‘धुरंधर’ की शानदार सफलता के बाद फिल्म निर्देशक आदित्य धर के अगले प्रोजेक्ट को लेकर लंबे समय से चर्चाओं का दौर जारी है। अब ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि उनका अगला बड़ा प्रोजेक्ट इतिहास के एक महान योद्धा की कहानी पर आधारित हो सकता है। चर्चा है कि मध्यकालीन असम के प्रसिद्ध सैन्य नायक लचित बोरफुकन के जीवन और उनके अद्भुत पराक्रम को हिंदी सिनेमा के जरिए दुनिया के सामने पेश करने की योजना बनाई जा रही है। हालांकि इस प्रोजेक्ट की अभी आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन असम सरकार की ओर से इस दिशा में पहल शुरू होने की जानकारी सामने आई है।
इस संभावित फिल्म को लेकर सबसे बड़ा संकेत असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने दिया है। उन्होंने हाल ही में एक फेसबुक लाइव कार्यक्रम के दौरान बताया कि इस ऐतिहासिक विषय पर फिल्म बनाने को लेकर उनकी निर्देशक आदित्य धर से प्रारंभिक बातचीत हुई है। मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि सब कुछ योजना के अनुसार आगे बढ़ता है तो आने वाले समय में यह प्रोजेक्ट भारतीय सिनेमा की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक फिल्मों में शामिल हो सकता है।
हिमंत बिस्वा सरमा ने बातचीत के दौरान आदित्य धर की हालिया उपलब्धियों की भी खुलकर सराहना की। उन्होंने कहा कि ‘धुरंधर’ जैसी सफल फिल्म का निर्देशन करने के बाद आदित्य धर ने यह साबित किया है कि वे बड़े विषयों को प्रभावशाली तरीके से पर्दे पर उतारने की क्षमता रखते हैं। मुख्यमंत्री का मानना है कि जिस तरह उन्होंने पहले बड़े पैमाने पर फिल्मों का निर्देशन किया है, उसी अनुभव का लाभ लचित बोरफुकन जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्व की कहानी को जीवंत बनाने में मिल सकता है।
मुख्यमंत्री के अनुसार, लचित बोरफुकन केवल असम ही नहीं बल्कि पूरे भारत के इतिहास के महत्वपूर्ण नायकों में गिने जाते हैं। बावजूद इसके, देश और दुनिया के बड़े हिस्से में उनके योगदान के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है। उनका कहना है कि यदि इस विषय पर एक भव्य हिंदी फिल्म बनाई जाती है तो करोड़ों दर्शकों तक इस वीर योद्धा की कहानी पहुंच सकेगी और आने वाली पीढ़ियां भी उनके साहस और नेतृत्व से परिचित होंगी।
सरमा ने यह भी बताया कि उनकी सरकार चाहती है कि फिल्म का निर्माण बड़े स्तर पर हो, ताकि इसके जरिए भारत के इतिहास के इस गौरवशाली अध्याय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिल सके। उनका मानना है कि सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जो इतिहास को किताबों से निकालकर आम लोगों तक बेहद प्रभावी तरीके से पहुंचाता है। इसलिए सरकार इस परियोजना को गंभीरता से आगे बढ़ाना चाहती है।
मुख्यमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल आदित्य धर के साथ बातचीत शुरुआती चरण में है। उन्होंने कहा कि निर्देशक की ओर से शुरुआती प्रतिक्रिया सकारात्मक रही है और उम्मीद की जा रही है कि अगस्त महीने में वे असम का दौरा कर सकते हैं। इस संभावित यात्रा के दौरान दोनों पक्ष फिल्म की रूपरेखा, ऐतिहासिक तथ्यों, शूटिंग की संभावनाओं और रचनात्मक दृष्टिकोण पर विस्तार से चर्चा करेंगे। यदि सभी पक्ष सहमत होते हैं तो इसके बाद प्रोजेक्ट को औपचारिक रूप से आगे बढ़ाया जा सकता है।
हालांकि सरकार ने यह भी साफ कर दिया है कि यदि किसी कारणवश आदित्य धर इस फिल्म का निर्देशन नहीं कर पाते हैं, तब भी इस महत्वाकांक्षी परियोजना को रोका नहीं जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य किसी एक निर्देशक तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राथमिकता यह है कि लचित बोरफुकन के जीवन पर एक उच्च गुणवत्ता वाली फिल्म बने। यदि आवश्यकता पड़ी तो दूसरे प्रतिष्ठित फिल्म निर्माताओं से भी संपर्क किया जाएगा ताकि इस ऐतिहासिक विषय के साथ पूरा न्याय किया जा सके।
सरकार का मानना है कि भारत के कई महान योद्धाओं और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों की कहानियां अभी भी बड़े पर्दे तक नहीं पहुंच सकी हैं। पिछले कुछ वर्षों में ऐतिहासिक और जीवनी आधारित फिल्मों को दर्शकों का अच्छा समर्थन मिला है। ऐसे में लचित बोरफुकन जैसे नायक पर फिल्म बनने से न केवल मनोरंजन होगा बल्कि लोगों को इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय से भी परिचित होने का अवसर मिलेगा।
लचित बोरफुकन का नाम भारतीय सैन्य इतिहास में विशेष सम्मान के साथ लिया जाता है। वे अहोम साम्राज्य के प्रमुख सेनापति थे और अपनी अद्भुत युद्ध रणनीति, नेतृत्व क्षमता तथा साहस के लिए प्रसिद्ध थे। 17वीं शताब्दी में जब मुगल साम्राज्य पूर्वोत्तर भारत में अपने विस्तार की कोशिश कर रहा था, तब लचित बोरफुकन ने अपनी सूझबूझ और सैन्य कौशल के दम पर उन्हें कड़ी चुनौती दी।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि वर्ष 1671 में लड़ी गई सरायघाट की ऐतिहासिक लड़ाई मानी जाती है। इस युद्ध में मुगल सेना संख्या और संसाधनों के लिहाज से कहीं अधिक मजबूत थी, लेकिन लचित बोरफुकन की रणनीति और सैनिकों के मनोबल ने परिस्थितियों को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने ब्रह्मपुत्र नदी के क्षेत्र में युद्ध की ऐसी योजना बनाई, जिसने मुगल सेना की ताकत को कमजोर कर दिया और अंततः अहोम सेना ने ऐतिहासिक विजय हासिल की।
इतिहासकारों के अनुसार, सरायघाट की इस जीत का प्रभाव केवल असम तक सीमित नहीं था। इस युद्ध के बाद मुगल साम्राज्य का पूर्वोत्तर भारत की ओर विस्तार लगभग रुक गया और क्षेत्र की स्वतंत्र पहचान लंबे समय तक सुरक्षित रही। इसी कारण लचित बोरफुकन को असम में वीरता, देशभक्ति और नेतृत्व का प्रतीक माना जाता है।
लचित बोरफुकन का जन्म वर्ष 1622 में हुआ था। बचपन से ही उन्होंने प्रशासनिक और सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त किया था। बाद में अपनी प्रतिभा और नेतृत्व क्षमता के कारण वे अहोम साम्राज्य की सेना के प्रमुख सेनापति बने। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय राज्य की सुरक्षा और सीमाओं की रक्षा में समर्पित किया। वर्ष 1672 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी वीरता की कहानियां आज भी असम के इतिहास और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं।
असम सरकार लंबे समय से लचित बोरफुकन की विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए विभिन्न प्रयास करती रही है। उनके नाम पर स्मारक, कार्यक्रम और पुरस्कार भी स्थापित किए गए हैं। अब यदि उनकी जीवन यात्रा पर एक बड़े बजट की हिंदी फिल्म बनती है, तो यह उनके योगदान को नए दर्शकों तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है।
फिलहाल इस परियोजना को लेकर आधिकारिक घोषणा या निर्माण की समय-सीमा सामने नहीं आई है, लेकिन मुख्यमंत्री के बयान के बाद फिल्म को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि अगस्त में प्रस्तावित मुलाकात के बाद क्या यह ऐतिहासिक बायोपिक वास्तव में आकार लेती है या नहीं। यदि सब कुछ अनुकूल रहा तो आने वाले वर्षों में भारतीय सिनेमा को एक और भव्य ऐतिहासिक फिल्म देखने को मिल सकती है, जो लचित बोरफुकन के अदम्य साहस, नेतृत्व और देशभक्ति की कहानी को बड़े पर्दे पर नई पहचान देगी।