देश की राजधानी दिल्ली इन दिनों सियासत और छात्र आक्रोश का एक ऐसा केंद्र बन चुकी है, जहां की तपिश सीधे सत्ता के गलियारों तक महसूस की जा रही है। एक तरफ जहां परीक्षा प्रणाली में लगातार सामने आ रही गड़बड़ियों और धांधलियों के खिलाफ युवाओं का सब्र जवाब दे चुका है, वहीं दूसरी तरफ देश की मुख्य विपक्षी पार्टी ने इस आंदोलन को अपनी पूरी ताकत के साथ धार दे दी है। बीते दो दिनों से लगातार हो रही हाई-प्रोफाइल प्रेस वार्ताओं और राजनीतिक गतिविधियों ने सियासी पारे को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। विपक्ष के आक्रामक रुख ने साफ कर दिया है कि सरकार के लिए यह राह इतनी आसान नहीं रहने वाली है।
जंतर-मंतर की वह तपिश और 23 दिनों का संघर्ष
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में वे युवा हैं, जिन्होंने अपने हक और भविष्य की खातिर लंबी और कठिन लड़ाइयां लड़ी हैं। हाल ही में, ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) से जुड़ी कुछ साहसी छात्राओं ने जंतर-मंतर पर लगातार 23 दिनों तक ऐतिहासिक भूख हड़ताल की। इन छात्राओं का संकल्प और जज्बा इस बात का गवाह था कि देश का छात्र वर्ग अब और अधिक अन्याय सहने के मूड में नहीं है।
इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए, नेता प्रतिपक्ष ने शनिवार को लगातार दूसरे दिन एक बेहद महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किया। उनके साथ वे छात्र भी मौजूद थे जिन्होंने इस लंबी लड़ाई का नेतृत्व किया था। इस मंच से एक बात बिल्कुल साफ कर दी गई कि अब केवल खानापूर्ति या लीपापोती से काम नहीं चलने वाला है। सरकार चाहे अंदरखाने कोई भी रणनीति बना ले, लेकिन विपक्ष और छात्र संगठन किसी भी आधे-अधूरे समझौते के लिए तैयार नहीं हैं।
मंत्रालय बदलने की चर्चाओं पर विपक्ष का कड़ा प्रहार
राजनीतिक गलियारों में पिछले कुछ दिनों से यह सुगबुगाहट तेज थी कि बढ़ते दबाव और लगातार हो रहे विरोध प्रदर्शनों के बीच सरकार बीच का रास्ता निकालने की सोच रही है। चर्चा यह थी कि मौजूदा शिक्षा मंत्री का विभाग या मंत्रालय बदलकर इस पूरे विवाद को शांत करने का प्रयास किया जा सकता है।
लेकिन इस संभावित राजनीतिक पैंतरे पर पानी फेरते हुए विपक्षी खेमे ने दो टूक शब्दों में अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान दो टूक अंदाज में कहा गया कि सरकार चाहे मंत्रियों के विभाग बदलने के कितने भी ताने-बाने बुन ले, यह किसी भी सूरत में मंजूर नहीं किया जाएगा। शिक्षा व्यवस्था को इस कगार पर पहुंचाने वाले और इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार मंत्री का केवल विभाग बदलना नाकाफी है, बल्कि उन्हें अपने पद से पूरी तरह हटना ही होगा। इस कड़े रुख ने यह बता दिया है कि विपक्ष इस मुद्दे पर किसी भी तरह के समझौते के मूड में बिल्कुल नहीं है।
20 जुलाई का वह काला दिन: जब संसद मार्च बना रणक्षेत्र
इस पूरे विवाद की पृष्ठभूमि में 20 जुलाई की वह घटना है जिसने सभी को झकझोर कर रख दिया था। नीट (NEET) परीक्षा में लगातार सामने आ रही गड़बड़ियों और पेपर लीक के मामलों के विरोध में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के बैनर तले एक बड़ा संसद मार्च निकाला गया था। यह प्रदर्शन पूरी तरह से लोकतांत्रिक तरीके से शुरू हुआ था, लेकिन देखते ही देखते यह हिंसक झड़प में तब्दील हो गया।
प्रदर्शनकारियों और दिल्ली पुलिस के बीच हुई इस भीषण झड़प में 100 से अधिक छात्र और कई पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए थे। सड़क पर चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल था। लाठीचार्ज और आंसू गैस के बीच कुछ ऐसा भी हुआ, जिसने इस आंदोलन को एक मानवीय और बेहद संवेदनशील मोड़ दे दिया। पुलिस कार्रवाई के दौरान सुरक्षा बलों द्वारा छोड़ी गई पैलेट गन (छर्रे वाली बंदूक) का इस्तेमाल किया गया, जिसकी चपेट में कई मासूम छात्र आ गए।
साहिल की आंख का दर्द और डॉक्टरों का वह खौफनाक सच
शुक्रवार को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में देश ने एक ऐसा मंज़र देखा, जिसने हर संवेदनशील इंसान के दिल को झकझोर दिया। नेता प्रतिपक्ष उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक ऐसे युवा को अपने साथ लेकर आए थे, जो 20 जुलाई के उसी संसद मार्च के दौरान पुलिस की बर्बरता का शिकार हुआ था।
इस घायल छात्र का नाम साहिल लोचाब है। दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के नजफगढ़ इलाके का रहने वाला 19 वर्षीय साहिल इस समय जिंदगी के सबसे बड़े इम्तिहान से गुजर रहा है। साहिल दिल्ली विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ ओपन लर्निंग (SOL) का छात्र है और वह हमेशा से एक पुलिस अधिकारी बनकर देश की सेवा करना चाहता था। उसके मन में वर्दी पहनने और देश के कानून की रक्षा करने का सपना था, लेकिन उसे क्या पता था कि जिस खाकी और सिस्टम के प्रति उसके मन में इतना सम्मान था, वही सिस्टम उसकी जिंदगी के सबसे बड़े अंधेरे का कारण बन जाएगा।
20 जुलाई को जंतर-मंतर के पास प्रदर्शन के दौरान पुलिस की पैलेट गन से निकली गोलियों के छर्रे साहिल की दाहिनी आंख में जा धंसे। उसके शरीर के अन्य हिस्सों जैसे हाथ, पीठ और छाती पर भी हिंसा के गहरे निशान साफ देखे जा सकते थे। उसे तुरंत एम्स (AIIMS) के जयप्रकाश नारायण एपेक्स ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया, जहां उसकी आपातकालीन सर्जरी की गई।
लेकिन परिवार और खुद साहिल के लिए डॉक्टरों की रिपोर्ट किसी आकाशीय बिजली से कम नहीं थी। मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक, साहिल की घायल आंख की पुतली को गंभीर रूप से नुकसान पहुंचा है और डॉक्टरों ने साफ कह दिया है कि उसकी आंख की रोशनी वापस लौटने की संभावना मात्र 1% ही बची है।
साहिल की मां ज्योति, जो अपने बेटे के भविष्य को लेकर दिन-रात सपने बुनती थीं, आज अपने बेटे की इस हालत को देखकर पूरी तरह टूट चुकी हैं। मां ने बताया कि साहिल पहले भी इस तरह के आंदोलनों में शामिल होता रहा है। घटना वाले दिन भी उसने घर पर यही कहा था कि यह मुद्दा उसकी खुद की और देश के लाखों युवाओं की पढ़ाई और भविष्य से जुड़ा है, इसलिए उसका वहां जाना बेहद जरूरी है। मां के आंसुओं में एक मां की वो कसक साफ झलक रही थी, जो अपने बेटे की आंखों में हमेशा के लिए छाए अंधेरे को बयां कर रही थी।
राहुल गांधी के तीखे तेवर: “वे देश के अतीत हैं, जो भविष्य से नहीं जीत सकते”
शुक्रवार और शनिवार—लगातार दो दिनों तक मीडिया के सामने आकर आक्रामक तेवर दिखाने वाले नेता प्रतिपक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोला। उन्होंने मौजूदा शिक्षा मंत्री को सीधे तौर पर आड़े हाथों लेते हुए उन्हें “अपराधी शिक्षा मंत्री” की संज्ञा दी। उनका कहना था कि वर्तमान शिक्षा मंत्री देश की चरमराई और ध्वस्त हो चुकी शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा जीवंत प्रतीक हैं।
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान साहिल के शरीर पर लगे घावों, उसकी सूजी हुई पीठ और सीने के निशानों को दिखाते हुए उन्होंने कहा कि उनका यह भाई उस वक्त पैलेट गन की हिंसा का शिकार हुआ, जब वह हाथ में तिरंगा थामे हुए पूरी तरह से शांतिपूर्ण तरीके से अपने लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आवाज उठा रहा था। क्या हाथ में तिरंगा लेकर चलना इस देश में अपराध बन गया है?
उन्होंने देश के प्रधानमंत्री को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि नरेंद्र मोदी को देश के युवाओं से बिना किसी शर्त के सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी ही होगी। उन्होंने तंज कसते हुए यह भी जोड़ा कि आज की पीढ़ी देश का भविष्य है और जो लोग वक्त के साथ चलना नहीं जानते, वे अतीत बनकर रह जाते हैं, और अतीत कभी भी आने वाले कल यानी भविष्य से जीत नहीं सकता।
विपक्ष की वे तीन अटल मांगें, जिन पर कोई समझौता नहीं
प्रेसिडेंट और सरकार के सामने विपक्ष और छात्र संगठनों की तरफ से कुल तीन सूत्रीय मांगें रखी गई हैं। इन मांगों को लेकर यह साफ कर दिया गया है कि इनसे किसी भी प्रकार का कोई कॉम्प्रोमाइज या समझौता नहीं किया जाएगा:
- शिक्षा मंत्री की बर्खास्तगी: पहली और सबसे प्रमुख मांग यह है कि मौजूदा शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को तुरंत उनके पद से हटाया जाए। सिर्फ मंत्रालय बदलना या फेरबदल करना छात्रों को मंजूर नहीं है।
- पुलिस अधिकारियों की जवाबदेही: दूसरी मांग यह है कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे निहत्थे छात्रों पर क्रूरता पूर्वक कार्रवाई करने वाले और पेलेट गन का इस्तेमाल करने वाले दिल्ली पुलिस के दोषी अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाए और उनके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई हो।
- प्रधानमंत्री की माफी: तीसरी और अंतिम मांग यह है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इन मासूम छात्रों पर हुए बर्बर पुलिस हमले की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए देश के युवाओं से माफी मांगनी चाहिए।
आंदोलन की आग और आने वाला कल
आज जब देश का युवा वर्ग अपनी डिग्रियों, अपनी परीक्षाओं की पारदर्शिता और अपने भविष्य को बचाने के लिए सड़कों पर उतर आया है, तो प्रशासन और शासन दोनों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे लाठी और गोलियों के बल पर आवाज़ को दबाने के बजाय संवाद का रास्ता अपनाएं। साहिल जैसे युवाओं की आंख की रोशनी छिन जाना केवल एक परिवार का व्यक्तिगत नुकसान नहीं है, बल्कि यह उस पूरी व्यवस्था पर एक बड़ा सवालिया निशान है जो युवाओं को सपने देखना सिखाती है, लेकिन जब वे उन सपनों को पूरा करने के लिए आगे बढ़ते हैं, तो उन्हें बेरहमी से कुचल दिया जाता है।
राजनीतिक बयानबाजी अपने चरम पर है, आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है, और जंतर-मंतर से लेकर संसद तक गूंजती यह आवाजें अब थमने का नाम नहीं ले रही हैं। देखना यह होगा कि आने वाले दिनों में सरकार इन तीखे तेवरों और सुलगते सवालों के बीच क्या रुख अपनाती है, क्योंकि देश का युवा अब चुप बैठने वाला नहीं है।