई चेन की विश्वसनीयता से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। उनके अनुसार, बदलती वैश्विक परिस्थितियों में आपूर्ति श्रृंखला की स्थिरता और भरोसेमंद व्यवस्था दोनों देशों सहित पूरी दुनिया के लिए महत्वपूर्ण विषय बन चुकी है।
भारत लंबे समय से यह कहता रहा है कि चीन के साथ उसका व्यापार लगातार बढ़ा है, लेकिन इसका लाभ समान रूप से दोनों देशों को नहीं मिला। चीन से बड़े पैमाने पर मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, रसायन, औद्योगिक उत्पाद और दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल का आयात किया जाता है, जबकि भारतीय उत्पादों को चीन के बाजार में अपेक्षित अवसर नहीं मिल पाते। यही वजह है कि भारत ने इस बार भी स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि व्यापारिक रिश्तों को टिकाऊ बनाना है तो दोनों देशों के बीच संतुलित व्यापार आवश्यक है।
विदेश मंत्री ने बातचीत के दौरान यह भी रेखांकित किया कि भारतीय उद्योग जगत लंबे समय से चीनी बाजार में अधिक अवसरों की मांग करता रहा है। विशेष रूप से फार्मास्यूटिकल्स, सूचना प्रौद्योगिकी, कृषि उत्पाद, इंजीनियरिंग सामान और अन्य विनिर्माण क्षेत्रों में भारतीय कंपनियों को बेहतर पहुंच मिलनी चाहिए। उनका मानना है कि व्यापार केवल आयात पर आधारित नहीं होना चाहिए, बल्कि दोनों देशों के कारोबारियों को समान अवसर मिलने चाहिए ताकि आर्थिक संबंध अधिक संतुलित बन सकें।
सीमा सुरक्षा का मुद्दा भी इस बैठक का प्रमुख विषय रहा। जयशंकर ने दोहराया कि भारत-चीन संबंधों की वास्तविक मजबूती सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता पर निर्भर करती है। उन्होंने कहा कि अक्टूबर 2024 से दोनों देश सीमावर्ती इलाकों में सामान्य स्थिति बहाल करने की दिशा में लगातार प्रयास कर रहे हैं और इस प्रक्रिया को निरंतर आगे बढ़ाने की आवश्यकता है। उनका स्पष्ट संदेश था कि जब तक सीमा पर विश्वास और शांति कायम नहीं होगी, तब तक व्यापक द्विपक्षीय संबंधों का पूरी तरह सामान्य होना संभव नहीं है।
भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से जारी आधिकारिक बयान में भी यही बात दोहराई गई। मंत्रालय ने कहा कि भारत और चीन दोनों इस बात पर सहमत हैं कि सीमा क्षेत्रों में शांति बनाए रखना दोनों देशों के व्यापक संबंधों की मूल आवश्यकता है। इस दिशा में पहले से स्थापित विभिन्न तंत्रों और संवाद प्रक्रियाओं को सक्रिय बनाए रखना जरूरी होगा ताकि किसी भी प्रकार के मतभेद को समय रहते बातचीत के माध्यम से सुलझाया जा सके।
दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय बैठकों का सिलसिला भी पिछले कुछ समय से तेज हुआ है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, अक्टूबर 2024 में कजान में दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व की मुलाकात के बाद संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में सकारात्मक प्रगति हुई है। इसके बाद तियानजिन में हुई बैठक ने भी इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत का मानना है कि आपसी सम्मान, साझा हितों और एक-दूसरे की संवेदनशीलताओं को समझते हुए ही भविष्य में स्थायी सहयोग का आधार तैयार किया जा सकता है।
बैठक के दौरान बहुपक्षीय सहयोग पर भी चर्चा हुई। इस वर्ष भारत ब्रिक्स समूह की अध्यक्षता कर रहा है। इस अवसर पर विदेश मंत्री जयशंकर ने चीन द्वारा ब्रिक्स से जुड़ी विभिन्न पहलों और कार्यक्रमों में दिए गए सहयोग की सराहना की। उन्होंने कहा कि भारत अपनी अध्यक्षता के दौरान सदस्य देशों के साथ रचनात्मक सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है और चीन का समर्थन इस दिशा में महत्वपूर्ण रहा है। दोनों पक्षों ने बहुपक्षीय मंचों पर संवाद और सहयोग जारी रखने की आवश्यकता पर भी सहमति जताई।
जयशंकर ने यह भी कहा कि दोनों देशों के बीच विभिन्न स्तरों पर संचालित तंत्रों और संवाद मंचों की नियमित बैठकें होती रहनी चाहिए। उनके अनुसार, केवल राजनीतिक स्तर पर ही नहीं बल्कि आर्थिक, राजनयिक और तकनीकी क्षेत्रों में भी संवाद बढ़ाने से कई जटिल मुद्दों का समाधान आसान हो सकता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि द्विपक्षीय संबंधों में सकारात्मक गति बनाए रखने के लिए संस्थागत संवाद बेहद महत्वपूर्ण है।
भारत और चीन के बीच व्यापारिक आंकड़े इस असंतुलन की गंभीरता को भी दर्शाते हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने चीन से लगभग 132 अरब डॉलर का आयात किया, जो किसी भी एक देश से सबसे अधिक रहा। कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 151.10 अरब डॉलर तक पहुंच गया, लेकिन इसमें भारत का व्यापार घाटा 100 अरब डॉलर से अधिक दर्ज किया गया। यह लगातार बढ़ता घाटा भारत की चिंता का बड़ा कारण बना हुआ है और इसी वजह से नई दिल्ली व्यापार संतुलन को लेकर अधिक सक्रिय दिखाई दे रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय उद्योगों की उत्पादन क्षमता अभी भी कई क्षेत्रों में चीन से आने वाले कच्चे माल और मशीनरी पर निर्भर है। इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, सौर ऊर्जा उपकरण, रसायन उद्योग और दवा निर्माण जैसे कई क्षेत्रों में चीनी आयात महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि भारत समानांतर रूप से घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने और वैकल्पिक वैश्विक आपूर्ति स्रोत विकसित करने की दिशा में भी लगातार काम कर रहा है।
हाल के महीनों में दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग को लेकर कुछ सकारात्मक संकेत भी देखने को मिले हैं। भारत ने चुनिंदा औद्योगिक क्षेत्रों में चीनी निवेश से जुड़े कुछ प्रतिबंधों में ढील दी है। इसे दोनों देशों के बीच आर्थिक विश्वास बहाल करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। हालांकि सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक क्षेत्रों से जुड़े मामलों में आवश्यक सावधानियां पहले की तरह जारी रहेंगी।
बैठक के दौरान भारत ने यह भी दोहराया कि बड़े पड़ोसी देशों के बीच मतभेद होना असामान्य नहीं है, लेकिन इन मतभेदों को विवाद का रूप नहीं लेने देना दोनों देशों की साझा जिम्मेदारी है। संवाद, कूटनीति और पारस्परिक सम्मान के माध्यम से जटिल मुद्दों का समाधान निकालना ही भविष्य के संबंधों की कुंजी होगा। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत और चीन जैसे दो महत्वपूर्ण देशों के बीच स्थिर और सहयोगात्मक संबंध न केवल एशिया बल्कि वैश्विक व्यवस्था के लिए भी सकारात्मक योगदान दे सकते हैं।
मनीला में हुई यह वार्ता ऐसे समय पर हुई है जब दोनों देश कई वर्षों के तनाव के बाद धीरे-धीरे विश्वास बहाली की दिशा में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। भारत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि आर्थिक सहयोग, निष्पक्ष व्यापार, सीमा पर स्थिरता और पारस्परिक सम्मान को साथ लेकर ही भविष्य के रिश्तों को नई दिशा दी जा सकती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि दोनों देश इन मुद्दों पर कितनी तेजी से व्यावहारिक प्रगति कर पाते हैं और क्या व्यापारिक असंतुलन तथा सीमा से जुड़े लंबे समय से लंबित प्रश्नों के समाधान की दिशा में ठोस कदम उठाए जाते हैं।