यूक्रेन युद्ध के बीच यूरोप की सुरक्षा रणनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। रूस के साथ संभावित सैन्य टकराव और बदलते सुरक्षा माहौल को देखते हुए नाटो के यूरोपीय सदस्य अपनी सैन्य क्षमताओं को मजबूत करने में जुटे हैं। इसका असर केवल हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं है, बल्कि सैनिकों की ट्रेनिंग, सैन्य ढांचे, अस्पतालों, साइबर सुरक्षा और जरूरी नागरिक सुविधाओं की तैयारियों पर भी दिखाई दे रहा है।
नाटो के भीतर यह बदलाव ऐसे समय में हो रहा है, जब यूक्रेन में लंबे समय से जारी युद्ध ने आधुनिक युद्ध की प्रकृति को काफी बदल दिया है। ड्रोन, मिसाइल, एयर डिफेंस और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर जैसी क्षमताएं अब सैन्य रणनीति के केंद्र में आ गई हैं। हालिया विश्लेषणों में भी यह बात सामने आई है कि यूक्रेन युद्ध ने नाटो देशों की मौजूदा सैन्य तैयारियों और हथियारों की खरीद प्रक्रिया की कई कमियों को उजागर किया है।
2035 तक रक्षा और सुरक्षा पर GDP का 5% खर्च करने का लक्ष्य
यूरोपीय नाटो देशों की नई रणनीति का सबसे बड़ा हिस्सा रक्षा बजट बढ़ाने से जुड़ा है। नाटो ने 2035 तक सदस्य देशों के लिए GDP के 5% के बराबर रक्षा और सुरक्षा संबंधी खर्च का लक्ष्य तय किया है।
इस लक्ष्य के तहत GDP का 3.5% हिस्सा सीधे पारंपरिक रक्षा जरूरतों पर खर्च किया जाना है। इसमें सैनिकों, हथियारों, सैन्य उपकरणों और ऑपरेशनल क्षमताओं को मजबूत करना शामिल है। बाकी 1.5% खर्च को व्यापक सुरक्षा और रक्षा-संबंधी ढांचे के लिए रखा गया है। इसमें सड़कें, पुल, संचार नेटवर्क, साइबर सुरक्षा और ऐसी दूसरी व्यवस्थाएं शामिल हैं, जिनकी जरूरत युद्ध या बड़े संकट के समय पड़ सकती है।
हालांकि सभी नाटो सदस्य इस लक्ष्य की ओर एक समान गति से नहीं बढ़ रहे हैं। उदाहरण के लिए, सितंबर 2026 में अमेरिकी अधिकारियों ने चेक गणराज्य के मौजूदा रक्षा खर्च को लेकर असंतोष जताया। वहां 2026 में रक्षा खर्च करीब 1.7-1.8% GDP रहने का अनुमान बताया गया, जबकि देश ने 2027 तक पुराने 2% नाटो लक्ष्य को पूरा करने की बात कही है।
अमेरिका पर निर्भरता कम करने की दिशा में यूरोप
रक्षा खर्च बढ़ाने के पीछे केवल रूस को लेकर चिंता ही नहीं है। यूरोपीय देशों के लिए अमेरिका के साथ सुरक्षा संबंध और भविष्य में अमेरिकी सैन्य भूमिका भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन गई है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लंबे समय से यूरोपीय नाटो सदस्यों से अपनी सुरक्षा में ज्यादा योगदान देने की मांग करते रहे हैं। अमेरिकी प्रशासन का तर्क रहा है कि यूरोपीय सहयोगियों को अपनी रक्षा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खुद संभालना चाहिए।
इसी बीच अमेरिका ने यूरोप में अपनी सैन्य मौजूदगी की भी समीक्षा शुरू की है। सितंबर 2026 में अमेरिकी रक्षा विभाग की समीक्षा में यूरोप में अमेरिकी सैनिकों की तैनाती और सहयोगी देशों की रक्षा जिम्मेदारियों पर विचार किया जा रहा है। रॉयटर्स के मुताबिक, यूरोप में करीब 80 हजार अमेरिकी सैन्यकर्मी तैनात हैं और समीक्षा का उद्देश्य यूरोपीय सहयोगियों से अधिक जिम्मेदारी लेने की अपेक्षा के साथ अमेरिकी सैन्य संसाधनों की समीक्षा करना है।
इसका मतलब यह है कि यूरोप एक तरफ अपने सैन्य खर्च को बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी तरफ अपनी रक्षा क्षमता को लंबे समय में अधिक स्वतंत्र बनाने की कोशिश भी कर रहा है।
यूक्रेन युद्ध ने बदली सैन्य प्राथमिकताएं
यूक्रेन में चल रही लड़ाई ने यूरोपीय देशों को यह समझने का मौका दिया है कि आधुनिक युद्ध में किस तरह की सैन्य क्षमताओं की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ सकती है।
ड्रोन युद्ध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कम लागत वाले ड्रोन सैन्य ठिकानों, बख्तरबंद वाहनों और दूसरे महंगे सैन्य संसाधनों के खिलाफ इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इसी वजह से नाटो देशों के लिए ड्रोन और एंटी-ड्रोन सिस्टम, एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और लंबी दूरी की मिसाइलों की क्षमता बढ़ाना अहम हो गया है।
रॉयटर्स की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, यूक्रेन युद्ध ने नाटो की पारंपरिक सैन्य योजनाओं की कई सीमाएं सामने रखी हैं। युद्ध के दौरान तेजी से बदलती तकनीक और ड्रोन की भूमिका ने पश्चिमी देशों की धीमी हथियार खरीद प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े किए हैं।
नाटो सैन्य प्रशिक्षक भी यूक्रेन के युद्ध अनुभव से सीखने की कोशिश कर रहे हैं। पोलैंड में चल रही ट्रेनिंग गतिविधियों के जरिए यूक्रेनी युद्ध अनुभव को नाटो की सैन्य तैयारियों में शामिल करने पर जोर दिया जा रहा है।
जर्मनी से नॉर्वे तक सिर्फ सेना नहीं, अस्पताल भी तैयार
यूरोप की तैयारी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नागरिक और मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ा है। जर्मनी में पुराने मेडिकल बंकरों को फिर से इस्तेमाल करने की दिशा में काम हो रहा है। इनका उद्देश्य संभावित युद्ध या बड़े हमले की स्थिति में घायलों को चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना है।
नॉर्वे में भी युद्ध जैसी आपात स्थिति को ध्यान में रखते हुए अस्पतालों की क्षमता बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। वहां बड़ी संख्या में अतिरिक्त बेड उपलब्ध कराने और सैन्य तथा नागरिक चिकित्सा व्यवस्था के बीच बेहतर तालमेल की तैयारी की जा रही है।
इस तरह यूरोपीय देशों की रणनीति केवल युद्ध के मैदान के लिए सैनिक तैयार करने तक सीमित नहीं है। इसमें यह भी देखा जा रहा है कि बड़े सैन्य संकट की स्थिति में घायल सैनिकों और आम नागरिकों को किस तरह अस्पताल तक पहुंचाया जाए और उनका इलाज कैसे किया जाए।
पोलैंड में बड़े पैमाने पर सैन्य ट्रेनिंग की योजना
रूस की सीमा के करीब स्थित पोलैंड ने अपनी सैन्य तैयारियों को तेज करने वाले देशों में प्रमुख भूमिका निभाई है। देश की योजना आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में नागरिकों को सैन्य प्रशिक्षण देने की है।
2027 से हर साल करीब एक लाख लोगों को सैन्य ट्रेनिंग देने और कुल पांच लाख लोगों को प्रशिक्षित करने की योजना बताई गई है। इसका उद्देश्य जरूरत पड़ने पर प्रशिक्षित रिजर्व बल उपलब्ध कराना है।
पोलैंड की सुरक्षा चिंताएं हाल के महीनों में और बढ़ी हैं। सितंबर 2026 में प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने चेतावनी दी कि रूस यूक्रेन की मदद करने वाले नाटो देशों के खिलाफ ड्रोन या रॉकेट आधारित हाइब्रिड हमलों का इस्तेमाल कर सकता है। उन्होंने सीमा क्षेत्रों में सामने आए ड्रोन संबंधी मामलों का भी उल्लेख किया।
ब्रिटेन बढ़ाएगा हथियारों का घरेलू उत्पादन
ब्रिटेन ने भी अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए हैं। देश में गोला-बारूद और विस्फोटक बनाने के लिए नई फैक्ट्रियां स्थापित करने की योजना है।
ब्रिटेन के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाने का एक फायदा यह है कि लंबे संघर्ष की स्थिति में हथियारों और गोला-बारूद की आपूर्ति बनाए रखने की क्षमता मजबूत हो सकती है। यूक्रेन युद्ध ने यूरोपीय देशों को यह भी दिखाया है कि लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में केवल अत्याधुनिक हथियार होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पर्याप्त मात्रा में गोला-बारूद और स्पेयर पार्ट्स का उत्पादन भी जरूरी है।
नाटो देशों के सामने फिलहाल यही चुनौती है कि सैन्य बजट बढ़ाने के साथ-साथ उनकी रक्षा उत्पादन क्षमता भी तेजी से बढ़े।
बाल्टिक देशों में भी बढ़ी सतर्कता
रूस के करीब स्थित बाल्टिक क्षेत्र के देशों में सुरक्षा तैयारियों को लेकर विशेष सतर्कता दिखाई दे रही है। लिथुआनिया में युवाओं के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा से जुड़ी तैयारियां बढ़ाई जा रही हैं। इस वर्ष करीब 5 हजार युवाओं को सैन्य सेवा के लिए बुलाने की योजना बताई गई है।
स्वीडन ने भी नागरिकों को आपात स्थिति के लिए घरों में जरूरी सामान रखने की सलाह दी है। लोगों को कम से कम सात दिनों तक अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने लायक तैयारी रखने के लिए कहा गया है।
यह बदलाव इस बात को दर्शाता है कि यूरोप में सुरक्षा नीति अब केवल सेना और रक्षा मंत्रालय तक सीमित नहीं रह गई है। नागरिक सुरक्षा और आपातकालीन तैयारियों को भी राष्ट्रीय सुरक्षा योजना का हिस्सा बनाया जा रहा है।
यूरोप में हथियारों की खरीद पहले ही तेज हो चुकी
यूरोप में हथियारों की बढ़ती मांग का असर अंतरराष्ट्रीय हथियार बाजार के आंकड़ों में भी दिखाई देता है। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट यानी SIPRI के मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, 2016-20 और 2021-25 के बीच यूरोप के 29 मौजूदा नाटो सदस्यों के प्रमुख हथियारों के आयात में 143% की वृद्धि हुई।
इन देशों के 2021-25 के हथियार आयात में अमेरिका की हिस्सेदारी 58% रही। SIPRI के अनुसार, यूरोप के सभी देशों के हथियार आयात को देखें तो इसी अवधि में यूरोप के कुल आयात में 210% की वृद्धि हुई।
पोलैंड और ब्रिटेन इस अवधि में यूरोप के सबसे बड़े हथियार आयातकों में शामिल रहे। अमेरिका से यूरोप को लड़ाकू विमान और लंबी दूरी की एयर डिफेंस प्रणालियों की खरीद भी महत्वपूर्ण रही है।
रूस के साथ तनाव के बीच बढ़ रही हाइब्रिड खतरे की चिंता
यूरोपीय देशों की रणनीति में एक और बड़ा बदलाव हाइब्रिड खतरों को लेकर है। इसमें साइबर हमले, ड्रोन घुसपैठ, महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे को निशाना बनाना और संचार व्यवस्था को बाधित करने जैसी गतिविधियां शामिल हैं।
बाल्टिक और पूर्वी यूरोप के देशों में हाल की घटनाओं ने इन चिंताओं को बढ़ाया है। नाटो देशों का ध्यान अब केवल पारंपरिक सीमा युद्ध पर नहीं, बल्कि ऐसे हमलों से निपटने पर भी है जिनमें हमलावर की पहचान या उसके इरादे तुरंत स्पष्ट नहीं होते।
लातविया के राष्ट्रपति ने भी हाल में कहा कि यूक्रेन युद्ध से सामने आए ड्रोन और हवाई युद्ध के अनुभवों के मुकाबले यूरोप की कुछ मौजूदा क्षमताओं में कमी दिखाई देती है। उन्होंने एयर डिफेंस और एंटी-बैलिस्टिक सिस्टम की जरूरत पर जोर दिया।
आने वाले वर्षों में यूरोप की सुरक्षा नीति पर पड़ेगा असर
कुल मिलाकर यूक्रेन युद्ध ने यूरोप की रक्षा नीति को लंबी अवधि के लिए बदल दिया है। नाटो के 5% GDP वाले लक्ष्य के कारण सदस्य देशों को अगले दशक में अपने रक्षा बजट में बड़ा बदलाव करना पड़ेगा। इसका पैसा केवल टैंक, मिसाइल और विमान खरीदने में नहीं जाएगा, बल्कि सैनिकों की संख्या और ट्रेनिंग, सैन्य ठिकानों, सड़कों, संचार नेटवर्क, साइबर सुरक्षा, मेडिकल सुविधाओं और रक्षा उद्योग की क्षमता बढ़ाने पर भी खर्च होगा।
साथ ही यूरोप के सामने अमेरिका पर अपनी सैन्य निर्भरता को लेकर भी सवाल बना हुआ है। SIPRI के आंकड़े बताते हैं कि यूरोपीय नाटो देशों के हथियार आयात में अमेरिकी हिस्सेदारी अभी भी काफी बड़ी है।
इसलिए आने वाले वर्षों में यूरोप की रणनीति दो दिशाओं में आगे बढ़ती दिखाई दे रही है—एक तरफ रूस से जुड़े संभावित सुरक्षा खतरों के लिए सैन्य तैयारी मजबूत करना और दूसरी तरफ अपनी रक्षा उत्पादन क्षमता तथा रणनीतिक आत्मनिर्भरता को बढ़ाना। हालांकि नाटो देशों की तैयारियों का स्तर अलग-अलग है और 2035 के निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने में प्रत्येक देश को अपनी आर्थिक और राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अलग चुनौतियों का सामना करना होगा।