मोबाइल फोन निर्माण के क्षेत्र में भारत को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक नई और व्यापक योजना लागू करने का फैसला किया है। इस योजना के तहत अगले पांच वर्षों में 62,500 करोड़ रुपये का निवेश प्रोत्साहन दिया जाएगा, ताकि देश में सिर्फ मोबाइल फोन की असेंबली ही नहीं बल्कि उनके महत्वपूर्ण पुर्जों का भी बड़े पैमाने पर निर्माण हो सके। सरकार का मानना है कि इस पहल से भारत की उत्पादन क्षमता बढ़ेगी, आयात पर निर्भरता कम होगी और हजारों युवाओं के लिए नए रोजगार के अवसर तैयार होंगे।
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) की ओर से शुरू की गई इस नई पहल का नाम मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग प्रमोशन स्कीम (MPMS) रखा गया है। यह योजना वित्त वर्ष 2026-27 से लागू होकर 2030-31 तक प्रभावी रहेगी। सरकार का लक्ष्य है कि भारत मोबाइल निर्माण के क्षेत्र में दुनिया के प्रमुख देशों की श्रेणी में पहुंचे और घरेलू उद्योग को नई मजबूती मिले।
पिछले कुछ वर्षों में भारत मोबाइल फोन की असेंबली के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ा है। कई वैश्विक कंपनियों ने यहां अपने प्लांट लगाए हैं, जिससे देश दुनिया के बड़े स्मार्टफोन उत्पादक देशों में शामिल हुआ है। हालांकि अब भी मोबाइल फोन के कई अहम कंपोनेंट विदेशों से आयात किए जाते हैं। कैमरा मॉड्यूल, डिस्प्ले पैनल, प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB), बैटरी, चार्जिंग यूनिट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स के लिए भारत काफी हद तक दूसरे देशों पर निर्भर है। सरकार का मानना है कि यदि इन पुर्जों का निर्माण भी देश में होने लगे तो उत्पादन लागत घटेगी और सप्लाई चेन अधिक मजबूत बनेगी।
नई योजना का सबसे बड़ा उद्देश्य यही है कि मोबाइल फोन के लिए जरूरी अधिकतर कंपोनेंट भारत में ही तैयार किए जाएं। इससे घरेलू उद्योग को बढ़ावा मिलेगा और विदेशी आयात पर होने वाला खर्च कम होगा। इसके साथ ही देश में नई तकनीक आएगी, जिससे भारतीय कंपनियों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता भी बढ़ेगी।
सरकार का अनुमान है कि इस योजना के लागू होने से करीब 60 हजार प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र में नई फैक्ट्रियों की स्थापना, मौजूदा उत्पादन इकाइयों के विस्तार और कंपोनेंट निर्माण के बढ़ने से इंजीनियर, तकनीशियन, मशीन ऑपरेटर, गुणवत्ता नियंत्रण विशेषज्ञ और सप्लाई चेन से जुड़े हजारों लोगों को रोजगार मिल सकेगा। इसके अलावा लॉजिस्टिक्स, पैकेजिंग और सर्विस सेक्टर में भी रोजगार की संभावनाएं बढ़ेंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मोबाइल निर्माण की पूरी वैल्यू चेन भारत में विकसित होती है तो देश को आर्थिक रूप से भी बड़ा फायदा मिलेगा। अभी कई कंपनियां मोबाइल फोन भारत में जोड़ती हैं, लेकिन उनके अधिकांश महत्वपूर्ण पार्ट्स विदेशों से मंगाए जाते हैं। इससे उत्पादन लागत बढ़ती है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी बाधा का असर सीधे भारतीय उद्योग पर पड़ता है। स्थानीय स्तर पर कंपोनेंट निर्माण होने से यह समस्या काफी हद तक खत्म हो सकती है।
मोबाइल उद्योग आज दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों में शामिल है। डिजिटल सेवाओं के विस्तार, 5G नेटवर्क और स्मार्ट डिवाइस की बढ़ती मांग के कारण आने वाले वर्षों में मोबाइल फोन की जरूरत और बढ़ने की संभावना है। सरकार चाहती है कि भारत इस बढ़ती वैश्विक मांग का लाभ उठाए और दुनिया के लिए एक प्रमुख उत्पादन केंद्र के रूप में उभरे।
नई योजना के तहत केवल उत्पादन बढ़ाने पर ही ध्यान नहीं दिया जाएगा, बल्कि रिसर्च एंड डेवलपमेंट (R&D), डिजाइन और इनोवेशन को भी प्रोत्साहित किया जाएगा। सरकार का उद्देश्य है कि भारत केवल निर्माण केंद्र न रहे बल्कि नई तकनीकों के विकास और उत्पाद डिजाइन में भी अग्रणी भूमिका निभाए। इससे भारतीय कंपनियों को वैश्विक बाजार में अपनी अलग पहचान बनाने में मदद मिलेगी।
सरकार का मानना है कि देश में कंपोनेंट निर्माण बढ़ने से मोबाइल फोन की लागत पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा। जब अधिकतर पार्ट्स स्थानीय स्तर पर उपलब्ध होंगे तो आयात शुल्क, परिवहन खर्च और सप्लाई में देरी जैसी समस्याएं कम होंगी। इसका लाभ कंपनियों के साथ-साथ उपभोक्ताओं को भी मिल सकता है।
इस योजना के जरिए घरेलू और विदेशी निवेशकों को भी आकर्षित करने की कोशिश की जा रही है। सरकार को उम्मीद है कि नई मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों की स्थापना से इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर में बड़े पैमाने पर निवेश आएगा। कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां पहले से भारत में उत्पादन कर रही हैं और नई नीति के बाद उनके विस्तार की संभावनाएं भी बढ़ सकती हैं।
बीते वर्षों में भारत सरकार ने इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं। इन प्रयासों के कारण मोबाइल फोन उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है और भारत से स्मार्टफोन का निर्यात भी लगातार बढ़ रहा है। अब MPMS के माध्यम से सरकार इस सफलता को अगले स्तर तक ले जाना चाहती है।
सरकार का यह भी मानना है कि मजबूत घरेलू सप्लाई चेन बनने से वैश्विक स्तर पर होने वाले किसी भी संकट का असर भारतीय उद्योग पर कम पड़ेगा। महामारी के दौरान और उसके बाद दुनिया ने सप्लाई चेन से जुड़ी कई चुनौतियां देखीं, जिससे इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग भी प्रभावित हुआ था। यदि अधिकतर कंपोनेंट भारत में बनने लगेंगे तो ऐसी परिस्थितियों में उत्पादन जारी रखना आसान होगा।
मोबाइल फोन उद्योग के विस्तार से देश के कई राज्यों को भी लाभ मिलने की संभावना है। जहां पहले से इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर मौजूद हैं, वहां नई इकाइयों की स्थापना हो सकती है। साथ ही नए औद्योगिक क्षेत्रों का विकास भी होगा, जिससे क्षेत्रीय आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा।
विशेषज्ञों के अनुसार यह योजना केवल मोबाइल उद्योग तक सीमित नहीं रहेगी। मोबाइल निर्माण के लिए जरूरी कंपोनेंट तैयार करने वाली कंपनियों के आने से सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मशीनरी, पैकेजिंग और ऑटोमेशन जैसे कई अन्य उद्योगों को भी अप्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। इससे पूरे इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम का विस्तार होगा।
सरकार का लक्ष्य भारत को केवल एक बड़ा उपभोक्ता बाजार बनाए रखना नहीं बल्कि एक ऐसा देश बनाना है जहां आधुनिक तकनीक आधारित उत्पादों का निर्माण, डिजाइन और निर्यात बड़े पैमाने पर हो। इसी सोच के तहत मोबाइल फोन मैन्युफैक्चरिंग प्रमोशन स्कीम तैयार की गई है, जिसमें उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ रोजगार, निवेश, तकनीकी विकास और निर्यात को समान महत्व दिया गया है।
यदि योजना अपने निर्धारित लक्ष्यों के अनुसार सफल रहती है तो आने वाले वर्षों में भारत मोबाइल फोन और उससे जुड़े कंपोनेंट निर्माण के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर मजबूत स्थिति हासिल कर सकता है। इससे देश की अर्थव्यवस्था को गति मिलने के साथ-साथ लाखों लोगों के लिए अप्रत्यक्ष रोजगार, उद्योगों के विस्तार और तकनीकी आत्मनिर्भरता की दिशा में भी महत्वपूर्ण प्रगति देखने को मिल सकती है। सरकार को उम्मीद है कि यह पहल भारत को इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के नए दौर में प्रवेश कराने के साथ-साथ वैश्विक बाजार में उसकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को भी नई ऊंचाई प्रदान करेगी।
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