Skip to main content

The Scoopp

 

अमेरिका-सऊदी परमाणु समझौते पर नया मोड़: ट्रम्प की शर्त से बढ़ी अनिश्चितता, इजराइल से रिश्तों को बनाया अहम मुद्दा

करीब बीस साल से चर्चा में रहे अमेरिका और सऊदी अरब के असैन्य परमाणु सहयोग समझौते ने आखिरकार हस्ताक्षर का चरण तो पार कर लिया, लेकिन इसके तुरंत बाद ही इसमें नया राजनीतिक मोड़ आ गया। समझौते पर दस्तखत होने के महज एक दिन बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने ऐसी नई शर्त रख दी, जिसने पूरे समझौते के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ट्रम्प ने साफ कहा कि यदि सऊदी अरब को इस परमाणु सहयोग का पूरा लाभ चाहिए, तो उसे पहले इजराइल के साथ अपने कूटनीतिक संबंध सामान्य करने होंगे और अब्राहम अकॉर्ड्स का हिस्सा बनना पड़ेगा।

इस नई शर्त के सामने आने के बाद दोनों देशों के बीच हुई सहमति पर फिर से अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं। माना जा रहा है कि यह शर्त पहले सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई थी, इसलिए सऊदी नेतृत्व भी इससे हैरान रह गया।

समझौते के तुरंत बाद बदल गया माहौल

वॉशिंगटन में आयोजित समारोह के दौरान अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट की मौजूदगी में इस परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। समझौते की घोषणा होते ही इसे अमेरिका और सऊदी अरब के रिश्तों में बड़ी उपलब्धि माना गया। हालांकि यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, राष्ट्रपति ट्रम्प इस बात से नाराज थे कि ऊर्जा विभाग ने उनकी अंतिम मंजूरी से पहले ही समझौते का सार्वजनिक ऐलान कर दिया। बताया जा रहा है कि व्हाइट हाउस चाहता था कि घोषणा कुछ समय बाद की जाए, लेकिन ऊर्जा विभाग ने हस्ताक्षर समारोह भी आयोजित किया और मीडिया को इसकी जानकारी भी दे दी।

बाद में फॉक्स न्यूज और वॉल स्ट्रीट जर्नल में आई खबरों के बाद ट्रम्प की नाराजगी और बढ़ गई। इसके बाद उन्होंने स्वयं सामने आकर समझौते को नई शर्तों के साथ जोड़ दिया।

इजराइल से संबंध सामान्य करने की शर्त

राष्ट्रपति ट्रम्प ने स्पष्ट कहा कि परमाणु सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए सऊदी अरब को अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होना होगा। इसका सीधा अर्थ यह है कि सऊदी अरब को इजराइल के साथ आधिकारिक राजनयिक संबंध स्थापित करने होंगे।

अमेरिका लंबे समय से चाहता रहा है कि पश्चिम एशिया के प्रमुख अरब देश इजराइल के साथ अपने रिश्ते सामान्य करें। ट्रम्प का मानना है कि यदि सऊदी अरब भी इस प्रक्रिया में शामिल होता है तो पूरे क्षेत्र में अमेरिका का रणनीतिक प्रभाव और मजबूत होगा।

व्हाइट हाउस का दावा है कि यह शर्त नई नहीं बल्कि ट्रम्प प्रशासन की शुरुआत से ही नीति का हिस्सा रही है। हालांकि ऊर्जा विभाग ने किसी प्रकार के आंतरिक मतभेद से इनकार किया है।

यूरेनियम संवर्धन पर भी लगाया ब्रेक

समझौते से जुड़ा एक और बड़ा मुद्दा यूरेनियम संवर्धन का है। शुरुआती मसौदे में यह संभावना बताई गई थी कि कुछ निर्धारित शर्तें पूरी होने पर सऊदी अरब को अपनी जमीन पर सीमित स्तर पर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति मिल सकती है।

लेकिन ट्रम्प ने सार्वजनिक रूप से यह साफ कर दिया कि अमेरिका ऐसी किसी व्यवस्था को मंजूरी नहीं देगा। उन्होंने कहा कि परमाणु सहयोग केवल शांतिपूर्ण ऊर्जा उत्पादन तक सीमित रहेगा और सऊदी अरब को अपने देश में यूरेनियम संवर्धन की अनुमति नहीं मिलेगी।

इस बयान ने सऊदी नेतृत्व को भी चौंका दिया, क्योंकि प्रारंभिक चर्चा में इस विषय पर अलग संकेत मिले थे।

दो दशक पुरानी पहल को फिर झटका

अमेरिका और सऊदी अरब के बीच असैन्य परमाणु सहयोग की बातचीत लगभग बीस वर्ष पहले शुरू हुई थी। कई दौर की वार्ताओं के बावजूद यह समझौता लंबे समय तक आगे नहीं बढ़ सका।

पिछले वर्ष अक्टूबर में दोनों देशों के बीच प्रारंभिक सहमति बनने की खबर सामने आई थी। इसके बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि जल्द ही अंतिम समझौते पर हस्ताक्षर हो जाएंगे।

हालांकि ईरान से जुड़े क्षेत्रीय तनाव, कांग्रेस की संभावित आपत्तियां और सुरक्षा संबंधी मुद्दों के कारण यह प्रक्रिया महीनों तक रुकी रही। हाल ही में ऊर्जा विभाग को लगा कि राष्ट्रपति की मंजूरी मिल चुकी है, जिसके बाद समझौते की औपचारिक घोषणा कर दी गई। लेकिन अब ट्रम्प की नई शर्तों ने एक बार फिर पूरी प्रक्रिया को मुश्किल बना दिया है।

विशेषज्ञों की अलग-अलग राय

परमाणु नीति के जानकारों ने इस समझौते को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि किसी देश को यूरेनियम संवर्धन की अनुमति दी जाती है, तो भविष्य में उसका उपयोग हथियार कार्यक्रम के लिए भी किया जा सकता है।

कुछ विशेषज्ञों ने यह भी चिंता जताई कि यदि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अतिरिक्त सुरक्षा प्रोटोकॉल पूरी तरह लागू नहीं किए गए, तो निगरानी व्यवस्था कमजोर हो सकती है।

वहीं दूसरी ओर कई रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका सऊदी अरब के साथ परमाणु सहयोग से पीछे हटता है, तो चीन और रूस जैसे देश इस अवसर का लाभ उठाकर सऊदी अरब के साथ अपने संबंध और मजबूत कर सकते हैं। इससे पश्चिम एशिया में अमेरिका की रणनीतिक स्थिति कमजोर पड़ सकती है।

आखिर क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स?

अब्राहम अकॉर्ड्स वर्ष 2020 में अमेरिका की मध्यस्थता से शुरू हुई एक ऐतिहासिक पहल है। इसके तहत कई अरब देशों ने पहली बार इजराइल के साथ आधिकारिक संबंध स्थापित किए।

संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन, मोरक्को और सूडान पहले ही इस समझौते का हिस्सा बन चुके हैं। इन देशों ने इजराइल के साथ व्यापार, निवेश, पर्यटन और सुरक्षा सहयोग को बढ़ावा दिया।

अब अमेरिका चाहता है कि सऊदी अरब भी इसी पहल से जुड़े, क्योंकि उसे इस क्षेत्र का सबसे प्रभावशाली अरब देश माना जाता है। यदि सऊदी इस समझौते में शामिल होता है तो इसे पश्चिम एशिया की राजनीति में बड़ा बदलाव माना जाएगा।

गाजा युद्ध बना सबसे बड़ी बाधा

हालांकि सऊदी अरब ने अब तक इजराइल के साथ संबंध सामान्य करने से दूरी बनाए रखी है। इसकी सबसे बड़ी वजह फिलिस्तीन का मुद्दा है।

सात अक्टूबर 2023 को हमास के हमले और उसके बाद शुरू हुए गाजा युद्ध ने पूरे क्षेत्र की राजनीति बदल दी। इसके बाद सऊदी नेतृत्व ने साफ कहा कि जब तक फिलिस्तीन के लिए स्वतंत्र राज्य का रास्ता स्पष्ट नहीं होता, तब तक वह इजराइल के साथ औपचारिक संबंध स्थापित नहीं करेगा।

इसी कारण अब्राहम अकॉर्ड्स में सऊदी की संभावित भागीदारी भी ठंडी पड़ गई और अब यही मुद्दा परमाणु समझौते के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट बन गया है।

तेल से समृद्ध देश को परमाणु ऊर्जा की जरूरत क्यों?

दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातकों में शामिल सऊदी अरब के पास ऊर्जा संसाधनों की कमी नहीं है। इसके बावजूद वह परमाणु ऊर्जा में भारी निवेश करना चाहता है। इसकी मुख्य वजह देश की दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति ‘विजन-2030’ है।

इस योजना का उद्देश्य सऊदी अर्थव्यवस्था को केवल तेल पर निर्भर रहने से बचाना है। तेजी से बढ़ती आबादी और औद्योगिक विकास के कारण देश में बिजली की मांग लगातार बढ़ रही है।

फिलहाल बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा तेल और प्राकृतिक गैस से किया जाता है। यदि भविष्य में परमाणु ऊर्जा से बिजली बनने लगेगी तो घरेलू स्तर पर तेल की खपत कम होगी। इससे सऊदी अरब अधिक मात्रा में कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेच सकेगा, जिससे उसकी आय में भी वृद्धि होगी।

इसके अलावा सऊदी सरकार सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा को मिलाकर एक संतुलित ऊर्जा प्रणाली विकसित करना चाहती है, ताकि भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा बनी रहे।

यूरेनियम संवर्धन को लेकर अमेरिका सतर्क क्यों?

परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में इस्तेमाल होने वाले यूरेनियम को एक निश्चित स्तर तक संवर्धित किया जाता है। यही प्रक्रिया बिजली उत्पादन के लिए आवश्यक होती है।

लेकिन यदि इसी तकनीक का उपयोग अत्यधिक स्तर तक किया जाए, तो वही संवर्धित यूरेनियम परमाणु हथियार बनाने में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यही कारण है कि यूरेनियम संवर्धन को दुनिया की सबसे संवेदनशील परमाणु तकनीकों में गिना जाता है।

अमेरिका लंबे समय से इस नीति पर कायम है कि अधिकांश देशों को अपनी जमीन पर यूरेनियम संवर्धन की स्वतंत्र अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उसका मानना है कि भविष्य में राजनीतिक परिस्थितियां बदलने पर ऐसी तकनीक का दुरुपयोग किया जा सकता है।

इसी सोच के तहत ट्रम्प प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिया है कि सऊदी अरब के साथ परमाणु सहयोग तो जारी रह सकता है, लेकिन यूरेनियम संवर्धन की अनुमति नहीं दी जाएगी। अब देखना होगा कि सऊदी अरब इन नई शर्तों को स्वीकार करता है या दोनों देशों के बीच वर्षों से चली आ रही यह परमाणु डील एक बार फिर लंबे समय के लिए ठंडे बस्ते में चली जाती है।